मेक इन इंडिया के रास्ते में कैसी रुकावटें

  • 1 मई 2015
मेक इन इंडिया, नरेंद्र मोदी, निर्मला सीतारमन इमेज कॉपीरइट AFP

अमिताभ कंठ 'मेक इन इंडिया' अभियान के कर्ताधर्ता हैं.

वो कहते हैं, "मेक इन इंडिया घरेलू मार्केट पर फ़ोकस करेगा, साथ ही निर्यात पर भी ध्यान देगा. निर्यात करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि निर्यात से ही निर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) बढ़ेगा."

निर्यात में क़ामयाबी की कहानी पर अक्सर आयात की वजह से पानी फिर जाता है.

भारत जितना माल विदेशी बाज़ारों में बेचता (निर्यात करता) है, उससे कहीं अधिक ख़रीदता (आयात करता) है. यानी भारत जितनी विदेशी मु्द्रा कमाता है उससे कहीं अधिक ख़र्च करता है.

मोदी सरकार की कोशिश है कि निर्यात, आयात से ज़्यादा हो इसीलिए 'मेक इन इंडिया' शुरू किया गया है, लेकिन व्यापारी और विशेषज्ञ कहते हैं कि इस फासले को कम करना काफी कठिन साबित हो सकता है.

'चक्कर काटने पड़ते हैं'

निर्यात में चीन से बहुत पीछे

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नंबर पर है चीन

17

है भारत का स्थान

  • 2252 अरब डॉलर है चीन का निर्यात

  • 342 अरब डॉलर है भारत का निर्यात

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अवधेश राय कपड़ों का निर्यात करते हैं. वे कहते हैं, "हमारी इंडस्ट्री में निर्यातक तो खुश हैं, लेकिन बहुत ऐसी खामियां हैं जिसके कारण बाहर के पूंजीपति यहां आकर निवेश करना नहीं चाहते या जो करना चाहते हैं उन्हें तमाम तरह की समस्याएं आती हैं- दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं, रिश्वतखोरी है."

अवधेश कहता हैं, "'मेक इन इंडिया' को सफल बनाने के लिए इन कमियों को दूर करना होगा."

अर्थशास्त्री मिहिर शर्मा कहते हैं, "जो भी हम बना रहे हैं, चाहे कुर्ते हों, शर्ट हों या चश्मे हों उन्हें हमें सस्ता बनाना होगा, सस्ता कैसे बनाएँगे? फ़ैक्ट्रियों को ज़्यादा कार्यकुशल बनाना होगा और दूसरी बात ये कि रुपये की दर को सस्ता रखना होगा."

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डॉलर के मुक़ाबले रुपए की क़ीमत कम होने पर निर्यातकों के लिए स्थिति बेहतर होती है, क्योंकि विदेशी ख़रीदारों को भारतीय माल सस्ता पड़ता है.

लेकिन ये दोधारी तलवार है, क्योंकि रुपए की क़ीमत कम होने पर आयात करने वालों का बिल बढ़ जाता है.

करेंसी की भूमिका

निर्यात में चीन की क़ामयाबी के पीछे उसकी कमज़ोर करेंसी की बड़ी भूमिका है. चीन पर जान-बूझकर अपनी करेंसी को कमज़ोर रखने के आरोप लगते रहे हैं.

विशेषज्ञ कहते हैं कि डॉलर के मुक़ाबले रुपये की क़ीमत 80 रुपए होनी चाहिए न कि मौजूदा 62 रुपए.

मिहिर शर्मा इस बात के पक्ष में हैं कि यदि निर्यात को बढ़ाना है तो डॉलर के मुक़ाबले रुपये की क़ीमत कम करके 80 रुपये प्रति डॉलर करना होगा.

भारत सर्विसेज़ निर्यात करने वाले देशों में दुनिया में आठवें स्थान पर है. सर्विसेज़ में आईटी, सॉफ्टवेयर, बीपीओ, कंस्ट्रक्शन और पर्यटन क्षेत्र प्रमुख हैं.

भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सर्विस सेक्टर की भागीदारी 57 प्रतिशत है और ये क्षेत्र तेज़ी से आगे बढ़ रहा है.

कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत को आईटी, सॉफ्टवेयर और बीपीओ क्षेत्र में और अधिक ध्यान देना चाहिए ताकि निर्यात में तेज़ी आए.

निर्यात और आयात का संतुलन

दूसरी तरफ, कुछ जानकारों का मानना है कि 'मेक इन इंडिया' में निर्माण के बढ़ने से आयात पर निर्भरता ख़ुद कम हो जाएगी.

निर्यात को बढ़ाने और आयात के बिल को कम करने में सालों लग सकते हैं, लेकिन भारत ने 'मेक इन इंडिया' के ज़रिए निर्यात और आयात के फ़ासले को कम करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है.

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प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में अपनी जर्मन यात्रा के दौरान कहा कि 'मेक इन इंडिया' केवल एक नारा नहीं है बल्कि ये एक राष्ट्रीय अभियान है.

शायद इस अभियान का असर अगले कुछ सालों में निर्यात के क्षेत्र में देखने को मिले.

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