किसान रैलीः राहुल के लिए दूसरा मौक़ा !

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औरंगज़ेब का दौर मुग़लों की ताक़त के शिखर के तौर पर भी देखा जाता है. उस दौर में मुग़ल साम्राज्य ताक़त की सबसे ऊंची मंज़िल तय कर चुका था.

औरंगज़ेब की 1707 में मृत्यु के बाद से लेकर आख़िरी मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फर के 1858 में पतन तक मुग़ल साम्राज्य का नाम मिटने में क़रीब 150 साल लग गए.

(पढ़ेंः लंबी छुट्टी के बाद राहुल की घर वापसी)

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स्वतंत्र भारत के 68 साल के इतिहास में कांग्रेस ने भारत पर और नेहरू-इंदिरा गांधी परिवार ने कांग्रेस और भारत दोनों पर इतना लंबे समय तक शासन किया कि अगर पार्टी और परिवार का पतन भी हुआ तो इसमें काफी लम्बा समय लगेगा.

(पढ़ेंः राहुल की 'वापसी' से...)

पिछले साल आम चुनाव में क़रारी हार के बाद भारतीयों को एहसास हुआ होगा कि कांग्रेस और गांधी परिवार को सत्ता के गलियारों में न देखने की आदत डाल लेनी चाहिए.

सत्ता से दूर सही सियासी अखाड़े में दोनों का वजूद अभी बाक़ी है. दोनों को अब पहले से कहीं अधिक एक दूसरे की ज़रुरत है.

पुनर्जीवित कांग्रेस

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कांग्रेस पार्टी का गांधी परिवार के बिना समय से पहले पतन हो सकता है. गांधी परिवार के जानशीं राहुल गांधी उनकी मजबूरी हैं.

(पढ़ेंः क्या राहुल कांग्रेस के बिलावल भुट्टो हैं?)

उधर परिवार को भी लगता है कि एक पुनर्जीवित कांग्रेस के बग़ैर उनका वजूद केवल इतिहास के पन्नों में ही रह जाएगा.

किसी का समय से पहले सियासी मृत्युलेख लिखना मूर्खता होगी. राजनीति एक ऐसा अखाड़ा है जिसमें किसी को अवसर बार-बार मिलता है तो किसी को एक बार के बाद दूसरा मौक़ा नहीं मिलता.

किसान रैली

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रविवार को भूमि बिल के ख़िलाफ़ कांग्रेस की किसान रैली राहुल गांधी के लिए एक ज़बरदस्त मौक़ा है जिसे अब की बार वो किसी हाल में नहीं गंवा सकते वरना उनका राजनीतिक सफ़र ख़त्म हो सकता है.

ज़रा सोचिए किसान इस बिल के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा तो रहे हैं लेकिन उनके पास कोई लीडर नहीं है.

वो 17 मार्च को दिल्ली पर हल्ला बोलने वाले थे लेकिन किसानों का जुटाव नहीं हो सका.

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किसान हताश हैं, निराश हैं. किसी को उनका हाथ पकड़ने की ज़रूरत है- न केवल रामलीला मैदान में या खेतों में बल्कि संसद में भी...

अगर राहुल इस भूमिका को निभाने में सफल हुए तो उन्हें एक नई सियासी ज़िन्दगी तो मिलेगी ही, साथ ही कांग्रेस को एक नया जीवनदान मिलेगा.

और फिर न कोई गांधी परिवार के पतन की बात करेगा और न ही कांग्रेस पार्टी के पतन की...

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