रफ़ाएल सौदे में क्यों नफ़ा नहीं: 5 आशंकाएं

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तीन देशों का दौरा शुक्रवार को समाप्त हो गया.

इसमें उन्होंने भारत के पुराने मुद्दों जैसे सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहयोग, चरमपंथ के ख़िलाफ़ अभियान जैसे विषयों पर एक कदम आगे ही बढ़ाया है.

लेकिन रक्षा क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण घोषणा रफ़ाएल लड़ाकू विमान को लेकर की गई है.

सरकार और कई सुरक्षा विशेषज्ञ इसे महत्वपूर्ण और अच्छा सौदा करार दे रहे हैं तो कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह देश हित में नहीं है.

रक्षा मामलों के जानकार अजय शुक्ला के मुताबिक वह पांच वजहें जिनकी वजह से रफ़ाएल सौदा भारत के हित में नहीं है.

1. स्वदेशीकरण को धक्का

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सुरक्षा को लेकर भारत की दीर्घकालिक नीति यह है कि देश अपनी सुरक्षा को लेकर स्वावलंबी हो जाए. इसके लिए देश में हैलीकॉप्टर, लड़ाकू विमान बनाने की क्षमता विकसित की जाए.

इसके तहत एक हल्का लड़ाकू विमान तेजस बनाया गया था. फिर एक मध्यम लड़ाकू विमान और रूस के साथ मिलकर एक पांचवीं पीढ़ी का उन्नत लड़ाकू विमान बनाने की भी योजना थी.

(सुनिए पूरी बातचीत)

निर्माण उद्योग की क्षमता बढ़ाने के लिए ज़रूरी था कि मध्यम श्रेणी के लड़ाकू विमान को भारत में ही बनाया जाए.

लेकिन इस योजना को दरकिनार करते हुए प्रधानमंत्री ने फ्रांस से पूरी तरह तैयार विमान ख़रीदने का ऐलान कर दिया. इससे भारत को निर्माण का मौका नहीं मिलेगा इस तरह स्वदेशीकरण को यह बड़ा धक्का है.

2. मंत्रालय की नाकामी

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भारत के रक्षा मंत्री का यह कहना कि वह टेंडर मंगवाने के बजाय सीधे सरकार से ख़रीद करेंगे एक तरह से ख़रीद प्रक्रिया को ठीक से लागू कर पाने में मंत्रालय की नाकामी की स्वीकारोक्ति है.

हर देश टेंडर प्रक्रिया को अपनाता है. सब अपनी ज़रूरत के हिसाब से नीति बनाते हैं और उन्हें लागू करते हैं.

रक्षा मंत्री ने एक तरह से मान लिया है कि रक्षा उत्पाद ख़रीद की जो प्रक्रिया हम अपनाते हैं वह इतनी ख़राब है कि उसमें गड़बड़ हो ही जाती है.

3. महंगा और विकल्पहीन

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मंत्रालय की नई नीति का मतलब यह हुआ कि टेंडर नहीं मंगवाएंगे. हम सामान खरीदने के लिए सीधे वहां की सरकार से बात करेंगे.

लेकिन यह बात तो सब्ज़ी ख़रीदने वाला भी जानता है अगर आप एक ही दुकानदार से सामान लोगे तो आपको महंगा मिलेगा और एक से ज़्यादा से बोली लगवाओगे तो सस्ता मिलेगा.

तो रक्षा मंत्रालय ने जिस नई नीति का ऐलान किया है उसका मतलब यह हुआ कि हमें विकल्प कम मिलेंगे और सामान महंगा मिलेगा.

4. एचएएल नहीं तो कौन?

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यह कहना आसान है कि भारत की एकमात्र जहाज़ बनाने वाली कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड अच्छे जहाज़ बनाने में बहुत ज़्यादा समय लगाती है, ठीक से काम नहीं करती.

लेकिन अगर आप यह कहें कि 50 साल का अनुभव कुछ नहीं है और एक ऐसी कंपनी जिसके पास इस काम का कोई अनुभव नहीं है वह आकर उन्नत लड़ाकू विमान बना देगी और उनका रखरखाव भी कर पाएगी- तो यह किसी हाल में नहीं हो पाएगा.

5. दशकों का अनुभव चाहिए

प्रधानमंत्री मोदी के साथ रिलायंस (एडीएजी) प्रमुख अनिल अंबानी और उनके समूह के अधिकारी भी गए थे. उन्होंने रफ़ाएल बनाने वाली कंपनी के साथ बातचीत भी की थी.

यह बेहद उन्नत तकनीक का क्षेत्र है और इसमें विशेषज्ञता और अनुभव जुटाने में दशकों का समय लगता है.

फिर जो प्राइवेट कंपनी आ भी रही हैं उनमें से कई का प्रोजेक्ट पूरे करने का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है.

सरकार को निजी क्षेत्र को ज़रूर मौका देना चाहिए लेकिन इसमें जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए.

(बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद से बातचीत पर आधारित. ये अजय शुक्ला के निजी विचार हैं)

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