'दरअसल, सलमान को काउंसिलिंग चाहिए'

  • 10 मई 2015
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जो लोग मुंबई के उपनगरीय इलाक़े बांद्रा में रहते हैं, वो सलमान ख़ान की लोकप्रियता के बारे में अच्छी तरह जानते हैं. मैं भी कई सालों तक इस इलाक़े में रह चुका हूं.

बॉलीवुड के तीनों मशहूर ख़ान बांद्रा में ही रहते हैं लेकिन सलमान उन सबमें सबसे अलग हैं.

ख़त्म नहीं हुई है सलमान की कहानी..

शाहरुख ख़ान का बंगला मन्नत बहुत बड़ा है और मेन रोड पर इसका गेट दूर से ही दिखाई पड़ता है. हालांकि आम तौर पर घर के बाहर उनके कुछ ही प्रशंसक देखे जाते हैं.

जबकि आमिर ख़ान के घर पर इससे भी कम प्रशंसक दिखाई देते हैं, हो सकता है कि जानबूझ कर ऐसा हो, क्योंकि बाकियों के मुक़ाबले वो अपने आप में ही ज़्यादा रहने वाले व्यक्ति हैं.

लेकिन सलमान के घर के बाहर हमेशा ही प्रशंसकों की एक भीड़ मौजूद रहती है, चाहे वो छुट्टी का दिन हो, त्योहार या सप्ताहांत हो. उनमें एक स्टार पॉवर है.

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सलमान की लोकप्रियता की तस्दीक बांद्रा का पोस्ट ऑफिस भी करता है.

जिस अख़बार में मैं काम करता था, उसमें ख़बर छपी थी कि सलमान के नाम आने वाली चिट्ठियों और उपहारों की संख्या, बाकी दोनों अभिनेताओं के नाम आने वाले पत्र संदेशों से कहीं ज़्यादा हुआ करती थी. (उस समय मेल का ज़माना नहीं था.)

अगर मैं ठीक से याद कर पा रहा हूं तो सलमान को आने वाले संदेशों की संख्या शाहरुख़ और आमिर को आने वाले संदेशों से चार-पांच गुना ज़्यादा हुआ करती थी.

उन्हें जिस मामले में सज़ा हुई है, उस दुर्घटना के एक साल या उससे कुछ अधिक समय पहले, ऐश्वर्या के पिता ने हमारे अख़बार से सम्पर्क किया था.

ऐश्वर्या राय के साथ हंगामा

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वह अपनी बेटी को लेकर चिंतित थे, जिनका उस समय सलमान के साथ अफ़ेयर चल रहा था और सलमान का व्यवहार उस बुज़ुर्ग आदमी को डरा रहा था.

उनके अनुसार, सलमान आधी रात को प्रकट हो जाते और दरवाज़ा न खुलने पर उसे तोड़ना ही शुरू कर देते थे.

यह वही समय था जब ऐश्वर्या ने ये रिश्ता ख़त्म करने का फ़ैसला कर लिया था, लेकिन सलमान ऐसा नहीं चाहते थे.

अज़ीज़ मिर्ज़ा द्वारा शाहरुख़ और ऐश्वर्या को लेकर बनाई जा रही फ़िल्म के सेट पर एक दिन सलमान आ धमके और हंगामा खड़ा कर शूटिंग को रुकवा दिया.

इससे शाहरुख ख़ान गुस्सा तो नहीं, लेकिन खीझ गए और बाद में दोनों के बीच संबंध कटु भी हुए.

यह वही समय था जब ख़ान के फ़ार्म हाउस में एक जंगली जानवर को ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से क़ैद कर रखने की ख़बर आई थी और इससे कुछ साल पहले ही एक जंगली हिरन को मारने की ख़बर आई थी.

निगरानी की ज़रूरत

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इसलिए सालों से यह स्पष्ट रहा है कि यह आदमी परेशानी पैदा करने वाला है और इसकी काउंसलिंग किए जाने या इस पर निगरानी रखे जाने की ज़रूरत है.

असल में बॉलीवुड के अंदर के लोग उनका समर्थन करता रहा है और उन्हें प्रोत्साहन दिया जाता रहा है.

पिछले दिनों उनकी सज़ा के बाद, गायक अभिजीत जैसे बॉलीवुड के अंदरूनी लोगों ने पीड़ितों पर ही ‘सड़क पर’ (हालांकि ऐसा नहीं था) सोने और अपनी मौत ख़ुद बुलाने के आरोप मढ़े.

वो ऐसा कर रहे हैं और सलमान के समर्थन में वो ऐसा करना जारी रखेंगे, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि घटना की वजह क्या थी.

