सदियों पुरानी दिल्ली की बावलियां

  • 7 मई 2015
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Image caption 14वीं शताब्दी में बनी दिल्ली की कोटला फ़िरोज़ शाह बावली.

दिल्ली के लाल किले में इन दिनों ऐतिहासिक बावलियों और वॉटर बॉडीज की पुरानी चुनिंदा तस्वीरों की प्रदर्शनी चल रही है.

वर्ल्ड हेरिटेज डे के मौके पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (एएसआई) की ओर से 18 अप्रैल से शुरू की गई इस प्रदर्शनी का नाम है 'वाटर बॉडीज़ ऑफ़ डेल्ही'.

लोगों को पानी की अहमियत और संरक्षण के तरीक़े समझाने के लिए के लिए प्रदर्शनी के अलावा, स्कूली बच्चों की चित्र प्रतियोगिता, हेरिटेज वॉक भी आयोजित हो रहे हैं.

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Image caption 15वीं शताब्दी में बनी कनॉटप्लेस में स्थित उग्रसेन की बावली.

इस फ़ोटो प्रदर्शनी में हड़प्पाकालीन (3000-1700 ई.पू.) जलाशयों की तस्वीरें भी मौजूद हैं.

पुराने समय में गर्मी के मौसम में पानी की कमी को दूर करने के लिए कई कुएं और बावड़ियां (बावलियां) बना कर बारिश के पानी को इकट्ठा किया जाता था.

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Image caption चौदहवीं शताब्दी में बनी दिल्ली की निज़ामुद्दीन बावली.

पानी के प्राकृतिक स्रोतों के सूख जाने के बाद जलापूर्ति में इन कुओं और बावलियों की अहम भूमिका होती थी.

असल में बावली पानी का एक ऐसा विशाल कुंड है, जिसमें पानी तक आने जाने के लिए सीढ़ियां बनी होती हैं.

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Image caption तुगलकाबाद की यह बावली भी 14वीं शताब्दी की बनी हुई है.

देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है.

गुजरात व मध्य प्रदेश में इसे 'बाव' या 'बावली' कहते हैं, राजस्थान में 'बावड़ी' या 'बेरी' कहा जाता है.

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Image caption 16वीं शताब्दी में बनी दिल्ली के पुराना क़िला की बावली.

कन्नड़ में 'कल्याणी' या 'पुष्करणी', मराठी में 'बारव', अंग्रेजी में इस स्टेप वेल कहते हैं.

यह कुएं और बावली का मिला जुला रूप है, इन दोनों के बीच कमरे, बरामदे, खिड़कियां, जालियां, गैलरी आदि होती हैं. इस पूरी इमारत को ही बावड़ी या बावली कहा जाता है.

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Image caption 15वीं से 16वीं शताब्दी के बीच बनी मुनीरका बावली का संरक्षण से पहले की तस्वीर.

ये बावलियां दिल्ली के अलावा राजस्थान और गुजरात के रेगिस्तानी इलाकों में बने शहरों और गांवों में देखी जा सकती हैं.

इसके अलावा मध्यप्रदेश एक ऐसा राज्य है, जहां बड़ी संख्या में बावलियां दिखती हैं.

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Image caption संरक्षण के पहले 16वीं शताब्दी में बनी लाल क़िला बावली.

परंतु वक़्त के साथ-साथ ये बावलियां अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं. इन्हें संरक्षित करने के लिए आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया द्वारा कई प्रयास किए जा रहे हैं.

पुराने समय में राजा, शहंशाह, धनी व्यापारी और बंजारों का बावलियों के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान रहा है.

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Image caption 16वीं शताब्दी की राजों की बाइन बावली.

व्यापार के लिए की जाने वाली लंबी यात्राओं में रात्रि विश्राम के लिए इन्हीं बावलियों का इस्तेमाल किया जाता था.

बावली के पानी के आस-पास बनाए गए बरामदों और कमरों में गर्मी से बचने के लिए पनाह ली जाती थी.

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Image caption 13वीं शताब्दी में बनी बारा हिंदू राव बावली और (दाएं) 14वीं शताब्दी में बनी गंधक की बावली.

इसके अलावा रिहायशी इलाकों में इनका इस्तेमाल पानी की ज़रूरत पूरी करने के लिए किया जाता था.

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Image caption दिल्ली के मेहरौली में 13वीं शताब्दी में बना शमशी तालाब.

अग्रसेन की बावली, निज़ामुद्दीन की बावली, कोटला फ़िरोज़शाह बावली, राजों की बैन (महरौली), गंधक की बावली (महरौली), अनंगताल बावली (महरौली), क़ुतुब की बावली (महरौली), पुराने किले की बावली, तुग़लकाबाद किले की बावली, लाल किले की बावली, बंजारों की बावली, पीर ग़ालिब बावली और बाड़ा हिंदू राव आदि.

इस प्रदर्शनी को 18 मई 2015 तक देखा जा सकता है.

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