सुभाष चंद्र बोस की हत्या हुई या मृत्यु?

  • 19 अप्रैल 2015
पंडित नेहरू के साथ सुभाष चंद्र बोस. इमेज कॉपीरइट netaji research bureau
Image caption पंडित नेहरू के साथ सुभाष चंद्र बोस.

भारत की स्वतंत्रता के लिए आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व करने वाले सुभाष चंद्र बोस की मौत एक रहस्य बनी हुई है. हाल में इस मुद्दे पर फिर राजनीतिक हलकों और बुद्धिजीवियों के बीच तीखी बहस छिड़ गई है.

आख़िर 'नेताजी' सुभाष बोस किन परिस्थियां में ग़ायब हुए या फिर उनकी मौत हुई? क्यों कई जाने-माने लोग उनकी मौत की ख़बर पर भरोसा नहीं कर रहे है?

नेताजी सुभाष बोस से संबंधित इन्ही मुद्दों पर है इस बार की विवेचना.

ज़ियाउद्दीन ने इंटेलिजेंस को चकमा दिया

अठारह जनवरी, 1941. रात एक बज कर पैंतीस मिनट पर 38/2, एलगिन रोड, कोलकाता पर एक जर्मन वांडरर कार आ कर रुकी.

कार का नंबर था बीएलए 7169. लंबी शेरवानी, ढीली सलवार और सोने की कमानी वाला चश्मा पहने बीमा एजेंट मोहम्मद ज़ियाउद्दीन ने कार का पिछला दरवाज़ा खोला.

ड्राइवर की सीट पर उनके भतीजे बैठे हुए थे. उन्होंने जानबूझ कर अपने कमरे की लाइट बंद नहीं की. चंद घंटों में वो गहरी नींद में सोए कोलकाता की सीमा पार कर चंदरनागोर की तरफ़ बढ़ निकले.

(सुनेंः 'आमी सुभाष बोलची...')

वहाँ भी उन्होंने अपनी कार नहीं रोकी. वो धनबाद के पास गोमो स्टेशन पर रुके. उनींदी आँखों वाले एक कुली ने ज़ियाउद्दीन का सामान उठाया.

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Image caption महात्मा गांधी के साथ सुभाष चंद्र बोस.

कोलकाता की तरफ से दिल्ली कालका मेल आती दिखाई दी. वो पहले दिल्ली उतरे. वहाँ से पेशावर होते हुए काबुल पहुंचे... वहाँ से बर्लिन... कुछ समय बाद पनडुब्बी का सफ़र तय कर जापान पहुंचे.

कई महीनों बाद उन्होंने रेडियो स्टेशन से अपने देशवासियों को संबोधित किया... 'आमी सुभाष बोलची.'

(पढ़ेंः 'नेता जी की हत्या का आदेश दिया गया था')

अपने घर में नज़रबंद सुभाष चंद्र बोस बीमा एजेंट ज़ियाउद्दीन के भेस में 14 ख़ुफ़िया अधिकारियों की आखों में धूल झोंकते हुए न सिर्फ़ भारत से भागने में सफल रहे बल्कि लगभग आधी दुनिया का चक्कर लगाते हुए जापान पहुंच गए.

दृश्य दो: 'नेताजी आगे से निकलिए'

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दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हो चला था. जापान को आत्मसमर्पण किए हुए अभी तीन दिन हुए थे. 18 अगस्त 1945 को सुभाष बोस का विमान ईंधन लेने के लिए ताइपे हवाई अड्डे पर रुका था.

(पढ़ेंः क्या सुभाष चंद्र बोस 'उग्रवादी' हैं?)

दोबारा उड़ान भरते ही एक ज़ोर की आवाज़ सुनाई दी थी. बोस के साथ चल रहे उनके साथी कर्नल हबीबुररहमान को लगा था कि कहीं दुश्मन की विमानभेदी तोप का गोला तो उनके विमान को नहीं लगा है.

बाद में पता चला था कि विमान के इंजन का एक प्रोपेलर टूट गया था. विमान नाक के बल ज़मीन से आ टकराया था और हबीब की आंखों के सामने अंधेरा छा गया था.

