'बिजली, ट्रैफ़िक जाम से भोले बाबा भी हारे'

  • 27 अप्रैल 2015
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दिल्ली से चली काशी-विश्वनाथ एक्सप्रेस सुबह पांच बजे वाराणसी पहुंची और मेरे ज़हन में पिछले साल उत्तर प्रदेश के इस शहर में बिताए कुल 27 दिन दौड़ने लगे.

'बनारस सिर्फ़ एक शहर नहीं, एक संस्कृति है जिसका अपना ही एक मिजाज़ है', ये मुझे शहर के एक लेखक ने साल 2014 में कुल्हड़ में चाय सुड़कते हुए बताया था.

उन दिनों ये प्राचीन शहर एकाएक सुर्ख़ियों में था क्योंकि भाजपा के प्रधानमंत्री प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने इसे अपनी 'कर्मभूमि' बनाने की ठानी थी.

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मोदी के फ़ैसले ने जैसे इस सोते हुए 'शांत' से शहर की आत्मा में जैसे नई जान फूँक दी थी.

बदलाव

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हर गली, नुक्कड़, चौराहे पर चर्चा-ए-आम थे मोदी और अगर वे जीते तो वाराणसी की तस्वीर कैसे बदल सकेंगे.

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मोदी जीते भी और अगले ही दिन वाराणसी पहुँच गंगा किनारे ताल ठोंक कर बोले, "इस पवित्र धरती का नमन करता हूँ. माँ गंगा ने बुलाया है और भारत की सफ़ाई वाराणसी से ही शुरू होगी."

ये तो थी मई, 2014 की बात. अब ज़िक्र 2015 का और अप्रैल महीने के 'बनारस' का.

हालात

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सुबह साढ़े पांच बजे स्टेशन से सिर्फ़ डेढ़ किलोमीटर दूर अपने होटल पहुँचने में 40 मिनट लग गए. बाहर निकलने के दोनों रास्तों पर टेम्पो और रिक्शा वालों की भेड़-चाल ने ये सुनिश्चित किया.

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सिगरा मोहल्ले के पहले पड़ने वाली सब्ज़ी मंडी सुबह छह बजे से गुलज़ार थी और सारा हरा-भरा 'कचरा' बीच सड़क पर ही इकट्ठा हो रहा था.

सड़क पर घूम रहे मवेशियों को भी भूख लगी थी और शायद सब्ज़ी लादने वालों को मोदी के 'स्वच्छ भारत' कैम्पेन की भनक नहीं लगी थी.

होटल वाले ने सुबह ही चेतावनी दे दी, "गर्मी का मौसम है इसलिए शहर में बिजली और ट्रैफिक जाम पर तो भोले बाबा का भी बस नहीं. बजली कटेगी तो एसी नहीं चलेगा और जब ट्रैफ़िक जाम में फंसिए तो रिक्शे से उतर कर पैदल चलने लगिएगा."

साफ़ घाट

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दोपहर में बीवी-बच्ची को गंगा के घाटों की सैर पर ले कर निकला तो देखा कि प्रसिद्ध गुदौलिया चौराहे पर अभी भी कूड़ा तो ढेर है लेकिन कूड़ेदान नदारद.

(पढ़ें- काशी और गंगा की सफ़ाई करनी होगी...)

काशी विश्वनाथ में दर्शन करने वाले कुछ श्रद्धालु गली में प्रवेश करने के पहले रोड किनारे बैठ बाल मुंडवा रहे थे. बाल तो बगल वाली नाली की ही भेंट चढ़ने थे.

हालांकि दशाश्वमेध घाट पर पहुँच कर थोड़ा फ़र्क ज़रूर दिखा क्योंकि पहले की तरह इंसानों की तादाद से कदम ताल करने वाले मवेशी अब वहां नहीं दिखते और सीढ़ियों पर सुबह-शाम झाड़ू मारी जाती है.

अस्सी घाट पर भी पहले के मुकाबले सफ़ाई ज़्यादा दिखी और दरभंगा घाट पर कुछ युवा नदी किनारे सफ़ाई में भी जुटे थे.

मुश्किल डगर

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लेकिन बनारस में 100 के क़रीब घाट हैं और इन सभी को चमका पाना आसान नहीं.

(पढ़ें- मोदी बनारस से जीते)

ख़ासतौर से तब जब घाटों के किनारे बसे मंदिरों के पूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाली फूल-माला नदी में ही बहा दी जाती है और मणिकर्णिका घाट पर आज भी दाह संस्कार संपन्न हो रहे हैं.

हालांकि वाराणसी सिर्फ़ घाटों से कहीं ज़्यादा है और यही वजह है कि कुछ स्थानीय अब इस बात से समझौता करते दिख रहे हैं कि, "बेचारे मोदी जी भी कहाँ बदलाव ला सकेंगे."

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शहर में पिछले छह महीने से नई सीवर लाइनें बिछाने का काम जारी है जिसके चलते सड़क पर चलने वाले गाड़ी-घोड़ों के साथ इंसान भी मिट्टी में सना चलता है.

अभी न तो सड़कों की दोबारा मरम्मत हुई है और न ही सड़क पर झुके हुए बिजली के खम्भे सीधे हो सके हैं.

पुराने शहर वालों को केंद्र सरकार के उस ब्लूप्रिंट के कार्यान्वित होने का भी इंतज़ार है जिसमें पुराने वाराणसी के बाहर सैटलाइट शहर बनाने की योजना है.

सांसद नरेंद्र मोदी का कार्यकाल एक वर्ष छूने को है और बचे हुए चार सालों की ही आस है 'बनारसियों' को.

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