कॉलेज में पढ़ने वाली परिवार की पहली बेटियां

  • 14 मई 2015
गर्ल्स कॉलेज की छात्राएं, जैसलमेर

राजस्थान के मरूभूमि स्थित शहर जैसलमेर में छात्रों का एक समूह एक कक्षा में जमा था.

मैंने उनसे निहायत ही सामान्य सवाल किया, “जो लोग कॉलेज में पढ़ने वाली अपने परिवार की पहली महिला हैं, वे हाथ उठाएं.” इसका जो जवाब आया, वह इस तस्वीर से साफ़ है.

उन्हें पढ़ाने वाली प्रोफ़ेसर इस कॉलेज की पहली महिला प्रोफ़ेसर हैं. एमएलएस गवर्नमेंट गर्ल्स कॉलेज जैसलमेर शहर का पहला महिला कॉलेज है, जिसकी स्थापना 1988 में हुई थी.

परंपरा का उल्लंघन

इस कॉलेज की कुछ लड़कियों ने एक और परंपरा को तोड़ डाला है- वे ड्राइव करती हैं. कुछ लड़कियां स्कूटर चला कर कॉलेज पंहुचती हैं.

कक्षा में पढ़ाने वाली रमा अरोड़ा इस बात का सबूत हैं कि शिक्षा किस तरह किसी का जीवन बदल सकती है. अपनी छात्राओं की तरह वे भी कॉलेज में पढ़ने वाली अपने परिवार की पहली महिला हैं. बीस वर्ष की उम्र में शादी के बाद उन्होंने गुपचुप ढंग से पढ़ाई जारी रखी.

गुपचुप पढ़ाई

वे कहती हैं, “मैं एक संयुक्त परिवार में रहती थी, जहां मेरे ससुरालवालों को नहीं लगता था कि मुझे पढ़ाई चालू रखनी चाहिए. मैं पूरे घर का खाना बनाती थी, साफ सफाई करती थी और उसके बाद रात के दस बजे से सुबह के छह बजे तक पढ़ती थी. मैं एक-डेढ़ घंटे से ज़्यादा कभी सो नहीं पाई.”

वे बाद में समाजशास्त्र की प्रोफ़ेसर बन गईं.

शरवन कंवर रतनू भारतीय सेना में नौकरी करना चहती हैं, वहां तक न पंहुच सकीं तो पुलिस बल ही सही. वे स्कूटर चलाती हैं, बेहद बातूनी हैं और उन्होंने बड़े बड़े सपने पाल रखे हैं. वे कहती है, “मैं कुछ अच्छा करना चाहती हूं ताकि लोग मुझे बाद में याद रखें.”

उनकी मां जैसलमेर शहर से बाहर की हैं, जहां लड़कियों को नहीं पढ़ाते. पर बच्चे के जन्म के बाद वे शहर आ गईं और रतनू को स्कूल भेजना शुरू किया.

शरवन कहती हैं, “मैं जब कभी अपने गांव जाती हूं, लोगों से कहती हूं कि वे अपनी बेटियों को स्कूल भेजें, पर वे पूछते हैं, लड़कियों को स्कूल क्यों भेजा जाए? वे क्या कर लेंगी? उन्हें लगता है कि लड़कियां कुछ नही कर सकतीं.”

शरवन अपने गांव वालों को ग़लत साबित करना चाहती हैं. वे महिला प्रोफ़ेसर रमा का काफ़ी सम्मान करती हैं और उन पर भरोसा करती हैं. वे कहती हैं, “हम जितना मैडम से खुल सकती हैं, उतना किसी पुरुष प्रोफ़ेसर से नहीं.”

पुलिस अफ़सर बनना चाहती है बेटी

मरावो सोलंकी 18 साल की हैं और अपने पिता के पदचिह्नों पर चल कर पुलिस अफ़सर बनना चाहती हैं. वे कहती हैं, “मैंने जब घर के लोगों से कहा कि सब कुछ मैं ख़ुद करना चाहती हूं तो उन्हें लगा कि मैं बदल गई हूं.”

मरावो की बड़ी बहन 14 साल की उम्र में ब्याह दी गईं और वे प्राथमिक शिक्षा से आगे नहीं बढ़ पाईं. पर मरावो के मन में शादी की बात दूर दूर तक नहीं है. बारह मील पैदल चल कर स्कूल जाने वाली वे अपने परिवार की पहली लड़की हैं.

छात्राएं अपने प्रोफ़ेसर रमा अरोड़ा से कुछ ज़्यादा ही खुली हुई हैं. पर कुछ छात्राएं पिछली बेंच पर बैठी हुई हैं और चुप रहती हैं.

रमा उनसे कहती हैं कि वे कुछ पूछने में न डरें. थोड़ी ही देर में कुछ लड़कियां खुलने लगती हैं और कुछ कुछ बोलने लगती हैं. एक ने कहा, “यह ग़लत है कि किसी लड़की का यौन उत्पीड़न हो तो परिवार के लोग उसे ही कोसने लगें.”

यौन उत्पीड़न का विरोध

वे लिंग के मुद्दे पर भी बात करने लगती हैं. एक लड़की ने एक लड़के के बारे में बताया कि किस तरह वह उसे परेशान करता था. पर उसने लड़के का विरोध किया और अंत तक डटी रही.

महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध की वजह से कुछ लड़कियां पुलिस अधिकारी बनना चाहती हैं.

रमा अरोड़ा कहती हैं कि उन्होंने अपनी छात्राओं को बदलते हुए देखा है. वे कहती हैं, लड़कियां पहले से ज़्यादा साहसी बन रही हैं, उनमें आत्मविश्वास बढ़ रहा है. अब वे अपने मां-बाप से यह कहती हैं कि वे जल्द शादी नहीं करना चाहतीं. वे चाहती हैं कि उनकी छात्राएं उन्हीं की तरह प्रोफ़ेसर बनें.

यह उनके जीवन का सबसे सुखद क्षण होगा.

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