'मसर्रत आलम...ख़ुश तो बहुत होंगे'

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Image caption कश्मीरी अलगाववादी नेता मसर्रत आलम.

अगर जंगल में पेड़ गिरे और कोई आसपास सुनने के लिए न हो तब भी क्या उसके गिरने से कोई आवाज़ होगी?

ये एक गंभीर सवाल है. इसका सही जवाब तो है, हाँ, होगी लेकिन इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि आवाज़ की परवाह करने वाला कोई आसपास नहीं होगा.

भारत में इस समय कुछ ऐसी ही कहानी कश्मीर से आने वाली ख़बरों की है.

जिस ख़बर से पूरा देश एकजुट और क्रोधित हो जाता है और जिससे हमारे राष्ट्रवाद का निर्माण होता है उसे कुछ यूँ बयान किया जा सकता है, "एक आदमी के हाथ में एक झंडा है. ये वो झंडा नहीं है जिसे हम उसके हाथ में देखना चाहते हैं, ये कोई दूसरा ही झंडा है. और ये देश की सबसे बड़ी ख़बर है."

झंडे वाला आदमी

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'झंडा पकड़ा हुआ आदमी' इतना महत्वपूर्ण है कि इस ख़बर के नीचे इस हफ़्ते की दो दूसरी बड़ी ख़बरें दब सी गईं. एक, तीन देशों की यात्रा से लौटे हमारे प्रधानमंत्री जो अपने साथ कई गिफ़्ट भी लाए हैं, जिनमें लड़ाकू विमान भी शामिल हैं.

दूसरा, राहुल गांधी की 56 दिनों के चिंतन अवकाश के बाद गुपचुप वापसी. राहुल ने क्या इस दौरान जंगल में पेड़ गिरने वाले सवाल पर भी चिंतन किया होगा?

लेकिन जिस आदमी ने भारत की प्रमुख ख़बरों का ख़ाका तय किया वो हैं कश्मीर के पाकिस्तानी झंडाधारी मसर्रत आलम, जिन्हें फिर से कुछ दिनों के लिए जेल भेज दिया गया है.

मसर्रत ख़ुश तो बहुत होंगे कि वो कितनी आसानी से कश्मीर की सत्ताधारी पार्टियों में सिर-फुटौव्वल कराने में सफल रहे और उनके लिए राष्ट्रीय ख़बर बनना कितना आसान हो सकता है.

आम तौर पर कुछ ज़्यादा ही नरम लोगों का समूह समझी जाने वाली कांग्रेस भी छाती पीट-पीट कर मसर्रत के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग करने लगी.

हेडिंग का चुनाव

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इंडिया टुडे में छपा कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह का बयान था, "सरकार को हमें बताना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने मसर्रत आलम साहब को किस क़ानूनी धारा के तहत गिरफ़्तार किया है?"

सिंह ने आगे कहा, "उन्होंने जो कहा और किया है वो देश के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने के बराबर है. उनपर नैशनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत मामला दर्ज होना चाहिए."

एक झंडा उठाना युद्ध छेड़ने के बराबर हो गया? कैसे? बहरहाल, सिंह के अतिरेक भरे कमेंट में से इंडिया टुडे ने सबसे ख़ास हिस्सा चुना और उसे हेडिंग बना दी, "कांग्रेस नेता ने मसर्रत आलम को 'साहब' कहा."

अब ये तो नहीं कहा जा सकता कि भारत अपरिपक्वता और बेवकूफ़ी के मामले में पिछड़ा हुआ है. इस मामले में हमारी विकास दर दुनिया में सबसे ज़्यादा है.

कट्टरपंथी नेता का तर्क

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'द हिन्दू' अख़बार के अनुसार मसर्रत ने इस आरोप से इनकार किया है.

अख़बार ने छापा है, "राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि निरोधक क़ानून का मामला दर्ज किए जाने के बाद हुर्रियत कट्टरपंथी नेता ने स्पष्टीकरण दिया कि उन्होंने पाकिस्तान का झंडा नहीं फहराया था और उन पर इसके लिए मामला नहीं दर्ज किया जाना चाहिए. ये गिलानी का स्वागत समारोह था. कुछ नौजवानों के हाथ में पाकिस्तान का झंडा था. इसके लिए मुझे कैसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है?"

चार साल तक पब्लिक सेफ़्टी एक्ट के तहत जेल में रहने के बाद मसर्रत आलम मार्च, 2015 में रिहा हुए थे. उन्होंने कहा, "ये राज्य में आम चलन है. ये किसी एक आदमी का काम नहीं है. किसी एक आदमी को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराना मेरे हिसाब से ठीक नहीं है."

मसर्रत का बयान हमारे बारे में भी कुछ कहता है, कि एक कट्टरपंथी भी भारत की मुख्यधारा से ज़्यादा तार्किक हो सकता है.

विश्वसनीयता का प्रमाणपत्र

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इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि टीवी चैनल पिछले 48 घंटे से इस ख़बर से चिपके हुए हैं और आने वाले कई घंटों तक भी वो इससे चिपके रहेंगे जब तक कोई और इस खेल को समझ नहीं जाता.

हमें इस बात का अहसास ही नहीं है कि हम किसी को कितनी आसानी से विश्वसनीयता और प्रामाणिकता दे देते हैं.

मसर्रत इस समय कश्मीरी इस्लामी कट्टरपंथियों के निर्विवाद नेता बन गए हैं. और इसके लिए उन्हें बस इतना करना पड़ा कि किसी को एक झंडे के साथ खड़ा करवा देना पड़ा.

हमें आने वाले कई सालों तक उनकी तरफ़ से ऐसी कई चीज़ें देखने को मिल सकती हैं.

सभ्य देश, सभ्य नागरिक

विश्व कप फ़ाइनल के बाद मैंने अपने एक लेख में लिखा था कि क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के चेयरमैन वैली एडवर्ड को सुनना चाहिए.

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Image caption बांग्लादेशी क्रिकेट खिलाड़ी

एडवर्ड ने कहा था, "मेरे लिए विश्वकप की ख़ास बात रही एथनिक समूहों का अपनी-अपनी टीमों के समर्थन में मैदान में आना. ऑस्ट्रेलिया में भारतीय दर्शकों का समर्थन अविश्वसनीय रहा."

उन्होंने आगे कहा, "बांग्लादेशी पूरे ऑस्ट्रेलिया से अपनी टीम (यानी बांग्लादेश) को सपोर्ट करने आ रहे हैं."

तब मैंने लिखा था, "ये हैं एक सभ्य देश के एक सभ्य व्यक्ति. आप कल्पना कीजिए कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष ने भारत में रहने वाले बांग्लादेशियों के लिए ऐसा कहा होता तो...पूरा गाँव मशाल और भाला लेकर निकल पड़ा होता, और अर्णब गोस्वामी भी उनके साथ होते."

ख़ैर, ये इंडिया है....

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