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जब उन्हें होश आया तो उन्होंने देखा कि विमान के पीछे का बाहर निकलने का रास्ता सामान से पूरी तरह रुका हुआ है और आगे के हिस्से में आग लगी हुई है. हबीब ने सुभाष बोस को आवाज़ दी थी, "आगे से निकलिए नेताजी."

(पढ़ेंः गुमनामी बाबा या सुभाष चंद्र बोस)

बाद में हबीब ने याद किया था कि जब विमान गिरा था तो नेताजी की ख़ाकी वर्दी पेट्रोल से सराबोर हो गई थी. जब उन्होंने आग से घिरे दरवाज़े से निकलने की कोशिश की तो उनके शरीर में आग लग गई थी. आग बुझाने के प्रयास में हबीब के हाथ भी बुरी तरह जल गए थे.

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Image caption सुब्रह्मण्यम स्वामी के अनुसार स्टालिन बोस से इसलिए नाराज़ थे क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने हिटलर से हाथ मिलाया था.

उन दोनों को अस्पताल ले जाया गया था. अगले छह घंटों तक नेता जी को कभी होश आता तो कभी वो बेहोशी में चले जाते. उसी हालत में उन्होंने आबिद हसन को आवाज़ दी थी.

(पढ़ेंः 'मैं सुभाष चंद्र बोस तो नहीं हूं')

"आबिद नहीं है साहब, मैं हूँ हबीब." उन्होंने लड़खड़ाती आवाज़ में हबीब से कहा था कि उनका अंत आ रहा है. भारत जा कर लोगों से कहो कि आज़ादी की लड़ाई जारी रखें.

उसी रात लगभग नौ बजे नेता जी ने अंतिम सांस ली थी. 20 अगस्त को नेता जी का अंतिम संस्कार किया गया. अंतिम संस्कार के पच्चीस दिन बाद हबीबुररहमान नेता जी की अस्थियों को लेकर जापान पहुंचे.

पत्नी एमिली फूट-फूट कर रोईं

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Image caption सुभाष चंद्र बोस की पत्नी एमिली और उनकी बेटी अनीता.

1945 मेें ही अगस्त के आख़िरी महीने में नेताजी की पत्नी एमिली अपने वियना के फ़्लैट के रसोईघर में अपनी माँ और बहन के साथ बैठी हुई ऊन के गोले बना रही थीं.

(पढ़ेंः बोस के वंशज क्यों मिले मोदी से?)

हमेशा की तरह वो रेडियो पर शाम का समाचार भी सुन रही थीं. तभी समाचार वाचक ने कहा कि भारत के 'देश द्रोही' सुभाषचंद्र बोस ताइपे में एक विमान दुर्घटना में मारे गए हैं.

एमिली की माँ और बहन ने स्तब्ध हो कर उनकी ओर देखा. वो धीरे से उठीं और बगल के शयन कक्ष में चली गईं, जहाँ सुभाष बोस की ढ़ाई साल की बेटी अनीता गहरी नींद में सोई हुई थीं.

सालों बाद एमिली ने याद किया कि वो बिस्तर के बगल में घुटने के बल बैठीं और 'सुबक सुबक कर रोने लगीं.'

'विमान दुर्घटना का रिकॉर्ड नहीं'

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हालांकि सुभाष बोस के साथ उस विमान में सवार हबीबुररहमान ने पाकिस्तान से आकर शाहनवाज़ समिति के सामने गवाही दी कि नेता जी उस विमान दुर्घटना में मारे गए थे और उनके सामने ही उनका अंतिम संस्कार किया गया था.

(पढ़ेंः पीएमओ नहीं चाहता, नेता जी के बारे में पूछा जाए)

लेकिन भारत में बहुत बड़ा तबका ये मानता रहा कि सुभाष बोस उस विमान दुर्घटना में जीवित बच निकले थे और वहाँ से रूस चले गए थे.

Image caption सुब्रह्मण्यम स्वामी बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ.

भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी कहते हैं कि विमान दुर्घटना के समय ताइवान जापानियों के कब्ज़े में था. उसके बाद उस पर अमरीकियों का कब्ज़ा हो गया. दोनों देशों के पास इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि उस दिन वहाँ कोई विमान दुर्घटना हुई थी.