बॉलीवुड दुनिया के तीन सबसे सफलतम फ़िल्म उद्योगों में एक है. दो अन्य हैं हॉंगकॉंग और हॉलीवुड.

इन सभी में स्टार सिस्टम है, लेकिन बॉलीवुड का स्टार सिस्टम बहुत छोटा है.

सितारों की दुनिया

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केवल चार या शायद पांच लोग सफलता की गारंटी दे सकते हैं, यानी फ़िल्म रिलीज़ होने के बाद पहले के कुछ दिन में होने वाला कलेक्शन...

ये वो समय होता है जिसमें फ़िल्म का सफल या असफल होना तय होता है.

ये लोग इस इंडस्ट्री में बेतहाशा ताक़तवर लोग हैं. यह स्वाभाविक है कि यह ताक़त उन्होंने अपनी मेहनत से हासिल की है.

अमिताभ बच्चन ने अपने बेटे को प्रमोट करने के लिए चाहे जितना दम लगाया, इससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ा. वह उन्हें ख़ानों जैसा सफल नहीं बना सके क्योंकि भीड़ ने उन्हें सलमान, शाहरुख़ और आमिर की तरह स्वीकार नहीं किया.

लेकिन इस ताक़त का एक अंदरूनी पहलू भी है. बॉलीवुड के अंदर के अन्य सभी लोगों को, चाहे वह निर्देशक, गायक, मेकअप मैन हों और चाहे वो जितने भी प्रतिभाशाली हों, इन स्टारों में से किसी एक के साथ अपनी प्रतिबद्धता जोड़नी ही पड़ती है.

या फिर, अन्य लोगों की तरह छोटी यानी सस्ती फ़िल्मों में काम करने का समझौता करना पड़ता है.

हालांकि गुलज़ार और निर्देशक अनुराग कश्यप की तरह इसके कुछ अपवाद भी हैं, लेकिन इनकी संख्या ज़्यादा नहीं है.

इंडस्ट्री में वफ़ादारी

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स्टार के घेरे में मौजूद अधिकांश लोगों के लिए यह रिश्ता परजीवी जैसा है और तभी तक अस्तित्व में रहता है जब तक सरपरस्ती क़ायम रहती है, ठीक वैसे ही जैसे मुग़ल बादशाहों का आशीर्वाद हुआ करता था.

असल में, इसमें सम्पूर्ण और बिना शर्त वफ़ादारी की उम्मीद की जाती है.

हॉलीवुड के उलट यहां स्टार फ़ैसला करता है कि वह किसके साथ काम करेगा और यह अन्य चीज़ों पर भी लागू होता है.

उदाहरण के लिए सलमान का परिवार, उनके प्रोजेक्टों में नियमित रूप से ख़ुद को शामिल करता है, क्योंकि स्टार फ़िल्म के लिए केवल अहम ही नहीं होता, बल्कि वह अपने आप में एक संपूर्ण फ़िल्म होता है.

एक दशक पहले जब हिंदुस्तान टाइम्स मुंबई में शुरू हुआ था तो इसकी पहली मुख्य कहानी सलमान की ऐश्वर्या के साथ बातचीत की पुलिस रिकॉर्डिंग के बारे में थी, जिसमें उन्होंने अपने अंडरवर्ल्ड के संबंधों का हवाला देकर धमकाया था.

बॉलीवुड की एकता

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जिस पुलिस ने सलमान के फ़ोन की ग़ैरक़ानूनी रूप से रिकॉर्डिंग की थी, बाद में वही पलट गई. लेकिन क्राइम रिपोर्टर जेडे ने इसकी ख़बर बनाकर भेज दी थी. (डे की बाद में गोली मारकर हत्या कर दी गई.)

इस बातचीत के मजमून को हमारे अख़बार ने छापा, जिसमें सलमान ने प्रीति ज़िंटा के बारे में कुछ अपशब्द कहे थे.

वह इतना गुस्सा हुईं कि जिस अख़बार ने मजमून छापा था उस पर मानहानि का दावा कर दिया, न कि सलमान पर, जिसने वो टिप्पणियां की थीं.

बॉलीवुड का 'इमोशनल अत्याचार'

लेकिन इस सप्ताह सज़ा के बाद प्रीति ने सलमान का समर्थन करने के लिए अपनी टीम का बेंगलुरू में होने वाला मैच तक छोड़ दिया.

मुझे इससे ज़रा भी ताज्जुब नहीं हुआ.

हमें बॉलीवुड से सलमान के बारे में निष्पक्ष या संतुलित नज़रिए की उम्मीद नहीं करनी चाहिए और उन बातों को भी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, जो सलमान और संजय दत्त सरीख़े सितारों के बारे में कही जाती हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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