रेडियो बजता था तो खाना ठंडा हो जाता था

बीबीसी हिन्दी के पुराने प्रस्तोता
Image caption बीबीसी हिन्दी सेवा के सदस्य(खड़े, बाएँ से दाएँ) गोपाल भनोत, पुरुषोत्तम लाल पाहवा, रत्नाकर भारतीय, मार्क टली(प्रोग्राम ऑर्गेनाइज़र), गौरी शंकर जोशी, आले हसन, (बैठे हुए, बाएँ से दाएँ) हिमाँशु कुमार, सुषमा दत्ता और ओंकार नाथ श्रीवास्तव.

अपरिचित स्टेशन ढूँढ-ढूँढकर उनके कार्यक्रम सुनने का चस्का मुझे बचपन में ही लग गया था.

लेकिन यह कहना मुश्किल है कि बीबीसी मेरी स्वतंत्र खोज थी या पिताजी को सुनते देखकर मिली प्रेरणा.

बचपन के स्मृति-सागर में गोता लगाया तो बीबीसी की कई आव़ाजों के साथ पिताजी को बैठे पाया- कई बार इतने ध्यानमग्न कि सामने रखा खाना ठंडा हो गया.

मुझे ऐसी कई शामें याद हैं जब अपनी थाली को वे अंदर वाले कमरे में ले गए, जहाँ हमारा छोटा-सा मरफ़ी रेडियो रखा रहता था.

उनके पीछे-पीछे जाकर किसी ख़बर या टिप्पणी का एकाध वाक्य सुनकर मुझे लगता था जैसे मैं एकदम बड़ा हो गया हूँ और दुनिया को समझने लगा हूँ.

दुनिया का झरोखा

Image caption दारा सिंह का इंटरव्यू लेते रत्नाकर भारतीय.

साठ के दशक की बड़ी-बड़ी घटनाएँ मेरे लिए रेडियो वाले कमरे में बीबीसी के ज़रिए ही सजीव बनीं. दो युद्ध, एक अमरीकी राष्ट्रपति की हत्या, नेहरू की मृत्यु इतने विवरणों और आश्वस्त आवाज़ों में लिपटी हैं मानो हमारे छोटे-से नगर में घटी हों.

शॉर्ट वेव पर हमेशा और ठीक समय पर सफलता नहीं मिलती. आज भी होता है कि आप पूरी एकाग्रता से सुई घुमा रहे हैं और इस बीच ख़बरें निकली जा रही हैं.

मगर 'आजकल' की परिचय-ध्वनि के बीच रत्नाकर भारतीय की आवाज़ में इस कार्यक्रम का शीर्षक सुनकर दिलासा मिलता था कि अभी कुछ नहीं बिगड़ा है.

उनके मुँह से हिन्दी सुनकर यकायक यह अहसास पैदा होता था कि बोलने का अंदाज़ कैसे किसी छोटी से छोटी बात में कौतुहल और उत्साह डाल देता है.

बात रखने का अर्थ

Image caption गुरु दत्त और गीता दत्त का इंटरव्यू लेते आले हसन.

इसी तरह आले हसन की आवाज़ आज भी मुझे बताती है कि अपनी बात ठीक-से रखने का क्या अर्थ होता है. उनके लगभग हर वाक्य में उच्चारण की बारीकी और अदब का मेल महसूस होता था.

बच्चों के लिए कार्यक्रम आकाशवाणी के हर केंद्र से इतवार की सुबह प्रसारित होते थे. पर बीबीसी पर अशोक रामपाल के बाल-कार्यक्रम की बात अलग थी.

भैया-दीदी की नाटकीय चाशनी से एकदम मुक्त इस बाल-कार्यक्रम को हर हफ़्ते सुनने की आदत ने ही मुझे बीबीसी का नियमित श्रोता बनाया.

कई वर्षों के बाद मैंने जाना कि इस कार्यक्रम की परिचय-धुन 'बेबी ऐलिफैंट्स वॉक' से ली गई थी. अशोक रामपाल तब तक बीबीसी छोड़कर अमरीका जा चुके थे और मैं विश्वविद्यालय के हॉस्टल के एक तंग कमरे में आ पहुँचा था. रेडियो का स्थान ट्रांज़िस्टर ने ले लिया था.

दुनिया के हर कोने में

Image caption अशोक रामपाल तैराकी का प्रशिक्षण ले रहे बच्चों के साथ.

इस नए यंत्र का फ़ायदा यह था कि मैं कहीं भी जाऊँ बीबीसी सुनना संभव बना रहता था.

चुस्त संपादन और सहज प्रस्तुति का आकर्षण मुझे हिन्दी सेवा से दुनिया के उन कोनों में जोड़े रहा जहाँ अंग्रेज़ी के प्रसारण सुनना कहीं ज़्यादा आसान था.

टोरंटो के हॉस्टल में एक भारी-भरकम शॉर्ट वेव रेडियो विदेशी छात्रों की माँग पर ख़रीदा गया. उसे सुनने के लिए हेडफ़ोन लगाना पड़ता था जिससे पास के कमरे में टीवी देखने वालों को दिक्कत न हो. इस व्यवस्था के लिए अपना समय आरक्षित कराना पड़ता था क्योंकि उस विशालकाय रेडियो में दो हेडफ़ोन ही घुस पाते थे.

इमरजेंसी के बाद श्रीकांत वर्मा से नरेश कौशिक का इंटरव्यू मैंने इसी रेडियो पर सुना था. एक सवाल था, "श्रीकांत जी कुछ लोग कहते हैं आप बिक गए हैं?" श्रीकांत वर्मा का जवाब कुछ इस तरह था, "यह शिकायत उन लोगों को है जो मुझसे कम क़ीमत पर बिके हैं."

शिकायतें भी

Image caption बलराज साहनी और दमयंती साहनी बीबीसी हिन्दी में अपने कार्यकाल के दौरान.

ऐसा नहीं है कि मैं हर कार्यक्रम या प्रस्तुति का कायल रहा. कई बार निराश और नाराज़ भी हुआ. एक बार इतना ग़ुस्सा आया कि बीबीसी की आलोचना में 'दिनमान' में लेख लिख डाला. पर हिन्दी प्रसारण सुनने की व्यक्तिगत संस्कृति बनी रही.

जब एक-डेढ़ साल पहले सुना कि बीबीसी की हिन्दी सेवा बंद हो रही है तो लगा जैसे एक सुंदर क़ीमती घड़ी हमेशा के लिए रुक जाएगी. लगभग विदा के स्वर में 'इंडियन एक्सप्रेस' में अचला शर्मा ने लेख लिखा तो लगा जैसे मैंने ही लिखा है.

गनीमत है, घड़ी फिर चल पड़ी. कार्यक्रमों का समय सिकुड़ गया है, पर मेरी भाषा को निखार और गरिमा के साथ स्वाभाविक मिज़ाज में इस्तेमाल करने वाला रेडियो पर और कौन है?

सभ्यता का सुख

Image caption बीबीसी के नरेश कौशिक.

बीबीसी अब इंटरनेट पर भी है, पर शॉर्ट वेव पर सुई और मौसम के नखरों से संलग्नता और एकाग्रता बढ़ती है.

कुछ दिन बाद हिमांचल जाऊँगा. वहाँ के साफ़ आसमान में रेडियो भी चैन की साँस लेता है. तारों के नीचे बैठकर 'दिन भर' या देर रात वाला संस्करण सुनूँगा.

नई, युवा आवाज़ों से अपनी ज़ुबान की सभ्यता का सुख पाकर सोऊँगा.

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