'फ़ेस के बिना ही बनाया फेसबुक अकाउंट'

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

राजस्थान के अलवर ज़िले के चंदौली गाँव की निवासी वर्षा शर्मा ने छह महीने पहले अपना फ़ेसबुक अकाउंट खोला था, लेकिन वे अपने अकाउंट पर अपनी तस्वीर डालने की हिम्मत नहीं जुटा पाईं.

वो कहती हैं, "अगर गाँव में किसी को पता चल गया कि मैं फ़ेसबुक पर हूँ, तो लोग तरह-तरह की बातें बनाएंगे. इसीलिए न तो मैंने अपनी तस्वीर अपने फेसबुक अकाउंट पर डाली और न ही अपनी लोकेशन."

वो कहती हैं, "गाँव के ज़्यादातर लड़के फेसबुक पर हैं और उसके बारे में सबको पता है, लेकिन अगर लड़कियों के फ़ेसबुक पर होने की किसी को ख़बर लग जाए तो बवाल हो जाता है."

वर्षा के घर में कंप्यूटर तो नहीं है, लेकिन वो अपने पिता का स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल कर देश-दुनिया की ख़बर रखती हैं.

चंदौली गाँव अलवर शहर से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर है. गाँव के लोगों को इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए अक्सर अलवर जाना पड़ता था.

लेकिन पिछले साल डिजिटल एम्पॉवरमेंट फ़ाउंडेशन ने इस गाँव में एक कंप्यूटर सेंटर खोला, जहाँ मुफ़्त वाई-फ़ाई के साथ कंप्यूटर शिक्षा दी जाने लगी.

रसगुल्ले की रेसिपी!

Image caption गांव में कंप्यूटर शिक्षा के लिए ज़्यादातर लड़कों को ही भेजा जाता है

वर्षा कहती हैं, "इंटरनेट आने से इस गाँव का कायापलट हो गया, ख़ासतौर पर लड़कियों के लिए. यहां ज़्यादातर लोग अपनी लड़कियों को इंटरनेट इस्तेमाल के लिए अलवर भेजना पसंद नहीं करते थे."

उनके मुताबिक़, "लेकिन अब जब इंटरनेट हमारे गाँव में आ गया है तो लड़कियों को भी एक आत्मविश्वास मिला है कि वे अपने बूते पर दुनिया से जुड़ सकती हैं. अब हमें अपने भाइयों पर निर्भर होने की ज़रूरत नहीं है."

वर्षा ने बताया कि वे इंटरनेट का इस्तेमाल कॉलेज की परीक्षा रिज़ल्ट देखने के लिए और खाने की रेसिपी देखने के लिए करती हैं.

उनके चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ जाती है जब वो मुझे बताती हैं कि उन्होंने पहली बार इंटरनेट से रसगुल्ले की रेसिपी सीखी.

वो कहती हैं, "मेरी माँ को तो यक़ीन ही नहीं हुआ कि इंटरनेट से ये सब भी संभव है. अब मैं और मेरी माँ मिलकर तरह-तरह के व्यंजन इंटरनेट से देख कर पकाते हैं. हालांकि माँ के हाथ के खाने की अलग ही बात है, लेकिन मॉडर्न तौर-तरीके सीखने की एक अलग ही उत्सुकता होती है."

सोच कौन बदलेगा?

इमेज कॉपीरइट THINKSTOCK

वर्षा कहती हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हर भारतीय को इंटरनेट देने की योजना से बहुत उम्मीदें हैं.

लेकिन वो ये भी कहती हैं कि सोच सिर्फ़ प्रधानमंत्री को ही नहीं बल्कि लोगों को भी बदलनी होगी.

गांवों में ही नहीं शहरों में भी कुछ लड़कियां अपने परिजनों के डर से फ़ेसबुक अकाउंट गोपनीय रखती हैं.

वो कहती हैं, "प्रधानमंत्री भले ही हर गाँव में इटरनेट पहुंचाने में कामयाब हो जाएं, लेकिन गाँव वालों की सोच कौन बदलेगा? क्यों ऐसी धारणा है कि अगर लड़कियों को इंटरनेट शिक्षा दी जाए तो वो उसका ग़लत इस्तेमाल करेंगी? क्यों लड़कियों को इतने अवसर नहीं दिए जाते, जितने कि लड़कों को दिए जाते हैं?"

जब मैंने उनसे पूछा कि क्या आने वाले समय में ग्रामीण सोच में बदलाव आने की उम्मीद है, तो वो हल्की सी मुस्कुराई और बोलीं, "ये इंडिया है इंडिया, यहां की सोच ऐसी ही है और शायद ऐसी ही रहेगी."

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