संघ से बिहार की पहेली कभी सुलझेगी?

  • 13 अप्रैल 2015
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हिन्दी पट्टी में राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भाजपा राज्यों के राजनीतिक डीएनए में शामिल है लेकिन बिहार में 35 साल की मेहनत के बावजूद सत्ता में साझीदार रह लेने के बाद भी आरएसएस और भाजपा बिहार को लेकर इस पट्टी के बाकी राज्यों की तरह आश्वस्त नहीं है.

भारत के राजनीतिक रूप से सबसे ज़्यादा जागे हुए राज्य में उसके लिए ये चुनौती क़ायम है. बिहार में सत्ता पाने के तीन अवसर उसके हाथ से निकल चुके हैं.

पहला मौक़ा

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आरएसएस ने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन को समर्थन देने का एलान किया था.

(पढ़ेंः बैठक बीजेपी की, बोलबाला कांग्रेस का)

गोलवलकर स्वयं जाकर विनोबा भावे से मिले. बिहार में भूदान में बहुत ज़मीन मिली जिसमें संघ की भूमिका मानी गई, सराही गई लेकिन आरएसएस या जनसंघ को भरपूर फसल काटने का अवसर नहीं मिला. लाभ पाने वाले पिछड़ों और दलितों ने भाजपा को सेवा का मेवा नहीं दिया.

संघ से जन्मे जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी बिहार में पहली ताकत नहीं बन पाए.

दूसरा मौक़ा

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35 साल पहले 1980 में भारतीय जनता पार्टी का जन्म तब हुआ जब जनता पार्टी को सत्ता मिलने की सारी संभावनाएं समाप्त हो चुकी थीं.

(पढ़ेंः क्या टूटेगी आडवाणी की खामोशी?)

जनता पार्टी में शामिल जनसंघ घटक ने बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने का दाँव चला. उम्मीद थी कि बिहार के सबसे बड़े दलित नेता की खुली हिमायत से दलित जुड़ेंगे लेकिन वो हुआ नहीं.

प्रदेश और देश में समय-समय पर सत्ता में हिस्सेदारी पाने के बावजूद बिहार को केसरिया रंग में रंगने का सपना अभी भी सपना ही है.

तीसरा मौक़ा

तीसरा अवसर भाजपा और आरएसएस की मिली जुली रणनीति से तब मिला जब लाल कृष्ण आडवाणी ने अयोध्या मसले को गरमाते हुए रथ यात्रा निकाली.

(पढ़ेंः कैसे बनी बीजेपी दुनिया की 'सबसे बड़ी पार्टी'?)

उत्तर प्रदेश में पहुंचने से पहले ही यात्रा को बिहार में रोका गया. आडवाणी ग़िरफ़्तार किए गए. छह दिसम्बर 1992 को ढांचा टूटा.

बिहार में ताक़त जॉर्ज फ़र्नांडीस की समता पार्टी के साथ आने से बढ़ी. भाजपा तब भी पूरी सत्ता हासिल नहीं कर सकी.

अब क्या?

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और अब 2015 आ पहुंचा. विधानसभा चुनाव कुछ महीने दूर है. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ 90 साल का होने जा रहा है. भारतीय जनता पार्टी 35 साल की हो चुकी है.

(पढ़ेंः 'पीएम मोदी' और 'संघ के मोदी' में अंतरविरोध?)

न भूदान के बाद गरीब भूमिहीन जुड़े, न जगजीवन राम का समर्थन करने के बावजूद दलित और न ही रथ यात्रा के बाद हिन्दू.

बीते विधान सभा चुनावों में भाजपा ने नीतीश को पकड़ा तो लोकसभा चुनाव जीतने के लिए रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी तथा उपेन्द्र कुशवाह से तालमेल किया.

एक गांव, एक पनघट, एक मरघट का नारा

केन्द्र में भाजपा का साफ़ बहुमत है. कई राज्यों में सरकार और आंध्र प्रदेश, पंजाब जैसे राज्यों में सत्ता में साझेदारी है. लेकिन बिहार में सत्ता पाना उसके लिए अभी भी दूर की कौड़ी दिख रही है.

(पढ़ेंः संघ की रणनीति को ऐसे समझिए...)

बिहार में सत्ता पाने की रणनीति नए सिरे से बनी. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने प्रतिनिधि सभा में एक गांव, एक पनघट, एक मरघट का नारा दिया है.

प्रस्ताव पारित कर गांव स्तर तक छुआछूत से लड़ने का संकल्प लिया गया. भाजपा को जीतन राम मांझी भी आकर्षित कर रहे है. मांझी के बहाने अति दलित समुदायों के वोट पाने के लिए नया समीकरण चाहिए.

नए चेहरे

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Image caption हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर.

संघ के आकलन के अनुसार अभी भी नीतीश कुमार और राम विलास पासवान की छवि भाजपा के प्रदेश नेताओं की तुलना में वोटर के लिए अधिक लुभावनी है.

जाति समीकरणों को बदलने के लिए आरएसएस ने हरियाणा, महाराष्ट्र या छत्तीसगढ़ में कथित ताकतवर या बहुमत वाली जातियों के स्थान पर नए चेहरे दिए.

मुख्यमंत्री पद के लिए हरियाणा और महाराष्ट्र जैसा पसंदीदा चेहरा आरएसएस बिहार में तलाश नहीं कर पा रहा है.

दिल्ली से सीखा सबक

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दिल्ली में मोदी के फ़रमान के बाद नितिन गडकरी समेत बड़े नेताओं को दिल्ली चुनाव से दूर रखा गया था.

आरएसएस की फटकार मिलने के बाद बिहार की रणनीति में अमित शाह ने गडकरी, सुषमा स्वराज, राजनाथ को शामिल किया.

आरएसएस की तरफ से दत्तात्रेय होसबोले और कृष्ण मोहन बैठक में शामिल हुए. अन्य दलों के कार्यकर्ता जोड़कर बहुमत पाने के दाँव पर फिर विचार हुआ.

जय प्रकाश नारायण के समाजवादी साथी फणीश्वर नाथ रेणु के बेटे भाजपा के विधायक हैं. राम कृपाल यादव केन्द्र में राज्यमंत्री हैं.

इसके बावजूद शरद यादव, नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की तिकड़ी की बिहार में अल्पसंख्यक वोट की बदौलत चुनौती कायम है.

लालू परिवार से मतदाता की वितृष्णा को भुनाने का तरीका अभी भी हाथ नहीं लग रहा है.

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