हर कोई कर रहा है औरत का 'शुद्धीकरण'

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आजकल गुजरात में एक गैंग रेप पीड़िता अपने शुद्धीकरण की प्रक्रिया से घबराई हुई है. यहां ये बताना ज़रूरी है की अदालत ने इस गैंग रेप से हुए गर्भ को गिराने की इजाज़त नहीं दी है, लिहाज़ा पीड़िता गर्भवती भी है.

ये विडम्बनापूर्ण है कि जो समाज उनका शुद्धीकरण करना चाहता है, वो देवी पूजक समाज है. इस शुद्धीकरण में पीड़िता को दस किलो का पत्थर सर पर रख कर घंटों खड़े रहना पड़ सकता है, गर्म तेल में हाथ डालने से लेकर जूतों की माला पहनने तक का अपमान और पीड़ा झेलनी पड़ सकती है.

अब हम वापस आते हैं अपने शहरी समाज में जहां सीता की अग्निपरीक्षा पर लगभग रोज़ आधुनिकतावादी बुद्धिजीवी बहस करते हैं और रामायण को जी भर के कोसते हैं. ये भी महिलाओं के शुद्धीकरण की ही एक आधुनिक प्रक्रिया है.

आधुनिक आज़ादी

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सीता की अग्निपरीक्षा को कोस कर हम में से बहुतेरे पुरुष स्त्रियों को उनकी आधुनिक आज़ादी लौटा कर उन्हें उनका पुरातनपंथी आस्थाओं से शुद्ध कर रहे होते हैं, कम से कम विचार के स्तर पर. आजकल ये शुद्धीकरण कई तरह का और कई स्तर पर हो रहा है.

विज्ञापनों में औरतों को नौजवान और गोरा बन कर शुद्ध होने की बात की जाती है तो अभिजात्य वर्ग की महिलाओं के लिए माय चॉइस वीडियो ये बतला कर उनका शुद्धीकरण करता है कि वो किसके साथ कब सोएं ये चुनने के लिए आज़ाद हैं. इस तरह कुंवारेपन के खोने से जुड़ी अशुद्धि के भय से आपको छुटकारा मिल सकता है.

सोशल मीडिया पर मासिक धर्म की खूबसूरत तस्वीर लगा कर महिलाओं को माहवारी पर बात करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. आख़िरकार माहवारी से अशुद्धीकरण की एक आस्था तो जुडी ही है. इसकी तस्वीर आपकी निजता का भले ही अतिक्रमण करे लेकिन इस अंधविश्वास से तो आपका शुद्धीकरण कर ही देती है.

शुद्धीकरण की मंशा

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कुल मिला कर यूं लगता है कि सारा समाज हर स्तर पर औरतों के शुद्धीकरण में जुटा हुआ है.

दुखद ये है कि एक गाँव में बलात्कार पीड़िता के शुद्धीकरण के पीछे की मंशा और अत्याधुनिक तकनीकों से प्रोजेक्ट किये जा रहे शुद्धीकरण पीछे के मकसद में कोई ख़ास फर्क नहीं है.

एक देवी के नाम पर औरत की बलात्कार से शुद्धि करना चाहता है तो दूसरा आधुनिकता के नाम पर आपमें कुछ नए ख़्यालात डालना चाहता है.

लेकिन दोनों स्तरों पर औरत एक वस्तु ही है- एक स्थिति में पुरुष के पूरे कब्ज़े में तो दूसरी स्थिति में पुरुष के लिए बेहद आकर्षक मुलम्मे में. यानी स्त्रियों की कीमत पर समाज का शुद्धीकरण किया जा रहा है.

शुद्धीकरण से 'मुक्ति'

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ऐसे में महिलाओं की बराबरी की बात करना बेमानी लगता है. शुद्धीकरण से मुक्ति आज़ादी और बराबरी तक आने के लिए ज़रूरी है विचारों के स्तर पर बदलाव लाने का विमर्श हो.

ज़रूरत स्त्रियों के शुद्धीकरण की नहीं है. शुद्धीकरण की ज़रूरत इस विमर्श को है, जो कहीं न कहीं स्त्रियों को पुरुषों के मज़े की चीज़ में बदल रहा है, चाहें वो स्त्रियों की आज़ादी की ही बात क्यों ना कर रहा हो.

मेरे सामने खेलती ढाई साल की एक प्यारी सी बच्ची को देख कर अक्सर मैं सोच में पड़ जाती हूँ- क्या इसकी पीढ़ी भी स्त्रियों की कीमत पर होते हुए समाज के शुद्धीकरण का एक पाया बनेगी या पुरुष और स्त्री मिल कर इस विमर्श को आम ज़िंदगी का हिस्सा बना पाएंगे जहां औरत के ‘चीज़’ बनने की कोई आशंका या गुंजाइश नहीं होगी.

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