'मंटो को मुंबई में किसी ने परेशान नहीं किया'

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हाल ही में पाकिस्तानी शायर और लेखक अली अक़बर नातिक़ ने बीबीसी हिंदी डॉटकॉम पर उर्दू के मशहूर अफ़सानानिगार सआदत हसन मंटो को लेकर अपने विचार व्यक्त किए थे.

इस लेख में पाकिस्तान में मंटो की लोकप्रियता को लेकर बातें की गई हैं और इस पूर्वाग्रह पर सवाल खड़ा किया गया था कि पाकिस्तान जाकर मंटो के दिन मुफ़लिसी में बीते.

(पढ़ेंः अली अक़बर नातिक़ का मंटो पर लेख)

इसमें नातिक़ ने कहा है कि अधिकांश भारतीय सोचते हैं कि मंटो ने पाकिस्तान जाकर ग़लती की और वहां उनकी हालत बहुत दयनीय थी जबकि वास्तव में ऐसा था नहीं.

मंटो के जीवन और साहित्य पर काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार आकार पटेल ने अली अक़बर नातिक द्वारा उठाए गए कुछ सवालों का जवाब दिए हैं.

मंटो पर आकार पटेल का जवाब

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मंटो की ग़रीबी और उनकी असामयिक मृत्यु के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराना क्या सही है?

नहीं. लेकिन मैं ऐसे बहुत से भारतीयों को नहीं जानता जो ऐसा दावा करते हैं. मैं उन कुछेक चीजों की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा, जिसका ज़िक्र नातिक़ ने किया है.

पहला, मंटो का घर लाहौर में लक्ष्मी मैंशन था. यह एक ख़ूबसूरत जगह है और अभी पिछले साल तक मंटो की सबसे छोटी बेटी निगहत यहां रहती थीं.

एक डेवेलपर ने जब इसे ले लिया तब उन्होंने यह घर खाली किया.

अब इसे ढहाया जा रहा है, हालांकि बहुत सारे लोग सोचते हैं कि इसे सरकार द्वारा संरक्षित किया जाना चाहिए था.

यह वही इमारत है जहां मणिशंकर अय्यर का जन्म हुआ था.

शानदार बंगला

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यह घर मंटो को सरकार द्वारा शरणार्थी सम्पत्ति के रूप में, अमृतसर में हुए नुकसान के बदले दिया गया था, न कि लेखक के रूप में उनकी प्रसिद्धि को देखकर.

पंजाब में अपना घर बार छोड़ कर आए सभी शरणार्थियों को उनके नुकसान की अच्छी खासी भरपाई की गई थी, क्योंकि अधिकांश संपत्ति के मालिक हिंदू या सिख थे और ये सारी सम्पत्तियां शरणार्थी मुस्लिमों के बीच बांट दी गईं.

जालंधर से उजड़ कर गए इमरान ख़ान के परिवार को भी लाहौर के ज़मान पार्क इलाक़े में एक शानदार बंगला मिला था.

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दूसरी बात अदालती मुक़दमों की. मंटो पर पांच बार मुक़दमा चला, चार बार अविभाजित भारत में.

हालांकि, ये चारों मुक़दमे उस हिस्से में चले, जो पाकिस्तान बना. उन्हें मुंबई में कभी भी परेशान नहीं किया गया.

पांचवें मुकदमे में उन्हें आज़ादी के बाद एक बार कराची में सज़ा हुई थी.

मंटो का संघर्ष

तीसरी बात उनके काम को लेकर है. मंटो फ़िल्मों के एक ग़रीब लेखक थे और उनकी लिखी कोई भी फ़िल्म हिट नहीं हुई.

बिना कोई बेहतर स्क्रिप्ट लिखे, क्या उन्हें अपने आप ही बॉलीवुड में क़ामयाब होना चाहिए था?

यह सच है कि एक उर्दू लेखक के रूप में उन्हें भारत में भी उतना ही संघर्ष करना पड़ा जितना पाकिस्तान में.

लेकिन यह भी सही है कि उस समय के और यहां तक कि आज भी बॉलीवुड के बड़े बड़े पटकथा लेखक उर्दू परम्परा से थे. अख़्तर मिर्ज़ा से लेकर जावेद अख़्तर तक.

इसलिए यह बात स्वीकार करना मुश्किल है कि लोकप्रिय साहित्य में उर्दू लेखकों को पूर्वाग्रह का शिकार होना पड़ता है.

जबकि इनमें से ऊंचे दर्जे के काम और निश्चित रूप से ऊंची आमदनी भी इसी बॉलीवुड में पायी जाती रही है.

अगर भारत नहीं छोड़ते...

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चौथी बात: साल 1947 के बाद उन्हें भारत में बहुत अधिक नहीं पढ़ा गया था क्योंकि मुसलमानों से अलग उर्दू पढ़ने वाली आबादी बहुत छोटी और कुछ समूहों तक महदूद थी (जैसे कायस्थों और सिखों में).

लेकिन यह भी अविवादित है कि मंटो का 'पुनर्जन्म' भी भारत में ही हुआ.

निगहत मंटो ने मुझे बताया था कि वो अपनी 30 की उम्र (1980 के दशक) तक नहीं जानती थीं कि उनके पिता कितने मशहूर लेखक थे, क्योंकि विभाजन पर उनके विचार के कारण पाकिस्तान में उन्हें बहुत ज़्यादा न तो पढ़ा जाता था और न पढ़ाया जाता था.

निजी तौर मैं नहीं सोचता हूं कि अगर मंटो भारत में ही रह जाते तो वो बहुत सम्पन्न हो जाते और उन्हें बहुत सम्मान मिलता.

उनका परिवपक्व लेखन और बेहतरीन रचनाएं पाकिस्तान में तब आईं जब बंटवारे का असली अर्थ उन्हें समझ आ गया था.

पाकिस्तान या भारत में, उन्हें बंटवारे के समय के सबसे उम्दा इतिहास लेखक के रूप में देखा जाना ही उनका असली पुरस्कार है.

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