राजद के बाहर कहां तक जा पाएंगे पप्पू यादव?

पप्पू यादव

राष्ट्रीय जनता दल से बाहुबली सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव का निष्कासन कोई इत्तेफाक नहीं है.

इसकी बुनियाद मार्च में ही पड़ गई थी, जब पार्टी लाइन के खिलाफ जीतनराम मांझी की सरकार बचाने में पप्पू यादव ने पूरी ताकत झोंक दी थी.

उस मुहिम में उन्हें कामयाबी भले ही नहीं मिली, लेकिन राजनीतिक दरिया में उम्मीदों का एक अलग मांझी मिलते ही, उनकी महत्वाकांक्षा हिलोरें लेने लगी.

प्रभाव क्षेत्र

पप्पू यादव राजद में लालू प्रसाद का वारिस होने का दावा खुलेआम करने लगे थे.

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जनता दल परिवार के विलय की प्रक्रिया के बीच उन्होंने बागी तेवर इसलिए भी दिखाए ताकि वह विलय के बाद राजद के चुनाव चिह्न पर दावा ठोक कर उसके नेता बन सकें.

यही दावा मांझी भी करते रहे हैं कि वह जदयू के चुनाव चिह्न पर दावा करेंगे. पप्पू के निष्कासन के पीछे यह तकनीकी कारण भी है.

पप्पू यादव का उदय बिहार में लालू प्रसाद का शासन कायम होने के समय ही हुआ.

वह पूर्णिया, सहरसा, मधेपुरा, अररिया और सुपौल इलाके में लगातार सक्रिय रहे. पूर्वोत्तर बिहार के इन इलाकों में वह अपना प्रभाव कायम करने में भी कामयाब रहे हैं.

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यह भी कारण रहा कि लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की लहर के बावजूद वह मधेपुरा और उनकी पत्नी रंजीता रंजन कांग्रेस के टिकट पर सुपौल से जीत हासिल करने में कामयाब रहीं.

साल 2004 में लालू प्रसाद की मधेपुरा से जीत सुनिश्चित कराने में भी पप्पू यादव की अहम भूमिका रही, जबकि उन दिनों वह जेल में थे.

यही कारण था कि मधेपुरा सीट खाली करने के बाद लालू प्रसाद ने पप्पू यादव को उपचुनाव में उम्मीदवार बनाया और वह जीत गए. जाहिर है, पप्पू के निष्कासन का प्रभाव पूर्वोत्तर बिहार में राजद की सेहत पर पड़ेगा.

लालू और नीतीश

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बिहार का पूर्वोत्तर इलाका यादव- मुस्लिम बहुल है. इस इलाके से लालू प्रसाद को हमेशा ताकत मिलती रही है. बीते लोकसभा चुनाव में राजद को सभी चार सीटें पूर्वी बिहार से ही मिली.

इनमें तीन मसलन मधेपुरा, अररिया और भागलपुर पूर्वोत्तर इलाके से हैं. पप्पू यादव का इतना व्यापक प्रभाव नहीं है कि वह इन सभी चार सीटों पर राजद की जीत के कारक बने हों.

ज़ाहिर है कि लालू प्रसाद का कद बड़ा है और बिहार में माई यानी मुस्लिम-यादव समीकरण के प्रणेता भी लालू ही हैं. ऐसे में पप्पू यादव के लिए बड़ी सेंध लगा पाना आसान नहीं होगा.

पूर्वोत्तर बिहार की मंडलवादी राजनीतिक में सत्ता संघर्ष से पड़ी दरार के कारण अतिपिछड़ों की गोलबंदी यादव प्रभावी राजनीति के खिलाफ हुई.

इसी गोलबंदी ने उस इलाके में नीतीश कुमार की मजबूत जमीन तैयार की. लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की लहर के कारण अतिपिछड़ा वोट बैंक में दरार पड़ी तो इसका फायदा राजद को मिला.

लेकिन अब जबकि लालू प्रसाद और नीतीश कुमार साथ आ गए हैं तो फिर मंडलवादी गोलबंदी के आसार बढ़ गए हैं, ऐसे में पप्पू यादव अपने लिए कोई बड़ी जगह बना पाएंगे, ऐसा संभव नहीं दिखता.

लालू प्रसाद के शासन काल को भाजपा जंगलराज करार देती रही है. उस कथित जंगलराज के नायकों में पप्पू यादव का नाम हाल तक भाजपा के लोग लेते रहे हैं.

पप्पू और मांझी

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पप्पू यादव आज जीतनराम मांझी के साथ हैं. भाजपा मांझी को चुनाव में तीसरी ताकत के बतौर उतरने की संजीवनी देकर चुनावी मंझधार का अपना मांझी बनाने की रणनीति पर काम कर रही है.

ऐसे में नीतीश कुमार खेमे को एक अलग मुद्दा अपने विरोधियों के खिलाफ मिल सकता है.

राजनीति में पद और कद का अटूट संबंध है. राजद में रहते पप्पू यादव के साथ पार्टी की ताकत भी जुड़ी थी. अब पार्टी से निकाले जाने के बाद राजद के नेता और कार्यकर्ता उनसे किनारा कर सकते हैं.

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वह राजद से बड़ी संख्या में नेता या कार्यकर्ता तोड़ पाएंगे ऐसी संभावना कम ही है. ऐसे में पप्पू यादव की पकड़ और पैठ की असली परीक्षा अब होगी.

बहरहाल, ढाई दशक तक लालू प्रसाद की छतरी के नीचे पले- बढ़े पप्पू यादव की नई पारी को मांझी पार लगा पाएंगे या नहीं, यह भविष्य बताएगा.

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