किस राहुल से डरेंगे मोदी ?

  • 6 मई 2015
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नरेंद्र मोदी इस समय भले ही लड़खड़ा रहे हों लेकिन उन्हें फ़ायदा यह है कि उनका मुकाबला उसी पुराने राहुल गांधी से है.

सोनिया गांधी छह मई को कांग्रेस के सांसदों को रात्रिभोज दे रही हैं और इसी के साथ यह बहस भी तेज़ होने वाली हैं कि क्या लोकसभा की करारी हार से पस्त पार्टी को 'नए' राहुल गांधी नेतृत्व देने के काबिल हैं.

लेकिन क्या जिन परिस्थितियों में वह हैं, उनके अलावा नए राहुल गांधी में कुछ नयापन है भी?

'किसी को श्रेय नहीं'

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परिस्थितियां बहुत कुछ बताती हैं. वह अब ऐसे प्रशासन के रिकॉर्ड का बचाव नहीं कर रहे हैं जिसकी छवि भ्रष्ट और नाकारा मानी जाताी रही है.

वह अब उस शासन के रिकॉर्ड पर हमले कर रहे हैं जिसे ग्रामीण असंतोष और ज़मीन से जुड़े मुद्दों पर बहुत उम्मीद के साथ एक साल पहले चुना गया था.

यह मुद्दे भारतीय राजनीति में हमेशा ज़िंदा रहते हैं क्योंकि आबादी का एक बड़ा हिस्सा सीधे या परोक्ष रूप से खेती पर निर्भर है.

हालांकि कांग्रेस के बाहर परिस्थितियां बदल गई हैं लेकिन पार्टी के अंदर नहीं. ऐसे बहुत कम ही राज्य हैं जहां पार्टी के विधानसभा चुनाव जीतने की संभावना वास्तव में है और युवा नेता सिर्फ़ वही हैं जिन्हें राहुल की तरह अपनी विधानसभा सीट विरासत में मिली है.

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राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस, मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के विकल्प के रूप में काम नहीं कर सकती.विकल्प सिर्फ़ एक गठबंधन हो सकता है जिसका एक भाग राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस भी हो.

हालांकि यह वह भूमिका नहीं लगती जो राहुल अपने लिए देखते हैं. 57 दिन छुट्टी के बाद वापस लौटने पर राहुल ने एक रैली को संबोधित किया.

इसमें मुख्यतः हरियाणा से लाए गए किसान थे. राहुल ने कहा, "मैं मोदी को बताना चाहता हूं कि, बस बहुत हो गया."

ऐसा लगता है जैसे देश 57 दिन तक तंद्रा में था और सरकार के खिलाफ़ असंतोष को इंतज़ार था कि वह आएं और इसे व्यक्त करें. दूसरी विपक्षी पार्टियों और उनकी अपनी पार्टी के नेताओं के इस मुद्दे को संसद के अंदर और बाहर उठाने जाने का कोई ज़िक्र तक नहीं था.

अगर राहुल की अपनी पार्टी पर पकड़ कमज़ोर मानी जाए तो सहयोगियों के साथ उनका संबंध लगभग खत्म ही समझिए. रिश्ते का ये तनाव राजनीति में उनकी शुरुआत से ही मौजूद है. अपनी वापसी के बाद उन्होंने एक और संभावित सहयोगी को चिढ़ा दिया है.

इस बार वजह राहुल की एक और मुलाकात थी, जो उन्होंने फ़्लैट ख़रीदरों से की जिनके अधिकारों का 'हनन' रीयल एस्टेट विधेयक से किया जा रहा है.

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टीएमसी सांसद डेरेक ओब्रायन ने तल्खी से कहा, "पांच दिन पहले राज्यसभा में सभी विपक्षी पार्टियां एकजुट थीं कि रीयल एस्टेट विधेयक को सेलेक्ट समिति के पास भेज दिया जाए.यह देखकर चकित हूं कि कौन इसके बहाने चर्चा में रहने की कोशिश कर रहा है."

'मैं की जगह हम'

हालांकि अपनी पार्टी और संभावित सहयोगियों के साथ उनकी समस्याएं कायम हैं, वास्तविकता यह है कि एक डगमगाती सरकार का फ़ायदा उठाने के लिए भी उन्हें अपने घर में ही तैयारी करनी होगी और ऐसे सुनियोजित मोर्चे खोलने होंगे जिनसे लड़कर वे 'अच्छे' नज़र आएं.

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राहुल की यह नई पैकेजिंग, जिसमें वह पुराने से कतई अलग नहीं हैं, मोदी को वास्तविक चुनौती नहीं है. दरअसल अगर वह नए संभावित सहयोगियों से साथ संबंध बनाने में सफल नहीं होते हैं तो ये मोदी के लिए मददगार ही साबित होगा.

वास्तव में मोदी को अगर डरना चाहिए तो उस राहुल से जो अपने अहम् को एक तरफ़ कर अपनी ही पार्टी के कद्दावर क्षेत्रीय नेताओं को साथ लेकर यह सुनिश्चित करें कि कांग्रेस कई राज्यों में मजबूत विपक्ष की भूमिका गंभीरता से निभाएंगी. एक ऐसा राहुल जो 'मैं' की जगह 'हम' का इस्तेमाल करे.

( ये लेखक के निजी विचार हैं)

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