इस मन के भूकंप का क्या करें..

  • 4 मई 2015
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जितेंद्र राउत बीबीसी नेपाली सेवा में काम करते हैं और हाल में आए भूकंप को लेकर उन्होंने अपने अनुभव हमसे शेयर किए हैं.

नेपाल में भूकंप आए दस दिन हो गए हैं. काठमांडू की सड़कों पर गाड़ियों का आना जाना बढ़ गया है. सूरज चढ़ा हुआ है और दिन गरम है.

हम लोग अपने दफ्तरों में काम कर रहे हैं. देशभर से राहत और अन्य प्रयासों की ख़बरें आ रही हैं. लेकिन भूकंप का डर अब भी ज़हन से निकला नहीं है.

कल भी दिन में चार पांच बार छोटे छोटे झटके लगे. ये झटके रिक्टर स्केल पर चार से अधिक तीव्रता के थे.

जो भी हिम्मत बची है बड़े भूकंप के बाद उसको बरक़रार रखने में बहुत मेहनत लग रही है. आज सुबह भी बड़ा झटका महसूस हुआ.

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हालात ऐसे हैं कि ऑफिस के बाहर से कोई बड़ी गाड़ी निकलती है तो लगता है कि बिल्डिंग हिल रही है और लोग सीट से कूदने को आतुर हो जाते हैं. जान इतनी ही कीमती लगती है.

भूकंप आने की आशंका न हो तो भी मन में छोटे छोटे भूकंप आते रहते हैं. मन का भूकंप बहुत परेशान करता है.

दोस्त फेसबुक और ट्विटर पर जोक्स शेयर कर रहे हैं कि मोबाइल वाइब्रेट करता है तो भी डर लगता है.

अपनी बात करूं तो भूकंप के बाद अपने छह मंजिला फ्लैट में अभी तक वापस नहीं गया हूं.

पत्नी के साथ अपने ससुराल में रह रहा हूं. सुबह दफ्तर आ जाता हूं और देर रात ससुराल जाता हूं.

जिन कपड़ों के साथ भूकंप के दिन घर से बाहर भागा था अभी भी वही कपड़े पहन रहा हूं. घर जाकर साफ कपड़े लाने को कोई कहता है तो मैं कहता हूं कि फुर्सत नहीं है.

वैसे मेरा घर दफ्तर से पैदल सिर्फ 15 मिनट की दूरी पर है. लेकिन असल बात है कि डर लगता है.

जिस तरह से पिछले कुछ दिनों में ऑफ्टर शॉक्स आए हैं उससे लगता है कि अगर कपड़े निकालते वक्त फिर कोई बड़ा वाला भूकंप आ गया तो क्या होगा.

मन से भूकंप का डर जाता ही नहीं है. देखते हैं कितने और दिन ये ही हालात बने रहेंगे.

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