'शिव सेना की इज़्ज़त दांव पर थी'

शिव सेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे अपने परिवार के साथ इमेज कॉपीरइट PTI

मुंबई में बांद्रा (ईस्ट) के उप-चुनाव में महाराष्ट्र की दो दिग्गज पार्टियों की इज़्ज़त दांव पर थी. इस सीट के लिए हुए विधानसभा उप चुनाव में शिव सेना को जीत मिली है और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण राणे को हार.

ये इलाक़ा न केवल शिव सेना का गढ़ रहा है, बल्कि पार्टी के पूर्व प्रमुख बालासाहब ठाकरे का घर भी यहीं है. पार्टी के वर्तमान प्रमुख उद्धव ठाकरे भी यहीं रहते हैं.

अगर शिव सेना ये सीट हार जाती तो बालासाहब ठाकरे के पुराने वफ़ादारों के साथ ही उद्धव के लिए भी ये एक बड़ा झटका होता.

अच्छे अंतर से जीत हासिल करके सेना ने अपना सम्मान बचा लिया है. लेकिन यह चुनाव इतना ख़ास क्यों था?

नगरपालिका चुनावों की दिशा

इसकी सबसे बड़ी वजह थी कि यह पहला चुनाव था जिसमें दक्षिणपंथी पार्टियों के बीच मुक़ाबला था. और इस चुनाव से दो साल के अंदर होने वाले नगरपालिका चुनावों की दिशा तय हो सकती है.

भाजपा की कमान जबसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह के हाथ में आई है तब से यह साफ़ है कि दोनों नेताओं के शिव सेना से सहज संबंध नहीं है.

दोनों ने सेना और उद्धव को नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ा है. भाजपा से अपमानित और निराश शिव सेना ने पलटवार करने की ठानी.

दोनों दलों के बीच गठबंधन ख़तरे में पड़ गया और मोदी के वफ़ादार चाहते थे कि इस चुनाव में सेना को हार मिले ताकि गठबंधन में भाजपा का पलड़ा भारी हो जाए.

अगर राणे जीत जाते तो कांग्रेस को भी एक नया हथियार मिल जाता.

पहचान का संकट

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शिव सेना सचमुच पहचान के संकट से गुज़र रही थी. सेना नेता संजय राउत ने हाल ही में बयान दिया था कि मुसलमानों से वोट देने का अधिकार छीन लेना चाहिए और उन्हें परिवार नियोजन पर ज़्यादा जोर देना चाहिए.

ये बयान पार्टी के अतिवादी हिन्दूवादी संगठन की छवि को दोबारा हासिल करने के लिए दिए गए थे.

क़रीब छह महीने पहले विधान सभा चुनावों से पहले जब भाजपा और शिव सेना गठबंधन टूटा तो सेना मुंबई और महाराष्ट्र में अपना आधार तलाश करने की कोशिश कर रही थी.

शिव सेना में इस बात की दुविधा कि वो अपनी मराठी मानुष की पहचान पर ज़ोर दे या अपनी ताज़ा अर्जित हिन्दुत्ववादी छवि पर.

उद्धव ने मराठी पहचान पर ज़ोर दिया लेकिन विधान सभा चुनाव में उन्हें इसका ख़ास फ़ायदा नहीं मिला. और चुनाव परिणामों को देखने के बाद ये दुविधा मिट गई.

फ़ैसले में देरी

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शिव सेना ने महाराष्ट्र सरकार में शामिल होने का फ़ैसला लेने में क़रीब एक महीने का समय लिया था.

इससे पार्टी की छवि को धक्का लगा और उसके सामने पहचान का संकट गहरा हो गया.

संजय राउत की कोशिश थी कट्टर हिन्दूत्व का मुद्दा वापस चर्चा में आए. क्योंकि भाजपा की इस बात के लिए आलोचना हो रही थी कि वो अपने मुस्लिम विरोधी रुख में नरमी ला रही है.

दरअसल, संघ परिवार ने तो अपना मुस्लिम विरोधी प्रचार चालू रखा है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे भाव नहीं दे रहे हैं.

राउत की कोशिश

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शिव सेना नेता राउत की कोशिश है कि मुस्लिम-विरोध पर संघ के कट्टर हिन्दूत्ववादी गुट को करीब लाएं और सेना के अंदर हिन्दू पहचान पर ज़ोर दें.

लेकिन शिव सेना की किसी अन्य नेता ने राउत का साथ नहीं दिया.

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