तलाक़शुदा की तलाश में लगे जोड़ियां बनाने वाले

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दुनिया में सबसे कम तलाक़ दर भारत में है लेकिन यहां शादियों का टूटना अब आम होता जा रहा है.

ज्यादातर तलाक़शुदा लोगों का संबंध शहरी मध्यम वर्ग से है क्योंकि वहाँ ज़िंदगी अर्थव्यवस्था में आई तेज़ी के कारण बदल रही है.

नतीजतन वैवाहिक सेवाओं की तादाद में तेज़ी आ रही है और ऐसी सेवाएं देने वालों में कुछ ऐसे भी हैं जिनकी नज़र तलाक़शुदा लोगों पर है.

हाल में तलाक़ लेने वाली अनसुया बासु

मैंने लंबे समय तक 'डी' शब्द (डाइवोर्स) के साथ संघर्ष किया है.

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मैं अपने अभिभावक के परिवार में दुनिया को यह बताने वाली पहली शख़्स थी कि मेरी शादी-शुदा ज़िंदगी में काफी मुश्किलें हैं. हालांकि मुझे तलाक़ के बारे में सोचकर ही घबराहट होती थी.

मैंने अपने दर्द को कम करने के लिए तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी वाले शहर दिल्ली को चुना, जहां मैं वापस आ गई. मैं शादी से पहले यहां रह चुकी थी.

क़रीब तीन साल के लंबे इंतज़ार, कड़वे अनुभव और बाद में अनगिनत वक़ीलों के पास जाने के बाद आख़िरकार दूसरे लोगों की तरह ही मैं भी अदालत की लंबी दौड़ में शामिल हो गई.

शहर के फैमिली कोर्ट का कमरा नंबर 207 याद आते ही मुझे डर लगता है. मैं हर महीने घंटों यहां अपनी घबराहट को कम करने की कोशिश करती थी जो मुझे दूसरों और ख़ुद की शादी का हश्र देखकर होती थी.

हालांकि मुझे इन बातों से अब ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता था.

मोबाइल से ख़तरा

जिस दिन मेरा तलाक़ हुआ उस दिन मेरा सिर मानो काफी हल्का महसूस हो रहा था.

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एक दोस्त के साथ बातचीत के दौरान मैंने अपने मोबाइल की घंटी कई दफा बजते हुए सुनी.

जब मैंने फ़ोन पर जवाब दिया तो रेडियो जॉकी की तरह लगने वाली उस गहरी आवाज़ ने मुझसे मेरा हाल-चाल पूछा.

फिर बताया कि वह किसी मैचमेकिंग वेबसाइट से कॉल कर रहा है और यह कॉल ख़ासतौर पर तलाकशुदा लोगों के लिए है.

मैं हैरान रह गई थी. मैं सोच नहीं पा रही थी कि बाहर की दुनिया को कैसे इतनी तेज़ी से मेरी वैवाहिक स्थिति के बारे में पता चल गया? परेशान होकर मैंने जल्दी से कॉल काट दिया.

तलाक़ से जुड़े कई वकीलों से मुझे यह समझने में वक़्त नहीं लगा कि कुछ फैमिली कोर्ट्स के जुनियर कर्मचारी, विवाह से जुड़े पोर्टल और कुछ चालाक वकील कुछ फ़ीस लेकर दूसरी शादी के संभावित उम्मीदवारों की सूचनाएं साझा करते हैं.

दिल्ली हाईकोर्ट में तलाक़ की वकील गीता लुथरा ने बताया, "जब आप अदालत में एक याचिका दायर करते हैं तो अदालत में सभी पक्षों का रिकॉर्ड मौजूद रहता है. ये जानकारी कोई थर्ड पार्टी को मिल सकती है. ऐसे में मुमकिन है कि सूचनाएं बड़ी आसानी से मैट्रिमोनियल साइटों को मिल जाएं.''

गोपनीयता क़ानून नहीं

निजी डेटा की सुरक्षा और इसका उल्लंघन करने पर सज़ा का प्रावधान करने वाले ब्रिटेन के डेटा प्रोटेक्शन एक्ट की तरह भारत में डेटा की सुरक्षा या गोपनीयता के लिए सीधा क़ानून नहीं है.

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ज़ाहिर है कि मैचमेकिंग वेबसाइटों को इतने व्यापक डेटा-बेस से तो बहुत अधिक फ़ायदा होगा.

भारत में तलाक़ की दर से जुड़े आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हर 1,000 शादियों में से लगभग 13 शादियां टूट जाती हैं.

अमरीका में हर 1,000 शादी में से क़रीब 500 शादियां टूट जाती हैं.

तलाक़ का कोई राज्यवार आंकड़ा उपलब्ध नहीं है लेकिन फैमिली कोर्ट के अधिकारियों का कहना है कि पिछले पांच सालों में भारत के बड़े शहरों में तलाक़ के आवेदनों में तेज़ी आई है.

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Image caption शादियों के टूटने में कामकाजी महिलाओं पर बढ़ता दबाव भी एक वजह है

इन हालात को भुनाने के लिए ही भारत के मैचमेकिंग पोर्टलों ने अपने जीवनसाथी से अलग हो चुके लोगों और तलाकशुदा लोगों के लिए एक विशेष पन्ना बनाया है और इन उम्मीदवारों से नियमित रूप से संपर्क साधा जाता है.

मेरी हैरानी बढ़ाते हुए ऐसे ही मैचमेकिंग पोर्टल के कर्मचारी मुझे वक़्त-बेवक़्त संदेश भेजते हैं ताकि मैं उनसे बातचीत के लिए राज़ी हो जाऊं.

हालांकि मैं ऐसे पोर्टल या लोगों को अदालत में घसीटने में अपनी ऊर्ज़ा बर्बाद नहीं करना चाहती, क्योंकि यहां कोई गोपनीयता क़ानून नहीं है.

(अनसुया बसु एक जनसंपर्क पेशेवर और लेखक हैं)

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