भारत के पहले ब्रॉडबैंड ज़िले की हालत...

  • 31 मई 2015
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Image caption प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर गांव को इंटरनेट से जोड़ने का ऐलान किया था

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आते ही ग्रामीण भारत को डिजिटल भारत में बदलने का सपना दिखलाया था.

इस सपने को पूरा करने के लिए बनाई गई एक बेहद महत्वकांक्षी योजना जो कि कथित रूप से दुनिया का सबसे बड़ा ऑप्टिकल फ़ाइबर नेटवर्क स्थापित करेगी.

योजना के मुताबिक़, सात लाख किलोमीटर लंबा नेशनल ऑप्टिकल फ़ाइबर नेटवर्क यानी एनओएफ़एन भारत की ढाई लाख ग्राम पंचायतों के दफ़्तरों में हाई स्पीड इंटरनेट नेटवर्क पहुंचाएगा, ताकि गांवों में ई-गवर्नेंस को बढ़ावा दिया जा सके.

ब्रॉडबैंड ज़िला

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Image caption योजना के तहत हर ग्राम पंचायत दफ़्तर में 100 एमबीपीएस स्पीड का इंटरनेट दिया जाना था

इस ऑप्टिकल फ़ाइबर को सबसे पहले फैलाया गया केरल के इडुक्की ज़िले में.

इस साल जनवरी में इडुक्की को भारत का पहला ब्रॉडबैंड ज़िला घोषित किया गया.

इस योजना के तहत इडुक्की के 52 ग्राम पंचायत दफ़्तरों को 100 एमबीपीएस का हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड इंटरनेट नेटवर्क दिया जाना था.

Image caption कागज़ी कार्रवाइयों को कंप्यूटराइज़ करने की महत्वकांक्षी योजना अभी पूरी तरह से सफल नहीं हुई है

इसके उद्घाटन को मीडिया में बढ़-चढ़ कर कवर किया गया, लेकिन तीन महीने बाद जब स्थिति का जायज़ा लेने मैं केरल पहुंची तो ज़मीनी हक़ीकत कुछ और ही थी.

इडुक्की के एक छोटे से गांव कंचियार में ग्राम पंचायत दफ़्तर में गांव के लोग मैरिज सर्टिफ़िकेट, बर्थ सर्टिफ़िकेट बनवाने और अपनी पेंशन की जानकारी इंटरनेट पर जानने के लिए क़तार में खड़े हैं.

इस दफ़्तर में सब कुछ डिजिटल है और ये नज़ारा उत्तर भारत के पंचायत दफ़्तरों में देखने को नहीं मिलता.

'100 एमबीपीएस? वो क्या होता है'

Image caption केरल की ग्राम पंचायतों में कंप्यूटर और इंटरनेट का इस्तेमाल सालों से होता आया है.

केरल में साक्षरता दर सबसे ज़्यादा है और यहां की ग्राम पंचायतों में कंप्यूटर और इंटरनेट का इस्तेमाल सालों से होता आया है.

लेकिन कंचियार ग्राम पंचायत में जब बीबीसी ने कंप्यूटरों पर मामूली स्पीड टेस्ट किया तो पाया कि वायदे के विपरीत वहां इंटरनेट की स्पीड मात्र 4 एमबीपीएस थी.

पंचायत सचिव साबू जॉन ने चुटकी लेते हुए बीबीसी को बताया, "100 एमबीपीएस? वो क्या होता है भला? नेशनल ऑप्टिकल फ़ाइबर सेवा के लॉन्च होने के बाद हमें मात्र एक हफ़्ते के लिए हाई स्पीड नेटवर्क मिला. उसके बाद से स्थिति ज्यों की त्यों है. हमने कई बार अफ़सरों से दरख्वास्त की कि इसे दुरुस्त किया जाए लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई."

Image caption पंचायत अधिकारियों का कहना है कि उनके दफ़्तरों में उपकरण तो लगा दिए गए हैं लेकिन उनके संचालन के लिए हाई-स्पीड इंटरनेट अब तक नहीं मिला है

वहीं इडुक्की की चक्कुपल्लम ग्राम पंचायत में पंचायत अध्यक्ष ने बड़े गर्व से हमें वो कैमरा सिस्टम दिखाया, जिसके ज़रिए राजधानी तिरुवनंतपुरम में मुख्यमंत्री के दफ़्तर से पंचायतों की कार्यवाही लाइव देखी जा सकती है.

लेकिन हाई स्पीड इंटरनेट न होने की वजह से स्ट्रीमिंग ऐसी है जैसे धक्के से चलने वाली कोई गाड़ी.

पंचायत अध्यक्ष एन्टनी कुहीकट्टू ने बताया, "एनओएफएन के लागू होने से पहले हम बीएसएनएल की इंटरनेट सेवाएं लेते थे जिसका खर्चा पंचायत के अकाउंट से जाता था. अब ये सेवा हमें मुफ़्त तो दी गई है, लेकिन इसका कोई फ़ायदा ही नहीं है. इससे बेहतर तो बीएसएनएल की 4 एमबीपीएस की सेवा थी."

नेट नहीं पकड़ रहा स्पीड

Image caption ये है इडुक्की की एक ग्राम पंचायत में लगा ऑप्टिकल फ़ाइबर नेटवर्क जो कि काम नहीं कर रहा है

इसके अलावा इडुक्की में तकनीकी रूप से सबसे बेहतर माने जाने वाली कट्टापना ग्राम पंचायत के दफ़्तर में भी स्पीड टेस्ट कर पता चला कि वहां केवल 3.30 एमबीपीएस की इंटरनेट स्पीड ही दी जा रही है.

भारत की आधी से ज़्यादा आबादी जो गांवों में रहती है, क्या उनके और शहरी भारत के बीच का डिजिटल फ़ासला कम हो पाएगा?

या ये योजना भी भारतीय सरकार की उन महत्वकांक्षी योजनाओं की तरह रह जाएगी जिनकी घोषणा तो ज़ोर-शोर से होती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका संचालन नहीं किया जाता?

Image caption जानकारों का कहना है कि ग्रामीण भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ने से एक क्रांति आ सकती है

नेशनल ऑप्टिकल फ़ाइबर नेटवर्क योजना की अगुवाई कर रही अरुणा सुंदराजन ने सरकार का बचाव करते हुए बताया, "इस योजना के तहत इडुक्की में ऑप्टिकल फ़ाइबर के तार तो बिछा दिए गए हैं, लेकिन इसके इस्तेमाल पर अभी भी विचार होना बाकी है. हमें एक मॉडल तैयार करना है, जिसमें हमें ये तय करना है कि इस नेटवर्क का इस्तेमाल पंचायत के स्तर पर किस तरह से किया जाए. पंचायत के स्तर पर अभी अधिकारियों को इसके इस्तेमाल के बारे में शिक्षित करने की ज़रूरत है."

उन्होंने माना कि इस योजना के रास्ते में कई बड़ी चुनौतियां हैं और अगले तीन सालों में इसे पूरा करने का वायदा महत्वकांक्षी है.

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