कहानी जो नाच कर कह दी जाए...

कथक नृत्यांगना रचना यादव और उनके समूह की ओर से 'स्वरा' कथक नृत्य प्रस्तुति इमेज कॉपीरइट Other

हाल ही में दिल्ली के मंडी हाउस के कमानी ऑडिटोरियम में कथक नृत्यांगना रचना यादव और उनके समूह ने 'स्वरा' कथक नृत्य प्रस्तुति दी.

रचना यादव एक ऐसे परिवार से आती हैं, जहां साहित्य और संस्कृति को हमेशा प्रोत्साहन दिया गया.

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रचना के माता-पिता, मन्नू भंडारी और राजेंद्र यादव हिंदी साहित्य और लेखन के जाने-माने नाम हैं.

अपने पिता के बारे में रचना बताती हैं, "वे कहते थे कि सागर की बूंद की तरह नहीं बल्कि उसकी लहरों की तरह बनो और अपनी लय में बहो, जितनी बार तुम किनारे से टकराओगे उतने ही मजबूत और बड़े बनोगे."

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रचना कहती हैं कि उनकी माँ मन्नू भंडारी की शास्त्रीय नृत्य में गहरी रुचि है लेकिन कुछ कारणों से वे नृत्य नहीं सीख पाईं.

पर रचना को उन्होंने हमेशा प्रोत्साहित किया. आज रचना को नृत्य साधना करते देख वह बहुत खुश हैं.

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रचना यादव पेशे से इंटीरियर डिज़ाइनर रही हैं. एक बार उन्होंने प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना अदिति मंगलदास का नृत्य देखा और तय कर लिया कि उन्हें नृत्य साधना करनी है.

और अदिति मंगलदास को उन्होंने अपना गुरु मान लिया, इनके अलावा उन्होंने रवि जैन से भी नृत्य की शिक्षा ली है.

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लेखन या पत्रकारिता में नहीं जाने का कारण बताते हुए, रचना कहती हैं, "हमारा घर किताबों से भरा हुआ था. रोज शाम को साहित्य से जुड़ी बैठकें और चर्चाएं हुआ करती थीं. शायद इसी अति की वजह से ही मेरा रुझान लेखन की ओर नहीं हुआ. पर इससे मेरा जुड़ाव बना रहा."

उनके पिता राजेन्द्र यादव हिंदी के सुपरिचित लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार और आलोचक थे.

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इसके साथ ही वह साहित्यिक पत्रिका हंस के संपादक भी थे, जिसकी देख-रेख अब रचना यादव कर रही हैं.

'स्वरा' को अपने माता-पिता को समर्पित करते हुए रचना कहती हैं, उन्होंने हमेशा मुझे चुनने की स्वतंत्रता दी और मेरे चुनाव को प्रोत्साहित किया.

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वे 'रचना यादव कथक स्टूडियो' के नाम से गुड़गाँव में एक डांस एकेडमी भी चलाती हैं.

भारत के आठ शास्त्रीय नृत्यों में से कथक सबसे पुराना है, जिसकी शुरुआत उत्तर भारत से मानी गई है.

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'कथक' एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है, नृत्य और कविता के माध्यम से कहानी कहना.

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उत्तर भारत में मुग़लों के आने पर यह नृत्य शाही दरबार में ले जाया गया. जिसके बाद इस नृत्य शैली में धर्म की अपेक्षा सौंदर्य बोध पर अधिक जोर दिया गया.

कला के शौक़ीन नवाब वाजिद अली शाह के शासन काल में यह नृत्य खूब फला-फूला. कथक में हाथ की मुद्राओं के अलावा पदताल पर अधिक जोर होता है.

कथक में कविता, ग़ज़ल और पंच तत्व को जोड़कर प्रयोग करने वाली रचना यादव ने 36 साल की उम्र में नृत्य सीखना शुरू किया. यह कार्यक्रम 11 अप्रैल को आयोजित किया गया था.

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