कश्मीरी पंडित घुलमिल कर रहें या किनारे

  • 9 अप्रैल 2015
राम नवमी इमेज कॉपीरइट EPA
Image caption 28 मार्च को कश्मीरी पंडितों ने श्रीनगर के लाल चौक पर राम नवमी मनाई.

भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथी हिंसा के दौर में घर छोड़कर गए कश्मीरी पंडितों की कश्मीर वापसी के मुद्दे पर राजनीति तेज़ हो गई है.

अलगाववादी संगठन सरकार के पंडितों के लिए अलग टाउनशिप के फ़ैसले को बंटवारे की साज़िश भी क़रार दे रहे हैं.

साथ ही बंद का आह्वान भी किया गया है.

श्रीनगर से माजिद जहांगीर की रिपोर्ट

भारत प्रशासित कश्मीर के श्रीनगर में रहने वाले रंजन कौल कश्मीरी पंडितों के घाटी में लौटने की वकालत तो करते हैं लेकिन इसके लिए अगल टाउनशिप बनाने की हिमायत नहीं करते हैं.

पिछले पांच वर्षों से घाटी में रह रहे 38 वर्षीय रंजन कौल बीबीसी से बातचीत के दौरान कहते हैं, "हर पंडित वापस लौटना चाहता है लेकिन उन्हें यहाँ अलग से रखना कोई अच्छी बात नहीं है. अलग बसना तो किसी के लिए फ़ायदेमंद नहीं. सरकार को चाहिए की कुछ लोगों को पहले ट्रायल बेसिस पर लाया जाया जिसके बाद फिर आगे का रास्ता तय हो सकता है."

लेकिन कश्मीर से बाहर रहने वाले कुछ पंडित अलग टाउनशिप में रहने को सही मानते हैं. 42 वर्षीया संजय कुमार, जो कई साल से दिल्ली में रहते हैं, पूछते हैं कि अलग टाउनशिप में रहने में बुरा क्या है?

वह कहते हैं, "इसमें कोई ग़लत बात नहीं है अगर हम को अलग टाउनशिप में बसाया जाए. अगर वहाँ हमारे लिए अच्छी सुविधाएं होंगी तो हमें कोई समस्या नहीं होगी. सरकार अगर हमारे जले हुए घर और ज़मीनें वापस दिला सकती है तो ठीक है, वरना टाउनशिप भी एक रास्ता है."

रंजन कौल वर्ष 2010 में भारत सरकार के उस पैकेज के तहत वापस लोटे हैं जिसमें घाटी वापस लौटने वाले हर कश्मीरी पंडित को सरकारी नौकरी और रहने के लिए एक सरकारी फ़्लैट दिया जाता है. विस्थापित कश्मीरी पंडितों को दोबारा घाटी में बसाने के लिए अलग टाउनशिप बनाने की केंद्र सरकार की नई योजना से राजनीतिक माहौल एक दफ़ा फिर गर्मा गया है.

Image caption वापस घाटी लौटे कश्मीरी पंडित रंजन कौल कहते हैं, "पंडितों को अलग से रखना अच्छी बात नहीं है."

ग़ौरतलब है कि सात अप्रैल, 2015 को दिल्ली में प्रदेश के मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद और केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बीच हुई बैठक में इसबारे में बातचीत हुई थी.

सरकार की तरफ़ से जारी बयान में कहा गया था कि गृहमंत्री ने कश्मीरी पंडितों के लिए टाउनशिप बनाने के लिए राज्य सरकार से ज़मीन मांगी है. बयान के अनुसार मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने इस पर अपनी रज़ामंदी जताते हुए जल्द से जल्द ज़मीन मुहैया कराने का आश्वासन दिया था.

लेकिन इस ख़बर के सार्वजनिक होते ही तमाम राजनीतिक दलों और अलगाववादियों ने इस पर तीव्र प्रतिक्रिया दी है. हालाकि राज्य की बीजेपी इकाई ने इस क़दम को सही ठहराया है.

विपक्षी नेशनल कांफ़्रेस ने पंडितों के लिए अलग टाउनशिप बनाने का सख़्त विरोध किया है.

बंटवारे की साज़िश

पार्टी प्रवक्ता जुनैद अज़ीम मोतो ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा, "अलग टाउनशिप क़ायम करने का मतलब है कि इससे और भी फ़ासले बढ़ेंगे. आप सीरिया का हाल देखें. ऐसा करना नापाक सोच का हिस्सा है."

पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए ट्वीट किया, "मैं पंडितों की वापसी के लिए हर मुमकिन मदद करूंगां, सिर्फ़ इस बात का ख़्याल रखा जाए की घाटी की मिली जुली संस्कृति और कश्मीरियत को बहाल रखा जाए."

Image caption अलगाववादी नेता मीरवाइज़ उमर फ़ारूक कहते हैं कि पंडितों के लिए अलग टाउनशिप राज्य के बँटवारे की साज़िश है.

कश्मीर के सभी अलगाववादी गुटों ने पंडितों के लिए अलग टाउनशिप क़ायम करने की पहल को एक बड़ी साज़िश का हिस्सा क़रार दिया है.

हुर्रियत कांफ्रेंस (म) के चेयरमैन मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने एक बयान जारी कर कहा, "कश्मीरी पंडित हमारे समाज का हिस्सा हैं और हम हमेशा चाहते हैं की वह इज़्ज़त के साथ अपने-अपने घरों को लौटें. लेकिन पंडितों के लिए अलग टाउनशिप का मंसूबा जम्मू-कश्मीर राज्य को तक़सीम करने का मंसूबा है."

जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फ़्रंट के चेयरमैन यासीन मलिक ने आठ अप्रैल को श्रीनगर में एक प्रेस कांफ्रेंस कर पंडितों के लिए अलग टाउनशिप बनाने के सरकार के प्रस्ताव की कड़ी आलोचना करते हुए कहा, "ये आरएसएस का एजेंडा है जिस को अलग टाउनशिप बनाने के ज़रिए अमल में लाया जा रहा है. हम इसका विरोध करते हैं."

Image caption आज भी कश्मीरी पंडितों के घर खाली पड़े हैं.

बंद का आह्वान

मलिक ने 11 अप्रैल को अलग टाउनशिप के ख़िलाफ़ कश्मीर बंद का आह्वान किया है.

अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने भी 11 अप्रैल को कश्मीरी जनता से हड़ताल और विरोध प्रदर्शन करने की अपील की है.

लेकिन बीजेपी पंडितों के लिए अलग टाउनशिप बनाने को कोई समस्या नहीं मानती है.

पार्टी के जम्मू-कश्मीर यूनिट के जनरल सेक्रेटरी अशोक कौल ने बीबीसी से कहा, "अगर 60 लाख आबादी में से तीन लाख लोग अलग रह जाएं तो क्या फ़र्क़ पड़ता है. आज कल तो जगह-जगह मेगा शहर बनते हैं. अभी वह समय नहीं आया कि पंडितों को पारम्परिक तरीक़े से बसाया जाए. पंडितों के अपने घर कश्मीर में नहीं रहे तो उनको कहीं पर तो रखना है."

ग़ौरतलब है की वर्ष 1990 में कश्मीर घाटी में हथियारबंद आंदोलन शुरू होने के साथ ही घाटी में रहने वाले लाखों पंडित अपने घर बार छोड़ कर चले गए और भारत के अलग-अलग शहरों में पनाह ली.

कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी तभी से एक राजनीतिक मुद्दा बना रहा है.

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