उन्होंने कहा, "1991 के सोवियत विघटन के बाद एक सोवियत स्कॉलर ने मुझे बताया था कि नेता जी तो ताइवान गए ही नहीं थे. वो साएगोन से सीधे मंचूरिया आए थे, जहाँ उन्हें हमने गिरफ़्तार किया था. बाद में स्टालिन ने उन्हें साइबेरिया की यकूत्स्क जेल में भिजवा दिया था जहाँ 1953 में उनकी मौत हो गई थी."

नेहरू के स्टेनोग्राफ़र की गवाही

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Image caption मोती लाल नेहरू के साथ बोस.

स्वामी नेहरू के स्टोनोग्राफ़र श्याम लाल जैन की शाहनवाज़ जांच समिति के सामने दी गई गवाही का ज़िक्र भी करते हैं.

जैन ने आयोग के सामने कहा था कि 1946 में उन्हें एक रात नेहरू का संदेश मिला कि वो उनसे तुरंत मिलने आ जाएं. उनके निवास तीन मूर्ति पर नहीं बल्कि आसफ़ अली के यहाँ जो उस ज़माने में दरियागंज में रहा करते थे.

जैन के अनुसार नेहरू ने उन्हें ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली के लिए एक पत्र डिक्टेट कराया था जिसमें कहा गया था कि उन्हें स्टालिन से संदेश मिला है कि सुभाष बोस जीवित हैं और उनके कब्ज़े में हैं.

स्वामी के अनुसार स्टालिन बोस से इसलिए नाराज़ थे क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने उनके सबसे बड़े दुश्मन हिटलर से हाथ मिलाया था.

जापान का अजीब अनुरोध

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Image caption महात्मा गांधी के साथ सुभाष चंद्र बोस.

सुब्रह्मण्यम स्वामी ने बीबीसी को बताया कि इसका दूसरा बड़ा सबूत उन्हें तब मिला जब वो चंद्रशेखर के मंत्रिमंडल में मंत्री बने.

उन्होंने बताया, "हमारे पास जापान से अनुरोध आया कि रिंकोजी मंदिर में सुभाष बोस की जो अस्थियाँ रखी हैं, उनको आप ले लीजिए लेकिन एक शर्त पर कि आप इसका डीएनए टेस्ट नहीं कराएंगे."

स्वामी कहते हैं कि उन्हें पता चला था कि इंदिरा गाँधी ने अपने कार्यकाल में नेता जी पर एक पूरी फ़ाइल को अपने सामने फड़वाया (श्रेड करवाया) था. लेकिन इस बात की पुष्टि किसी और सूत्र से नहीं हो पाई है.

'विदेशी ताकतों से संबंध ख़राब होंगे'

Image caption बीबीसी हिंदी के स्टूडियो में अनुज धर (बाएं से पहले) के साथ रेहान फ़ज़ल.

सुभाष बोस की मौत पर 'इंडियाज़ बिगेस्ट कवर-अप' नाम की किताब लिखने वाले अनुज धर कहते हैं कि उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय से मांग की थी कि उन्हें वो दस्तावेज़ उपलब्ध कराए जाएं जिसमें सोवियत संघ में सुभाष बोस के होने की जांच की गई.

अनुज बताते हैं, "पीएमओ ने ये कह कर इसे देने से इंकार कर दिया कि इससे विदेशी ताक़तों से हमारे संबंधों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा."

धर कहते हैं कि विदेशी संबंध तो एक बहाना है. असली भूचाल तो इस देश के अंदर ही आएगा.

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नेता जी के प्रपौत्र और उन पर 'हिज़ मैजेस्टीज़ अपोनेंट' नाम की किताब लिखने वाले सौगत बोस भी कहते हैं कि विदेश से संबंध ख़राब होने की बात गले नहीं उतरती.

उनके अनुसार उन्होंने अपने शोध में पाया कि विंस्टन चर्चिल ने 1942 में सुभाष बोस की हत्या के आदेश दिए थे लेकिन इसका अर्थ ये नहीं हुआ कि इस मुद्दे पर भारत आज ब्रिटेन से अपने संबंध ख़राब कर ले.

स्वामी भी कहते हैं, "पहली बात सोवियत संघ अब है नहीं. उस ज़माने में जनसंहार के ज़िम्मेदार माने गए स्टालिन पूरी दुनिया में बदनाम हो चुके हैं. पुतिन को इस बात की कोई परवाह नहीं होगी अगर स्टालिन पर सुभाष बोस को हटाने का दाग लगता है."

