बीबीसीहिंदी@75

  • 11 मई 2015
Image caption ब्रिटेन में भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त कृष्णा मेनन ने बीबीसी हिंदी सेवा का उद्घाटन किया

पचहत्तर साल पहले खरखराते और भारी-भरकम रेडियो सेट पर आज ही के दिन बीबीसी हिंदुस्तानी का प्रसारण शुरू हुआ था.

आपमें से ज़्यादातर लोग इस लेख को मोबाइल पर पढ़ रहे होंगे. बहुत-सी दुनिया बदली इस बीच, बीबीसी और आप भी बदले.

लेकिन विश्वसनीयता वह बारीक़ और मज़बूत डोर है जिसने इस पूरे सफ़र में हमें और आपको जोड़े रखा.

Image caption भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के साथ बीबीसी के रत्नाकर भारती

इस मुक़ाम पर बीबीसी हिंदी की तरफ़ से ये कहना ज़रूरी है-

हम चार या पाँच पीढ़ियों पहले आपके पास भारत और दुनिया भर की ख़बरें लेकर आते थे, आगे भी लाते रहेंगे. अधिक तत्परता, अधिक विश्वास, अधिक ज़िम्मेदारी के साथ. सलीक़े से सहेज कर. और दिलचस्प. और उपयोगी. आपको केंद्र में रखते हुए.

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बीबीसी हिंदी शुरू में बहुत सालों तक सिर्फ़ शॉर्ट वेव रेडियो पर थी, अब भी है. पर अब वह टीवी पर भी है, वेबसाइट पर, मोबाइल फ़ोन, चैट एप्स, सोशल मीडिया और ऑडियो, वीडियो साइट्स पर भी. आप तक पहुँच आसान करने के लिए हमसे जो हो सकेगा, करते रहेंगे, ज़्यादातर डिजिटल तरीक़ों से.

दुनिया का सबसे बड़ा समाचार संगठन होने के नाते हमारी हमेशा कोशिश रहेगी कि इस बहुत तेज़ी से बदलती दुनिया की ख़बरें आप तक सबसे पहले पहुँचा सकें. आपकी व्यस्तता और सुविधा ध्यान में रखककर.

हिंदी के बहुत बड़े होते जाते मीडिया संसार में बीबीसी हिंदी की हमेशा कोशिश होगी कि हम सवालों को संतुलित और निष्पक्ष तरीक़े से उठाएँ, जिनकी बुनियाद हमेशा तथ्यों पर टिकी हो.

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जैसा बीबीसी के डायरेक्टर न्यूज़ जेम्स हार्डिंग ने अपने दस्तावेज़ 'फ्यूचर ऑफ़ न्यूज़' में कहा है, बीबीसी का काम गुणवत्ता के साथ पत्रकारिता करना है, कवरेज में ये बताना है कि असल में चल क्या रहा है, असल में उसका महत्व क्यों है, असल में उसका मतलब क्या है ?

और ये भी कि उन ख़बरों और घटनाक्रमों की पेचीदगियों को जितना बन पड़े, आपके लिए आसान कर सकें. आपके लिए उस ख़बर का क्या मतलब है और क्यों ज़रूरी है आपके लिए उसे जानना, ये बता सकें.

Image caption हाल ही में अभिनेत्री नंदिता दास बीबीसी स्टूडियो आईं और इकबाल अहमद ने उनसे इंटरव्यू किया

हमारा मक़सद रोशनी फैलाना है न कि सनसनी. लोकप्रियता की होड़ और ध्यान खींचने के शोर में बीबीसी हिंदी ने पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों के साथ समझौता न पहले किया था, न आगे ऐसा होगा.

हम ख़बरों, कार्यक्रमों और विश्लेषणों के ज़रिए प्रबुद्ध हिंदी मानस का ज़िम्मेदार और भरोसेमंद हिस्सा बने रहना चाहते हैं.

हिंदी में हम ख़ुद को संवाद के सूत्रधार की तरह देखते रहेंगे. उन सवालों के साथ जिनका पूछा जाना ज़रूरी है और जिनका जवाब ढूँढने की ईमानदार कोशिश करना भी.

पत्रकारिता का ग्राउंड ज़ीरो वहीं होता है, जहाँ ख़बरें घट रही होती हैं, हम भारत और दुनिया की उन जगहों से वहाँ का सच आपके पास लेकर आते रहेंगे. चाहे वह कश्मीर में हो रहा हो या फिर माओवाद वाले इलाक़ों में.

राजनीति हिंदी समाचार संसार का बहुत बड़ा हिस्सा है, पर हमारे लिए और भी पक्ष महत्वपूर्ण हैं, जिन पर हम ध्यान देते रहेंगे, चाहे वह स्त्री विमर्श हो, या विकास के विषय, या फिर क़तार के आख़िर में खड़े लोग. एक ग्लोबलाइज्ड दुनिया का क्या असर है पर्यावरण पर, लोगों पर, अर्थव्यवस्था पर, हम लगातार उन्हें जगह देते रहेंगे.

जवाबदेही और पारदर्शिता हमारे न्यूज़रूम की संस्कृति का बड़ा हिस्सा है. आपके परामर्श, आपकी शिकायतें, आपके सवाल हमेशा मददगार रहे हैं, भरोसा है ये भागीदारी आगे भी देखने को मिलेगी.

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इस सफ़रनामे की सार्थकता और अहमियत आप यानी बीबीसी हिंदी के श्रोताओं, पाठकों और दर्शकों के कारण है, जो न सिर्फ़ हमें सुनते/ देखते/ पढ़ते रहे हैं, बल्कि सजगता के साथ सवाल भी खड़े करते हैं.

आपके स्नेह, सहयोग और भागीदारी के लिए बीबीसी शुक्रगुज़ार है. आपके बिना ये सफर मुमकिन न था. आगे आपका साथ पहले से ज़्यादा मिलेगा, ऐसी उम्मीद है.

इस साल हम आपसे इस सफ़रनामे के महत्वपूर्ण हिस्से, अपना इतिहास, बीबीसी की हस्ताक्षर आवाज़ें साझा करते रहेंगे.

आपसे भी पूछते रहेंगे अब तक के हमारे काम का हिसाब. और ये भी कि क्या हम अपना काम ठीक से कर पा रहे है? क्या हम जो कर रहे हैं, उससे कोई फ़र्क़ पड़ा?

क्या हम आपके ठीक से काम आ सके? क्या आप हमसे कुछ नया जान सके? क्या हम आपकी बातचीत को आगे बढ़ा सके?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं. )

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