भीख के 'कटोरों से छुटकारे' का अकाउंट

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बिहार में भिखारी न केवल बचत करना सीख रहे हैं बल्कि उसे बैंक खाते में सुरक्षित भी रख रहे हैं.

लेकिन सबके लिए यह काम आसान नहीं रहा.

'मोटरी-चोटरी' में पैसे छुपाने से लेकर बैंक खाते तक की यह यात्रा कैसी रही.

पढ़िए पूरी रिपोर्ट

पटना के चितकोहरा ओवरब्रिज के नीचे बने स्लम में रहने वाली जोधा देवी भीख मांग कर गुज़र-बसर करती हैं.

जोधा और वहां रहने वाले कई दूसरे भिखारी इस मायने में ख़ास हैं कि उनके पास बैंक खाता है, जो अब तीन साल पुराना हो चुका है.

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पहली बार बैंक जाने के अनुभव को याद करते हुए जोधा कहती हैं, "उतना ऊंचा में चढ़ने में डर लगा था. डर लगा था कि कोई कुछ बोल देगा, कह देगा, घुसने देगा कि नहीं."

उसी इलाके़ में रहने वाली भिखारिन राबड़ी देवी अपने तजुर्बे के बारे में कुछ इस तरह बताती हैं, "वहां सिपाही था, पुलिस था. बैंक जेल जैसा लगा था. पहली बार बैंक जाने में डर लगा था. करेजा धुकुमुकु किया था."

एक अन्य भिखारी गुल्लू राम गुलगुलिया के मुताबिक़ उन्हें पहली बार बैंक जाते हुए 'धुकधुकी' नहीं हुई थी. बक़ौल गुल्लू बैंक में एसी की ठंडी हवा उन्हें 'फस क्लास' लगी थी.

'चोरी, चूहों का ख़तरा'

साल 2012 में बिहार सरकार की मुख्यमंत्री भिक्षावृति निवारण योजना यानी एमबीएनवाई की शुरुआत हुई थी.

इमामुद्दीन अहमद एमबीएनवाई के परियोजना निदेशक बताते हैं, "इस योजना का मुख्य मक़सद भीख मांग कर जीवन ग़ुजार रहे लोगों को भिक्षावृति से मुक्त कराना है."

इस योजना के तहत भिखारियों के बीच बचत समूह भी बनाए जा रहे हैं. पटना सहित बिहार के तीन जि़लों में भिखारियों के 22 ऐसे समूह बने हैं.

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ऐसे समूह जब नियमित रूप से पैसे जमा करने लगते हैं, और ज़रूरत पड़ने पर जब वो सदस्यों के बीच बांटा जा सकता है तो इन समूहों को बैकों से जोड़ा जाता है.

समूह के हर सदस्य का खाता बैंक भी खुलवाया जाता है.

बैंक में खाता खुलने से पहले यह भिखारी अपने-अपने तरीके़ से पैसों को सुरक्षित रखते थे.

गुल्लू बताते हैं, "पहले मोटरी-चोटरी में बांध कर रख देते थे. लेकिन चोरी होने और भुलाने का खत़रा बना रहता था."

राबड़ी देवी भी कुछ इसी तरह अपनी कमाई सहेजती थीं. लेकिन वह बताती हैं कि इसमें चोरी के साथ-साथ चूहों का भी डर बना रहता था.

'दसखत सीख जाते'

बैंक खाता खुलने के बाद इन्हें आर्थिक मज़बूती और सुविधा मिली है. गुल्लू कहते हैं, "हमें भरोसा है कि बैंक से पैसा कहीं नहीं जाएगा. न डूबेगा, न चोरी होगा. वहां रखे पैसे से हम बहुत कुछ कर सकते हैं."

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हालांकि ये भिखारी अब तक अकेले बैंक नहीं गए हैं. जब वो वहां जाते हैं तो उनके साथ हमेशा एमबीएनवाई से जुड़ा कोई कार्यकर्ता साथ होता है.

योजना से जुड़े एक आउटरीच वर्कर अमर कुमार बताते हैं, "अनपढ़ होने के कारण यह जमा-निकासी फॉर्म आदि भर नहीं सकते तो उनके अकेले जाने में दिक्क़त आ सकती है."

राबड़ी बताती हैं, "यह सोच कर डर लगता है कि अकेले जाने पर पैसा निकलेगा या नहीं. उन्हें बैंक वाले पैसे देंगे कि नहीं."

यह डर दूर करने के लिए, परेशानी से बचने के लिए क्या उन्हें अब पढ़ने-लिखने लायक बनने का मन नहीं करता?

इसके जवाब में वो कहती हैं, "कम-से-कम 'दसखत' करना सीख जाते तो अच्छा रहता. जिससे कि बैंक से पैसा आसानी से निकल जाता."

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