बोस के निजता में सेंध

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सौगत बोस कहते हैं कि उन्हें ये जान कर बहुत आश्चर्य हुआ कि नेहरू के कार्यकाल में इंटेलिजेंस ब्यूरो उनके पिता, चाचा और सुभाष बोस की पत्नी एमिली की चिट्ठियाँ खोलता रहा, पढ़ता रहा और उसकी प्रतियाँ बनाता रहा.

उनका कहना है, "किसी व्यक्ति की निजता में सेंध लगाने का इससे बड़ा उदाहरण नहीं मिलता. और ये तब जब कि निजी तौर पर नेहरू मेरे पिता को बहुत मानते थे. जब भी वो दिल्ली जाते थे, उन्हें अपने यहाँ नाश्ते पर बुलाते थे. कमला नेहरू की अंत्येष्टि में खुद सुभाष चंद्र बोस मौजूद थे."

सौगत बोस ने बताया, "नेता जी ने आज़ाद हिंद फ़ौज की एक रेजिमेंट का नाम नेहरू के नाम पर रखा था और जब 1945 में बोस की कथित मौत की ख़बर आई थी तो नेहरू की आखों से आंसू बह निकले थे."

क्या नेहरू को जानकारी थी?

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सवाल उठता है कि क्या सुभाष बोस के परिवार पर हो रही जासूसी की जानकारी नेहरू को व्यक्तिगत तौर पर थी.

भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ में विशेष सचिव के पद पर काम कर चुके सी बालाचंद्रन कहते हैं कि ये एक ऐसी परंपरा है जो आज़ाद भारत की ख़ुफिया एजेंसियों ने ब्रिटेन से ग्रहण की है.

उन्होंने कहा, "1919 के बाद से ही ब्रिटिश सरकार के लिए कम्युनिस्ट आंदोलन एक चुनौती रहा है. उन्होंने शुरू से ही उन लोगों पर नज़र रखना शुरू किया जिनका कहीं न कहीं सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी से संबंध रहा है."

बालाचंद्रन कहते हैं, "इसी सिलसिले में बोस की भी जासूसी शुरू की गई. एक इनसाइडर के तौर पर मैं बता सकता हूँ कि ख़ुफ़िया एजेंसियों में जो चीज़ एक बार शुरू हो जाती है, वो बहुत लंबे समय तक जारी रहती है."

नेहरू के हाथ से लिखा नोट

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लेकिन अनुज धर बालाचंद्रन के इस आकलन से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि इस तरह की जासूसी नेहरू की जानकारी के बगैर नहीं हो सकती थी.

धर कहते हैं कि आईबी वाले कोई भी काम बिना अनुमति के नहीं करते. सुभाष बोस के बारे में उनका हर नोट आईबी के बड़े अफ़सर मलिक और काव तक पहुंचता था.

अनुज धर के मुताबिक, "मेरे पास ऐसे दस्तावेज़ हैं जिसमें नेहरू ने अपने हाथों से आईबी को चिट्ठी लिख कर निर्देश दिया है कि पता लगाओ कि बोस का पौत्र अमिय बोस जापान क्यों गया है और वहाँ क्या कर रहा है? क्या वो रेंकोजी मंदिर भी गया था?"

नेहरू के मन में संदेह

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Image caption एम जे अकबर

भारतीय जनता पार्टी के नेता और जाने माने पत्रकार एमजे अकबर का मानना है कि इस पूरे प्रकरण से यही संकेत मिलता है कि कहीं न कहीं नेहरू के मन में संदेह था कि बोस उस विमान दुर्घटना में नहीं मरे थे.

अकबर कहते हैं, "कॉमन सेंस कहता है वो अपने परिवार से ज़रूर संपर्क करते. शायद इसलिए नेहरू उनके पत्रों की निगरानी करवा रहे थे."

किन परिस्थितियों में सुभाष बोस की मौत हुई और बीस वर्षों तक उनके परिवार पर क्यों नज़र रखी गई, ये तो उनसे संबंधित दस्तावेज़ सार्वजनिक होने के बाद ही पता चल पाएगा.

लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं उन्होंने इस कहावत को ग़लत साबित करने में एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया कि ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता और अपनी इस मुहिम में बहुत हद तक वो सफल भी रहे.

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