बिहारः क्या भाजपा की बात बन पाएगी ?

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बैसाखी के एक दिन बाद भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह राजनीतिक फसल काटने के लिए बिहार आए.

ये एक अलग बात है कि मौसम की मार की वजह से बिहार के किसान भी देश के अन्य राज्य के लोगों की तरह परेशान हैं.

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शायद इसीलिए, अंबेडकर जयंती के अवसर पर हुए पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन में वो ज़्यादा कुछ नहीं बोल पाए.

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अमित शाह ने बस 11 मिनटों में क़रीब क़रीब वही बात कही, जो उन्होंने 23 जनवरी को पटना में ही कर्पूरी ठाकुर जयंती पर कही थी.

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फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि उस समय भाजपा के कार्यकर्ताओं में जोश था. पार्टी को दिल्ली चुनावों की हार का झटका नहीं लगा था और जीतन राम मांझी बिहार के मुख्यमंत्री थे.

जबकि इस बार नीतीश कुमार अपने 'बड़े भाई' लालू प्रसाद यादव की दी बैसाखी के सहारे सत्ता में हैं.

23 जनवरी की बैठक में अमित शाह के सामने अति पिछड़ा वोटर थे, क्योंकि बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर इसी तबके से आते थे.

मांझी का मोर्चा

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14 अप्रैल की बैठक में अमित शाह की नज़र दलित मतदाताओं पर थी.

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बकौल पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, उनकी पार्टी महादलित मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के अपमान का बदला लेगी.

याद रहे कि कुछ दिन पहले तक यही मोदी इन्हीं जीतनराम मांझी को जेल भेजने की बात करते रहे थे.

बात असल में दलित वोट की है और मांझी की हिंदुस्तान आवाम मोर्चा खुद 20 अप्रैल को पटना में एक रैली करने जा रही है.

वोट बैंक

बिहार की करीब आधी आबादी अति पिछड़ा और दलितों की है.

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अगर 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए सीएसडीएस की रिपोर्ट पर विश्वास करें तो करीब 53 फ़ीसदी अति पिछड़ा वोट भाजपा, रामविलास पासवान की लोजपा और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी वाले गठबंधन को मिला.

इस गठबंधन को 42 फ़ीसदी दलितों और 78 फ़ीसदी अगड़ी जातियों के वोट मिले. भाजपा इस वोट बैंक को बचाकर रखना चाहती है.

दूसरी तरफ जनता दल (यू) को 18 फ़ीसदी अति पिछड़ा और 20 फ़ीसदी दलित वोट मिले.

जनता परिवार

आरजेडी, कांग्रेस और एनसीपी के गठजोड़ को अति पिछड़ों और दलितों के भी 10-10 फ़ीसदी वोट मिले थे.

अब अगर जेडीयू और आरजेडी के वोट बैंक को जोड़ दिया जाए तो ये कहा जा सकता है कि अभी भी इन दो पार्टियों के पास अति पिछड़ा और दलित वोटों का एक चौथाई से कुछ ज़्यादा वोट है.

लेकिन आज मांझी एक खिलाड़ी बन कर उभरे हैं. भाजपा की पूरी कोशिश है कि नए बनने वाले जनता परिवार के दलित वोट अपने पाले में खिसका लिए जाएं.

लेकिन अंदर ही अंदर ये डर भी है कि कहीं नीतीश-लालू के वोट काटने के साथ साथ मांझी भी भाजपा के दलित वोट में सेंध न लगा दें.

पिछड़ा वोट

वैसे भी भाजपा को 42 फ़ीसदी दलित वोट कभी नहीं मिला, जबकि नीतीश और लालू को हमेशा अच्छी ख़ासी तादाद में दलित वोट मिले हैं.

भाजपा अति पिछड़ा वोट को सुरक्षित करने के बारे में भी पूरी ताक़त लगा रखी है.

नरेंद्र मोदी के पिछड़ा होने का कार्ड चलने के बावजूद भाजपा को 53 फ़ीसदी ही अति पिछड़ा वोट मिल पाया, जबकि पार्टी को कुछ और उम्मीद थी.

पार्टी को 2014 में अगड़ी जातियों के 78 फ़ीसदी वोट मिले थे. इनकी आबादी करीब 15 फ़ीसदी है.

चुनाव का माहौल

आरजेडी-कांग्रेस के गठजोड़ को यादवों के 64 फ़ीसदी वोट मिले थे, जबकि भाजपा को 18 फ़ीसदी.

लालू-नीतीश के साथ साथ आ जाने के बाद लगभग 17 फ़ीसदी मुसलमान मतदाताओं के सामने इस बार कोई दुविधा नहीं होगी.

अगर बिहार में यही स्थिति रही तो लड़ाई बहुत कांटे की होने वाली है.

इसलिए भाजपा, जो एक जाति के नाम पर होने वाली रैलियों का 1990 के दशक में विरोध करती थी, अब इस तरह की सबसे ज़्यादा रैलियां कर रही है.

लेकिन अभी बिहार के लोगों में चुनाव जैसा माहौल नहीं बन पा रहा है. अभी तो उनका साबका मौसम से है.

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