मोदी और ममता के 'मेल' का राज़

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कहा जाता है कि राजनीति में न तो दोस्ती स्थायी होती है और न ही दुश्मनी. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कड़वाहट भरे रिश्तों में अचानक घुलती मिसरी ने एक बार फिर इस कहावत को चरितार्थ कर दिया है.

इन दोनों नेताओं के बीच अब तक 36 का आंकड़ा रहा है. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र में अब यह बदल कर 63 होता जा रहा है.

इन विश्लेषकों और विपक्षी राजनीतिक दलों का आरोप है कि मोदी को ‘दंगा बाबू’ और ‘बिना दिमाग का नेता’ कहने वाली ममता उनके पहले बंगाल दौरे को लेकर जितनी उत्साहित हैं, उससे भी यह बात साबित होती है.

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पिछले महीने भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिलाफ पश्चिम बंगाल में आयोजित एक रैली में ममता ने मोदी और उनकी सरकार को खरी-खोटी सुनाई थी.

अब तक मोदी, उनकी अगुवाई वाली केंद्र सरकार और भाजपा को लगातार कोसने वाली ममता मोदी की अगवानी के लिए एयरपोर्ट पर तो रहेंगी ही, उनके साथ बैठक करेंगी और कोलकाता और आसनसोल में दो कार्यक्रमों में भी शिरकत करेंगी.

ममता कोलकाता से मोदी के साथ ही हेलिकॉप्टर से आसनसोल जाएंगी. मोदी की अगवानी के लिए ममता ने अपने पहले से तय कुछ कार्यक्रमों को भी टाल दिया है. आखिर क्या है दोनों के बीच पनपते इस ताजा समीकरण की वजह?

दरअसल, इस साल मार्च में दिल्ली में इन दोनों नेताओं के बीच हुई पहली मुलाक़ात के बाद ही रिश्तों की बर्फ पिघलने के संकेत मिलने लगे थे.

नज़दीकी के संकेत

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राजनीतिक विश्लेषक सुमित मित्र कहते हैं, "कई ऐसी बातें हैं जो इन दोनों की बढ़ती नजदीकी का ठोस संकेत देती हैं. इनमें सबसे प्रमुख है शारदा घोटाला. यह जांच अचानक किसी नामालूम वजह से धीमी हो गई है. इस मामले में गिरफ़्तार तीन प्रमुख अभियुक्तों (जो तृणमूल कांग्रेस नेता थे) को बीते दिनों जमानत मिल चुकी है."

उनके मुताबिक़, बर्दवान बम विस्फोट मामले पर भी दोनों दलों के बीच युद्धविराम हो गया है.

मित्र कहते हैं कि हालिया निकाय चुनावों में हिंसा और धांधली के अंदेशे से प्रदेश भाजपा की ओर से बार-बार केंद्रीय बलों को भेजने की मांग करने के बावजूद केंद्र सरकार ने यहां एक भी बटालियन नहीं भेजी.

दरअसल केंद्र सरकार ममता को नाराज नहीं करना चाहती थी.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एक-दूसरे से करीबी बढ़ाना दोनों नेताओं की मजबूरी है.

राजनीतिक ज़रूरत

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कोलकाता के एक कॉलेज में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "राज्यसभा में जीएसटी समेत कई विधेयकों को पारित कराने के लिए मोदी को ममता के साथ की जरूरत है. आपसी हितों को साधने की जरूरत ने ही दोनों के रिश्तों को मधुर बनाया है." एक अन्य विश्लेषक सुमित मित्र भी चक्रवर्ती का समर्थन करते हैं.

ममता और मोदी के बीच बढ़ती इस क़रीबी के मुद्दे पर विपक्षी राजनीतिक दलों ने ममता पर हमले तेज कर दिए हैं.

सीपीएम के प्रदेश सचिव सूर्यकांत मिश्र आरोप लगाते हैं, "ममता और मोदी के बीच गोपनीय तालमेल है. आपस में लड़ने का नाटक करने की बजाय अब उन दोनों को खुलेआम अपनी दोस्ती का इजहार कर देना चाहिए."

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी कहते हैं, "मोदी को अपने जनविरोधी विधेयकों के लिए तृणमूल कांग्रेस की मदद की ज़रूरत है जबकि दीदी को सीबीआई के शिकंजे से बचने के लिए मोदी की जरूरत है."

सवालिया निगाहें

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दूसरी ओर, भाजपा ने इन आरोपों को निराधार बताया है. भाजपा विधायक शमीक भट्टाचार्य कहते हैं, "संघीय ढांचे में विकास के सवाल पर किसी मुख्यमंत्री की प्रधानमंत्री से मुलाक़ात एक सामान्य बात है. इसका शारदा चिटफंड घोटाले की जांच से कोई लेना-देना नहीं है."

अब अंदर की बात चाहे कुछ भी हो, मोदी और ममता के बीच बढ़ती इस करीबी पर हैरत भरी और सवालिया निगाहें तो उठ ही रही हैं.

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