'आप हमारी पार्टी है हम इससे क्यों अलग हों'

स्वराज संवाद

स्वराज संवाद के नाम से मंगलवार को दिन भर की बैठक के बाद आम आदमी पार्टी के बाग़ी गुट ने फैसला किया एक स्वराज अभियान चलाने का.

बाग़ी नेता योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने इसे एक ग़ैर-राजनीतिक समूह कहा. संवाद से पहले चर्चा हुई थी एक नई पार्टी के गठन की.

लेकिन यादव और भूषण के सामने कोई और विकल्प नहीं था. हाँ, उन्होंने इसे एक नई शुरुआत ज़रूर कहा.

अगर वो इस समय एक नई पार्टी बना भी देते, तो शायद दो-चार महीने के बाद यादव और भूषण के खिलाफ तानाशाह होने की अंदर से आवाज़ें उठने लगतीं- ठीक उसी तरह जैसे आज ये दोनों नेता अरविंद केजरीवाल के खिलाफ तानाशाही का इलज़ाम लगा रहे हैं.

'हम क्यों अलग हों'

सम्मलेन में कई राज्यों से 4 हज़ार के क़रीब कार्यकर्ता आए थे जिनमें से 75 प्रतिशत ने पार्टी में रह कर संघर्ष करने की सलाह दी.

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पंजाब से एक बड़े दल से हमारी बातचीत हुई. उनका कहना था आम आदमी पार्टी 'हमारी पार्टी है हम इससे क्यों अलग हों'.

उनका कहना था उन्होंने अपनी पक्की नौकरियां छोड़ कर पिछले तीन साल से इस पार्टी की जी-जान से सेवा की है. अरविंद केजरीवाल से वे नाराज़ ज़रूर थे लेकिन वे पार्टी से अलग नहीं होना चाहते थे.

कौन है हीरो?

कई कार्यकर्ताओं की वफादारी केजरीवाल और यादव के खेमों के बीच विभाजित थी. वो दोनों में दोबारा मिलाप चाहते थे. उनका हाल वैसा ही था जैसा शिव सेना के कार्यकर्ताओं का साल 2006 में था जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना इससे अलग होकर एक अलग पार्टी बनी.

गुड़गांव में हुए सम्मलेन में मौजूद तमाम कार्यकर्ता कल तक केजरीवाल, यादव और भूषण को अपना आदर्श और अपना हीरो मानते थे. लेकिन आज उन्हें ये तय करना था कि वो इनमें से किसे हीरो माने और किसे खलनायक.

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एक ने केजरीवाल के हस्ताक्षर वाला अच्छे कार्यकर्ता होने का एक प्रमाणपत्र दिखाया और आशंका वाले भाव से पूछा, "पिछले 65 साल से सभी पार्टियों ने आम आदमी को बेवक़ूफ़ बनाया है, आम आदमी पार्टी हमारी पार्टी है लेकिन आज हमें समझ में नहीं आ रहा है कि क्या हम एक बार इस्तेमाल किये जा रहे हैं?"

एक महिला लेखक ने कहा वो किसी गुट में नहीं हैं लेकिन पार्टी की वफादार हैं. मैंने जब कहा कि आप सम्मलेन में आकर ये सिद्ध कर रही हैं कि आप यादव और भूषण की समर्थक हैं तो उन्होंने कहा वो चाहती हैं कि पार्टी जिन सिद्धांतों पर बनी है उस पर क़ायम रहे.

विचारधारा की लड़ाई

नज़दीक में खड़े दिल्ली विश्विद्यालय के एक प्रोफेसर ने कहा दोनों खेमों के बीच विचारधारा की लड़ाई है लेकिन ये लड़ाई नेताओं के बीच सीमित है और हम दोनों के मिलाप के पक्ष में हैं'

सम्मलेन में मौजूद अधिकतर लोग पढ़े लिखे बुद्धिजीवी नज़र आ रहे थे जो उसूलों, सिद्धांतों और विचारधाराओं की बातें कर रहे थे.

उनमें से कई खुद को आदर्शवादी कह रहे थे. वे इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि वो आम आदमी पार्टी में सत्ता हासिल करने के लिए शामिल नहीं हुए थे बल्कि सामाजिक न्याय और परिवर्तन लाने के लिए पार्टी में शामिल हुए थे.

वहां 'आम आदमी' कम ही नज़र आया. रिक्शा वाले, पटरी वाले, मज़दूर और ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले आम आदमी, पार्टी की ख़ास ताक़त है. वो अब भी केजरीवाल के साथ हैं.

इस सम्मलेन से केजरीवाल के खेमे में कोई खास खलबली नहीं मचनी चाहिए. पार्टी के आम कार्यकर्ताओं के अलावा इसके जाने माने चेहरे, सांसद और विधायक केजरीवाल के साथ हैं.

ये वो गुट है जो आदर्शवाद का दामन नहीं छोड़ रहा है लेकिन छोटे-छोटे समझौते करके अपने उसूलों की क़ुरबानी देने को तैयार ही नहीं, इस पर अमल भी कर रहा है.

ऐसा लगता है कि यादव और प्रशांत उस गुट का नेतृत्व कर रहे हैं जो पार्टी को अब भी एक अभियान और एक आंदोलन मान कर चल रहा है.

केजरीवाल उन लोगों के नेता हैं जो समझते हैं कि आंदोलन ख़त्म हो गया है, पार्टी दिल्ली में चुनाव लड़ कर दोबारा सत्ता में आ चुकी है और अब समय है ये दिखाने का कि किया वो 2013 वाली अपने 49 दिन वाली सरकार से कुछ सीखे हैं या नहीं.

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