चीनी क्यों नहीं बेच पा रहे चाइनीज़ फ़ूड?

भारत को दुनिया मुग़लई खाने और समोसों के लिए जानती है, पर भारत में काफी लोकप्रिय है चीन का खाना.

यहां तक कि भारत में चीन के खानों को अलग भारतीय अंदाज़ में बनाया जाता है.

ख़ास बात ये है कि इस भारतीय-चाइनीज़ खाने की छोटी-बड़ी रेस्तरां चेन भारतीय बिज़नेसमैन चलाते हैं.

तो अपने ही खाने को भारत में परोसने में चीनी व्यापारी कैसे पीछे रह गए?

कारोबार की कठिन राह

Image caption बाबा लिंग की कोशिश है कि चीनी खाना एकदम चीनी अंदाज़ में ही बने.

मुंबई में रेस्तरां लिंग्स पैवेलियन के मालिक हैं 68 साल के बाबा लिंग.

चीनी पिता और भारतीय मां के बेटे लिंग, चीनी रेस्तरां का ख़ानदानी बिज़नेस चलाते हैं.

भारत आने के बाद, उनके पिता ने अपना पहला चीनी रेस्तरां 1945 में मुंबई में खोला, पर लिंग के मुताबिक़, अब ये आसान नहीं.

बाबा लिंग ने बीबीसी को बताया, "बहुत कागज़ी कार्रवाई करनी पड़ती है, सरकारी तंत्र से निपटना आसान नहीं. इसीलिए चीनी इस व्यापार में नहीं आते और लागत भी बहुत ज़्यादा है."

Image caption यो चाइना इस वक्त भारत की सबसे बड़ी चाइनीज़ फूड चेन है.

पिछले 70 साल में लिंग चार नए रेस्तरां ही खोल पाए हैं. तीन दिल्ली और एक अहमदाबाद में.

कुछ ऐसा ही अनुभव भारत में रहने वाले चाइनीज़ रेस्तरां चला रहे अन्य चीनी व्यापारियों का भी है.

दरअसल, चाइनीज़ खाने के व्यापार में भारतीय बिज़नेसमैन का दबदबा है.

उदाहरण के लिए 'यो चाइना'. साल 2003 में छह भारतीयों ने मिलकर दिल्ली में इसका पहला रेस्तरां खोला.

अब 22 शहरों में 60 रेस्तरां और डिलीवरी काउंटर के साथ ये भारत की सबसे बड़ी चाइनीज़ फूड चेन बन गई है.

बेहतर समझ

Image caption 'यो चाइना' के वाइस प्रेज़िडेंट मोहन अग्रवाल के मुताबिक अब वो भारत के बाहर भी रेस्तरां खोलने की तैयारी में हैं.

'यो चाइना' के वाइस प्रेज़िडेंट मोहन अग्रवाल के मुताबिक़ भारतीय बिज़नेसमैन को भारतीय बाज़ार की बेहतर समझ है.

मोहन अग्रवाल कहते हैं, "चाहे प्राइसिंग हो, कंज़्यूमर टेस्ट हो, मार्केटिंग या सेल्स का प्लान, जो विदेश से यहां आते हैं, उनके लिए ये सब समझ पाना मुश्किल होता है."

फिर भारत में चाइनीज़ खाने का व्यापार यहां आज़ादी के पहले आ बसे गिने-चुने चीनी परिवारों की नई पीढ़ियां ही कर रही हैं.

कोलकाता से देश के दूसरे हिस्सों में फैले इन चीनी मूल के लोगों के पास वो संसाधन और पैसे नहीं हैं, जो बड़ी भारतीय फूड चेन के मालिकों के पास हैं.

Image caption वीर सांघवी ने दुनियाभर के व्यंजनों पर कई लेख लिखे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और व्यंजनों के विशेषज्ञ वीर सांघवी के मुताबिक़, भारत ही नहीं दुनियाभर में चीन अपने खाने के व्यापार में आगे नहीं बढ़ पाया.

उनके मुताबिक़, "चीन में रेस्तरां व्यापार ज़्यादा विकसित नहीं हो पाया. चीनी व्यापारी और देशों में जाकर रेस्तरां चेन नहीं खोल पाए, बल्कि उन देशों में रह रहे चीनी ही इस व्यापार में शामिल हो पाए."

सांघवी कहते हैं, "चेयरमैन माओ के समय में ख़ानसामों को उनके गांव भेज दिया गया, इसलिए चीन के मुख्य हिस्से में रेस्तरां व्यापार विकसित नहीं हो पाया. अब भी एक्सपोर्ट शुरू होने में वक्त लगेगा."

वीर सांघवी ये भी कहते हैं, "भारत की ही तरह दुनिया के हर देश ने चाइनीज़ खाने को अपने अंदाज़ में ढाल दिया है. स्थानीय बाज़ार में ये चीनी व्यापारियों के लिए बड़ी चुनौती है."

चीनी खाना, भारतीय तड़का

Image caption भारत में 'फ़ास्ट फूड' के तौर पर चीनी खाना काफ़ी लोकप्रिय है.

भारतीय अंदाज़ में बना चाइनीज़ खाना इतना लोकप्रिय है कि सड़क किनारे खड़ी वैन्स में समोसे और सैंडविच पर चाऊमीन और फ्राइड राइस भारी पड़ते हैं.

ये खाना शायद चीनी लोगों को अपने खाने जैसा ना लगे पर भारत में कई लोगों के लिए यही चाइनीज़ खाना है.

फिलहाल, भारत में लगभग सारा चाइनीज़ खाना है- मेड इन इंडिया.

व्यापार करने के लिए बेहतर माहौल बने तो हो सकता है चाइनीज़ व्यापारी इस रेस में शामिल हों, पर जीत शायद चीनी खाने में भारतीय तड़का लगाने से ही मिले.

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