कुर्सी सहेजने को पत्नी, पर वारिस बेटा ही..

  • 9 अप्रैल 2015
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राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के बेेटे को 'असली वारिस' बताने का बयान चर्चाओं में है.

लालू ने चारा घोटाले में आरोपित होने के बाद 1997 में बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

उन्होंने तब अपनी पत्नी राबड़ी देवी को अपना राजनीतिक वारिस चुना.

इसके बाद राबड़ी देवी कुल तीन कार्यकालों में लगभग आठ साल तक बिहार की मुख्यमंत्री रहीं.

पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में लालू जब क़ानूनी तौर पर उम्मीदवार बनने के लायक नहीं रहे तो उन्होंने राबड़ी और अपनी बड़ी बेटी मीसा भारती को चुनाव मैदान में उतारा.

लेकिन अब पिछले कुछ दिनों से राजद के अध्यक्ष लालू लगातार यह कह रहे हैं कि बेटा ही पिता का वारिस होता है.

पप्पू के दावे का जवाब

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दरअसल, राजद सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव हाल के दिनों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर लालू के राजनीतिक उत्तराधिकारी होने का दावा पेश करते रहे हैं.

इन दावों के संबंध में लालू ने पिछले दिनों साफ़-साफ़ कहा कि बेटा ही पिता का वारिस होता है.

उन्होंने यह बात राजद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही.

इसके बाद से उनके ऐसे ही बयान स्थानीय मीडिया में लगातार आ रहे हैं.

‘राजनीतिक निहितार्थ नहीं’

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क्या लालू का बयान महिला समानता या अधिकारों के विरोध में नहीं है?

इसके जवाब में बिहार विधानसभा में राजद विधायक दल के नेता अब्दुल बारी सिद्दक़ी कहते हैं कि, वे लालू के बयान को इस ‘एंगल’ से नहीं देखते हैं.

अब्दुल बारी ने कहा, "इस बयान का राजनीतिक निहितार्थ नहीं निकाला जाना चाहिए. उन्होंने सामजिक-पारिवारिक संदर्भ में ऐसा कहा है."

लेकिन साथ ही अब्दुल बारी भी कहते हैं कि बेशक बेटी पिता की वारिस नहीं होती है.

महिला आरक्षण का विरोध

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लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर डेजी नारायण का मानना है कि लालू का ये बयान चौंकाने वाला नहीं है.

डेजी कहती हैं, "लालू सामाजिक बदलाव के वाहक बने, लेकिन महिला अधिकारों के संबंध में उनकी सोच बहुत सीमित है. वे महिलाओं को परिवार और राजनीति में बराबरी का दर्जा देने की बात सोच भी नहीं सकते."

डेजी लालू के हाल के बयान के साथ-साथ संसद में महिला आरक्षण बिल पर उनके विरोध का भी हवाला देती हैं.

समाज की प्रतिनिधि सोच

साथ ही डेजी यह भी कहती हैं कि लालू उसी सोच को सामने रख रहे हैं जो आज के भारतीय समाज की सामान्य सोच है. समाज अमूमन महिला को आज भी कोख से लेकर अर्थी तक कोई अधिकार देना नहीं चाहता.

लालू, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले संपूर्ण क्रांति आंदोलन की उपज माने जाते हैं, जिसमें नारी समानता की मांग भी पुरजोर ढंग से उठी थी.

इसलिए भी लोगों को उनका बयान कुछ हैरान करने वाला लगता है.

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