बनेगा इंडिया? बढ़ेंगी नौकरियां?

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"आओ, भारत में बनाओ. आओ, भारत में निर्माण करो", कहा था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल क़िले से स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर.

इसके ठीक 41 दिन बाद सरकार ने निर्माण क्षेत्र में शायद अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी योजना 'मेक इन इंडिया' की घोषणा की.

प्रमुख उद्देश्य है भारत में उत्पादन और नौकरियां बढ़ाना.

ज़ाहिर है, इसमें हुनर सिखाने की बड़ी भूमिका रहेगी और उसके लिए 'स्किल इंडिया' कैम्पेन पर भी बल है.

नौकरियां

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सरकार का लक्ष्य है निर्माण क्षेत्र में हर महीने दस लाख नौकरियां बढ़ाने का.

लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत के निर्माण क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर नौकरियां बढ़ना संभव है.

अगर सरकार औद्योगीकरण और निर्माण में ज़्यादा निवेश करेगी तो नौकरियां भी बढ़ेंगी और सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में इज़ाफ़ा भी हो सकता है.

1950 के दशक में दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था ने ऐसा दौर देखा था जब निर्माण क्षेत्र में 8-9% रहने वाली रोज़गार की दर 1989 में बढ़ कर 28% तक चली गई थी.

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वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भूमि अधिग्रहण बिल पर बहस के दौरान संसद में कहा था कि भारत में इस समय लगभग 30 करोड़ लोग भूमिहीन हैं और भूमि अधिग्रहण बिल पास होने के बाद अधिग्रहित ज़मीन पर उद्योग लगाए जाने से उन सभी को नौकरियां मिल जाएंगी.

लेकिन भारत के औद्योगिक इतिहास पर अगर नज़र डाली जाए तो वित्त मंत्री के बयान का सच्चाई में बदलना लगभग असंभव सा लगता है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, 2012 तक भारत में कामगारों की संख्या 47 करोड़ 30 लाख थी जिनमें लगभग आधे लोग कृषि क्षेत्र से जुड़े थे.

भारत के रिज़र्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 1999-2000 से 2011-12 तक जो नई नौकरियां पैदा हुईं उनमें उद्योग जगत का हिस्सा केवल 1.7 प्रतिशत था. साल 2011-12 में कुल छह करोड़ 40 लाख औद्योगिक मज़दूर थे, जो देश के कुल कार्यबल का केवल 13.6 फ़ीसदी है.

सीएजी की 2014 की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (एसईज़ेड) में जहां बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण बहुत आसानी से कर लिया गया वहां भी नौकरियां उतनी नहीं मिलीं जितना शुरू में दावा किया गया था.

सस्ता कितना?

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दूसरी चुनौती रहेगी भारतीय निर्माण क्षेत्र को अमरीका और चीन जैसी पहले से विकसित महाशक्तियों से बेहतर और सस्ता निर्माण करने की, जिससे न सिर्फ़ घरेलू बल्कि विदेशी बाज़ारों पर पकड़ बन सके.

हालांकि भारतीय उत्पादकों के सामने या तो नवीनतम तकनीक लगाने का विकल्प होगा या फिर चीन जैसे देश से माल आयात करने का विकल्प है- जैसे भारत में मोबाइल फ़ोन उत्पादन करने वाली कम्पनियाँ करती रहीं हैं.

इन दोनों सूरतों में नौकरियां कितनी बढ़ेंगी इस पर अभी बहस जारी है.

'मेक इन इंडिया' के तहत सरकार ने 25 ऐसे क्षेत्र चुने हैं जिनमें निवेश बढ़ाने के बाद उनकी निर्माण क्षमता को अगले सात से नौ वर्षों में बढ़ाए जाने की योजना है.

हर क्षेत्र में नौकरियां बढ़ाने का लक्ष्य और पैमाना दूसरे से अलग है.

लक्ष्य

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मिसाल के तौर पर सरकार वर्ष 2017 तक बायोटेक्नोलॉजी क्षेत्र में साढ़े तीन अरब डॉलर ख़र्च करने का इरादा रखती है.

जबकि चमड़े के क्षेत्र में 2014 तक हो रहे क़रीब पौने दो अरब डॉलर के निर्यात को अगले पांच वर्षों में 24% बढ़ाने की योजना है.

इन सभी क्षेत्रों में निर्माण क्षमता बढ़ाने का मूलभूत उद्देश्य भारत में हुनर सिखाने और नौकरियां बढ़ाने का है.

अब चूंकि ये योजना एक लंबे कार्यकाल की है इसलिए सफलता या असफलता के बारे में प्रारंभिक परिणाम आने में कम से कम दो-तीन वर्ष लग ही जाएंगे.

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