सीताराम बनेंगे सीपीएम के संकट मोचक?

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रविवार 19 अप्रैल को विशाखापत्तनम में ख़त्म हुए सीपीआईएम के अधिवेशन में नौ साल तक पार्टी के महासचिव रहे प्रकाश करात ने नए महासचिव के तौर पर पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी के नाम का प्रस्ताव किया.

पोलित ब्यूरो के ही एक दूसरे सदस्य एस रामचंद्र पिल्लई ने प्रकाश करात के प्रस्ताव का समर्थन करते हुए पार्टी की ओर से सर्वानुमति का ठप्पा लगाकर सीताराम येचुरी को नए महासचिव बनाने का ऐलान किया.

पिल्लई का साथ?

पार्टी के भीतर एक बडा समूह एसआर पिल्लई को महासचिव बनाना चाहता था.

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पिल्लई पार्टी की सबसे मज़बूत केरल इकाई के उम्मीदवार थे. इससे पहले केरल इकाई के सबसे ताक़तवर नेता पिनराई विजयन ने प्रकाश करात और सीताराम येचुरी की अगुवाई में चलने वाली दो लाइनों के संघर्ष में महासचिव प्रकाश करात के पक्ष में सक्रियता बनाए रखी थी.

अभी दो महीने पहले विजयन ने राज्य सचिव के पद से त्यागपत्र दे दिया था, लेकिन उनकी पकड़ केरल इकाई पर ज्यों की त्यों मज़बूत बनी हुई थी.

एसआर पिल्लई की बजाय सीताराम येचुरी के महासचिव बनाये जाने के क्या कारण रहे, यह स्वाभाविक प्रश्न है. माना जा रहा है कि सीपीआईएम पश्चिम बंगाल के नुक़सान से मनोवैज्ञानिक तौर पर उबर नहीं पा रही है.

बंगाल में संघर्ष

पश्चिम बंगाल में अभी सीपीआईएम का एक मज़बूत राज्यव्यापी तानाबाना सुरक्षित है. वहां के पार्टी कार्यकर्ता पूरी ऊर्जा के साथ तृणमूल कांग्रेस से जूझ रहे हैं.

यह एक बड़ी चुनौती है. सीताराम येचुरी का पश्चिम बंगाल के नेताओं पर अच्छा असर रहा है.

उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक की कई भाषाएं जानने वाले सीताराम येचुरी को आम लोग ज्यादा जानते हैं. उनका चेहरा वाम राजनीति का वह लोकप्रिय चेहरा है, जिसे सामने रखकर सीपीआईएम अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए आसानी से अभियान चला सकेगी, ऐसा आम तौर पर लोगों का मानना है.

सोशल मीडिया का प्रभाव

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सीपीआईएम ने हाल के वर्षों में सोशल मीडिया के बढ़ते हुए प्रभाव का आकलन करते हुए यह महसूस किया कि पार्टी की नीतियों और प्रभाव को फैलाने के लिए इसका इस्तेमाल होना चाहिए. इसी नीति का नतीजा है कि सीपीआईएम के अंदर केंद्रीय स्तर पर सोशल मीडिया सेल बनाया गया है, जिसका संयोजन वृंदा करात कर रही हैं.

सोशल मीडिया के महत्व को स्वीकारने का ही नतीजा है कि प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, एसआर पिल्लई, वृंदा करात तथा अन्य कई नेता ट्विटर पर मौजूद हैं.

विशाखापत्तनम के इक्कीसवें अधिवेशन की कार्रवाई के दौरान सीपीआईएम ने राजनीतिक-कार्यनीतिक नीति समीक्षा रिपोर्ट का मसौदा मंजूर कर लिया. दस्तावेज़ में यह साफ़ दिखता है कि पार्टी अब तीसरे मोर्चे जैसे किसी प्रयोग के पक्ष में नहीं है. वह वामपंथी और लोकतांत्रिक शक्तियों को संगठित कर अभियान और संघर्ष के दौरान उनका मोर्चा बनाना चाहती है.

क्षेत्रीय दलों से गठजोड़ नहीं?

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नये राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में सीपीआईएम अब क्षेत्रीय दलों या कांग्रेस से किसी तरह का गठजोड़ नहीं करना चाहती. उसकी राय है कि क्षेत्रीयतावादी सोच से संचालित दलों के सहारे किसी प्रकार के राष्ट्रीय विकल्प की उम्मीद करना बेकार है.

सीपीआईएम अब अपने अलग विकास को लेकर फिक्रमंद है. प्रकाश करात ने अधिवेशन के दौरान यह भी कहा कि जब तक समान मुद्दों पर कोई दल हमारे साथ एक ख़ास समय तक सक्रिय न रहा हो, हम उसे अपने साथ किसी गठबंधन में शामिल नहीं कर सकते.

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उन्होंने तेलगुदेशम पार्टी, ऑल इंडिया अन्नाद्रमुक या बीजू जनता दल जैसी पार्टियों के साथ हाथ मिलाकर राष्ट्रीय विकल्प की योजना को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया. यह गुंजाइश छोड़ी गई है कि चुनाव के मद्देनज़र राज्यों में पार्टी इकाइयां दूसरे लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष दलों से आपसी समझ और सहयोग का रिश्ता बनाएं. लेकिन यह रिश्ता किसी राष्ट्रीय विकल्प वाले लक्ष्य के धरातल पर नहीं होगा.

सीपीआईएम यह मानती है -‘भाजपा जब सत्ता में है तब हमारे हमलों की मुख्य धार उसी पर होनी चाहिए, मगर इसका मतलब कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल बनाना नहीं है. ना ही इस तरह का रुख़ होना चाहिए कि नव-उदार नीतियों से लड़ने का मुख्य काम सांप्रदायिकता से लड़ने के काम के अधीन हो जाए.'

सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़

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यह भी महत्वपूर्ण है कि भाजपा-संघ परिवार की सांप्रदायिकता से लड़ने के क्रम में सीपीआईएम यह मानती है कि सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लड़ाई में जातिगत उत्पीड़न तथा महिला उत्पीड़न के ख़िलाफ़ संघर्षों की ज़रूरत है. हिन्दुत्व की विचारधारा में जाति व्यवस्था और पितृसत्तात्मकता शामिल हैं.

सीपीआईएम का नया नेतृत्व व कार्यकर्ता इस बात से भी उत्साहित हैं कि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे इलाक़ों में अपना प्रभाव रखने वाले सीपीआईएम लिबरेशन और दो सांसदों वाले सोशलिस्ट युनिटी सेंटर ऑफ़ इंडिया भी उसके सहयोगी मित्र-संगठनों की पांत में आ गये हैं. इन दोनों दलों के प्रतिनिधियों ने विशाखापत्तनम के 21वें अधिवेशन में शिरकत की है.

इस अधिवेशन में यह ज़ाहिर हुआ कि सीपीआईएम के सारे देश से आए प्रतिनिधियों में नयी चुनौतियों के सम्मुख बेचैनी और छटपटाहट का भाव है.

इसीलिए सीपीआईएम ने न सिर्फ संघर्ष के नये मुद्दों और ठिकानों को पहचाना है, उसने एक ऐसी दृष्टि भी बनाने की कोशिश की है, जो महज़ सत्ता हासिल करने के लिए न हो.

वह लंबे समय के लिए सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष चाहता है. आनेवाले वर्षों में निश्चय ही यह दिख जाएगा कि महासचिव सीताराम येचुरी के नेतृत्व में नई समझ ने कितना संघर्ष किया और इसकी क्या उपलब्धियां रहीं.

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