'बीबीसी सुनने की तो लत है'

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बीबीसी हिंदी सेवा के पचहत्तर साल पूरे होने पर इसके कुछ पुराने श्रोताओं ने अपनी खट्टी-मीठी यादें साझा कीं. यहां पेश हैं उसके कुछ हिस्से.

भूषण मिश्रा: बीबीसी मतलब सच

मेरा गांव उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले में सबसे आखिर का वो हिस्सा था, जहां हिंदु और मुसलमान लगभग बराबर की तादाद में थे.

उन दिनों शाम साढ़े सात बजे गांव के सभी लोग आग सेकते हुए बीबीसी सुनने के लिए अली मोहम्मद बाबा के घर के सामने जमा होते थे. जब बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी, मुझे पता नहीं था कि पूरा मामला क्या है.

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लेकिन पूरा गांव कहता था कि बीबीसी जो ख़बर देगा, वह एकदम सच होगा. तभी से दिल में एक बात बैठ गई, बीबीसी मतलब सच और उसकी आवाज़.

सुशील सुमन: रोज़मर्रा में शामिल बीबीसी

बिहार के अधिकांश बच्चों की तरह बीबीसी हिंदी से मेरा जुड़ाव भी पिताजी की वजह से हुआ.

बीबीसी सुनना उनके रोज़मर्रा में शामिल था. मधुकर उपाध्याय, शिवकांत, अचला शर्मा, सलमा जैदी, सीमा चिश्ती, राजेश जोशी से लेकर रूपा झा, ब्रजेश उपाध्याय, सुशील झा तक की एक लंबी फ़ेहरिस्त थी, जिनके रिपोर्ट या अन्य प्रस्तुतियों का हम इंतज़ार किया करते थे.

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उन्हीं दिनों बीबीसी का कारवां बिहार आया हुआ था. रोज अलग-अलग शहरों से इसकी रिपोर्ट आतीं, जिनमें श्रोताओं से सीधी बातचीत सुनाई जाती थीं.

बीबीसी कारवां बिहार में

जब हमारे शहर मुज़फ्फरपुर की बारी आई तो मैं भी तय समय पर बीबी कॉलेजिएट स्कूल के मैदान में पहुँच गया. रूपा झा और ब्रजेश उपाध्याय को हम दूर से मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे. बातचीत में शामिल होने से ज़्यादा दिलचस्पी उनसे मिलने की थी, लेकिन वे कार्यक्रम ख़त्म होते ही निकल गए.

तभी समान बेचैनी से भरा एक लड़का दिखा और हम साथ हो लिए. हम दोनों चन्द्रलोक होटल पहुंचे, जहाँ उनके ठहरे होने की संभावना थी.

रिसेप्शन पर काफी जद्दोजहद के बाद मैंने एक चिट्ठी बैरे के हाथों रूपा झा के पास भिजवाई, जिसमें 'बीबीसी कभी अपने श्रोताओं को निराश नहीं करती' का भी जिक्र था.

नतीजतन, हमारी यानि मेरी और विकास की, वह अविस्मरणीय मुलाकात रूपा झा और ब्रजेश उपाध्याय से हुई.

बीबीसी की लत मिली विरासत में: नंदलाल सुमित

रेडियो सुनने की लत दादा जी से विरासत में मिली. मैं और रेडियो बचपन के साथी हैं. दादा जी रोज़ बीबीसी हिंदी के समाचार सुनते थे और स्कूल के अलावा बाकी का मेरा वक़्त उसके साथ ही बीतता था. ठीक ठीक याद नहीं कि मैं कब से बीबीसी सुन रहा हूँ.

हाँ, मेरी सबसे पुरानी स्मृति साल 2003 की कोलंबिया स्पेस शटल दुर्घटना तक जाती है, जब इसकी ख़बर रात के आजकल कार्यक्रम में मानक गुप्ता ने खेल-खिलाड़ी कार्यक्रम को बीच में रोक कर दी थी.

बीबीसी से सुनी ख़बरें और जानकारियां अपने स्कूली साथियों से साझा करने के कारण मुझे कुछ दोस्तों ने ‘बीबीसी लंदन’ कहना शुरू कर दिया था. अब इस उपाधि से मुक्त हूँ, बीबीसी से नहीं.

अब रेडियो से अधिक इंटरनेट पर ख़बरें देखता-सुनता हूँ. सुनने-सुनाने वाले आते-जाते रहेंगे... मगर यह सर्विस यूँ ही बनी रहे.

धरमवीर कुमार: हॉबी है बीबीसी सुनना

बीबीसी सुनने का शौक पिताजी से विरासत में मिला. साल 2004 या 2005 में बीबीसी का कारवां श्रोताओं के द्वार तक पहुंचा. बीबीसी से प्यार की वजह से मैं समस्तीपुर और बेगूसराय में इसके कारवां में शामिल हुआ.

समस्तीपुर और बेगूसराय दोनों जगहों पर हुए इस कार्यक्रम में मैंने तीन-चार लाइनें बीबीसी को समर्पित की और बीबीसी ने इसे प्रसारित भी किया.

इसके बाद जिस सरकारी सेवा में हूँ उसके इंटरव्यू में मैंने हॉबी के रूप में 'बीबीसी सुनना' अंकित किया था. इंटरव्यू के लिए बीबीसी के इतिहास के बारे में जानकारी चाहिए थी. मैंने पत्र लिखा और 10 दिन के अंदर कुलदीप जी का पत्र आ गया पूरी जानकारी के साथ.

कार्यक्रम में शामिल होने का सुख

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इसके बाद इसके कई कार्यक्रमों में फ़ोन के माध्यम से शामिल हुआ जिसमे कई नेताओं व शिक्षाविदों से इसके माध्यम से सवाल पूछने का मौका मिला.

साल 2006 या 2007 में बीबीसी श्रोताओं में से कुछ का चुनाव कर के आमन्त्रित किया गया था 'स्टिंग ऑपरेशन ' के मुद्दे पर.

अनीश अहलूवालिया ने फ़ोन पर सुचना दी. ख़ुशी का ठिकाना न रहा. केरल में पोस्टिंग थी फिर भी जाकर प्रोग्राम में शामिल हुआ और तरुण तेजपाल, आशुतोष, सुधीर चौधरी से सवाल पूछने का मौका मिला.

अब जुड़ा हूं बीबीसी ऑनलाइन से

और एक घटना.. अनिल सदगोपाल जी के साथ कार्यक्रम था, श्रोताओं से सवाल मंगाए गए थे, मैंने भी एसएमएस से सवाल भेज दिया.

दोपहर को दिल्ली से फ़ोन आया, मैंने हैलो की आवाज़ सुनते ही पूछा, “आप श्याम सुंदर जी बोल रहे हैं क्या?” श्याम जी को जो आश्चर्य हुआ उसका बयान करना मुश्किल है. अब बीबीसी के वेबसाइट के माध्यम से इससे जुड़ा हुआ हूँ.

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