'धीमी गति वाले भारत में है रिश्तों का मोल'

संयुक्त राष्ट्र की शिक्षा और संस्कृति संस्था, यूनेस्को के मुताबिक़ साल 2012 में चीन से क़रीब दो लाख और भारत से क़रीब एक लाख छात्र अमरीका गए. वहीं चीन से भारत आनेवाले छात्रों का आंकड़ा था 682 और भारत से चीन जाने वाले छात्रों का 204.

यानि अरबों की आबादी वाले इन मुल्कों के बीच विश्वविद्यालयों में पढ़ाई करनेवाले छात्रों का आना-जाना बेहद कम है. पर जो ये फ़ैसला करते हैं कैसा है उनका अनुभव और उनके मन में कैसी है इन देशों की छवि?

Image caption ली के, चीनी छात्र

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में चीनी छात्र ली के अंतर्रराष्ट्रीय संबंध विभाग में एम ए कर रहे हैं.

उन्हें भारत आए चार साल हो गए हैं पर मई की चिलचिलाती धूप, उन्हें अब भी परेशान करती है. चीन में ऐसा मौसम उन्होंने कभी नहीं देखा. पर मौसम के अलावा भी भारत में कई बातें थीं जो ली के की सोच के परे निकलीं.

उन्होंने कहा, "चार साल पहले जब मैं दिल्ली पहुंचा और एयरपोर्ट से बाहर निकला तो मुझे लगा कि ये विकसित शहर नहीं है. मेरे मन में तो भारत की राजधानी की छवि हमारे बड़े शहरों - शंघाई और बीजिंग जैसी थी पर दिल्ली ऐसी नहीं है."

Image caption पू बाइलू, चीनी छात्र

उनके दोस्त पू बाइलू जेएनयू में हिन्दी में बीए किया है. अंग्रेज़ी से ज़्यादा वो हिंदी बोलने में सहज महसूस करती हैं.

उनके मुताबिक़ वो भारत आने को बेहद उत्साहित थीं और यहां रहने का अनुभव अच्छा भी रहा पर उन्हें समय को लेकर लापरवाही नापसंद है.

पू बाइलू कहती हैं, "यहां कोई समय की परवाह नहीं करता. अगर कोई आपसे कहे पांच मिनट तो मतलब आधा घंटा भी हो सकता है. ये रवैया मुझे बिल्कुल नापसंद है."

Image caption चांग यांग, चीनी छात्र

पू बाइलू की ही तरह चांग यांग भी मानते हैं कि चाहे सरकारी दफ़्तर जाएं या ग़ैर-सरकारी टालमटोल का रवैया मिलता है.

लेकिन अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर रहे चांग यांग ने कहा, "भारत की सबसे अच्छी बात है मानवीय रिश्ते. यहां लोग एक-दूसरे की बहुत मदद करते हैं. मैं जब यहां आया तो सबसे बड़ी दिक्क़त भाषा की थी. लेकिन मेरी क्लास के और छात्रों ने समय निकालकर मुझे सब कुछ समझाया. अगर वो नहीं होते तो मैं यहां पांच साल नहीं रह सकता था."

Image caption बियातृषा मुखोपाध्याय, भारतीय छात्र

भारतीय छात्र अनुकृति, बियातृषा और विकास चीन के पेकिंग विश्वविद्यालय में पढ़ रहे हैं. वहां के पढ़ाई के स्तर से बेहद खुश हैं.

पर अपने ढंग का भोजन न मिल पाना एक बड़ी समस्या बना हुआ है.

चीनी भाषा की पढ़ाई कर रहीं बियातृषा मुखोपाध्याय कहती हैं, "खाने में तेल का बहुत इस्तेमाल किया जाता है, जो मुझे नापसंद है. यहां जिस तरह का खाना खाया जाता है, उसकी आदत नहीं है हमें तो अच्छा नहीं लगता."

Image caption अनुकृति, भारतीय छात्र

चीन में हर तरीक़े का नॉन वेजिटेरियन खाना खाए जाने से अनुकृति भी अजीब महसूस करती हैं.

पर चीनी साहित्य की पढ़ाई कर रहीं अनुकृति को भारत के मुकाबले चीन में एक बात बहुत ख़ास लगती है.

वो कहती हैं, "चीन बहुत सुरक्षित देश है, और मुझे घूमना बहुत पसंद है तो यहां किसी भी जगह जाने में डर नहीं लगता."

Image caption विकाश कुमार सिंह, भारतीय छात्र

बिहार के सीतामढ़ी से चीन गए 32 साल के विकास कुमार सिंह आठ साल से चीन में रह रहे हैं.

वो बताते हैं कि भारत में रहते हुए उन्हें अंदाज़ा ही नहीं था कि विकास के मामले में चीन भारत से कितना आगे है.

विकास कहते हैं, "जब मैं 2007 में आया तो चीन का विकास देखकर दंग रह गया. भारत में रहते हुए मैंने कभी नहीं सोचा था कि चीन भारत से इतना आगे होगा."

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