विरोधियों को बाथरूम में लॉक किया: हरीश रावत

हरीश रावत

क्या उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत को देखकर लगता है कि उन्होंने कभी अपने विरोधियों को चादर में लपेटकर बाहर फिंकवा दिया होगा या बाथरूम में बंद कर दिया होगा?

लेकिन ये सच है कि छात्र जीवन में हरीश रावत ये कारनामा कर चुके हैं.

बीबीसी हिंदी के स्टूडियो में एक ख़ास बातचीत के दौरान उन्होंने ख़ुद ये क़िस्सा सुनाया.

हरीश रावत उन दिनों लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्र नेता हुआ करते थे. ये सत्तर के दशक के शुरुआत की बात है.

उन दिनों इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था. रावत बताते हैं कि उस वक़्त वह 'नेशनल हीरो' थीं.

रावत और उनके साथियों ने इंदिरा गांधी को लखनऊ विश्वविद्यालय में संबोधित करने के लिए बुलाया था.

लेकिन समाजवादी नेता राजनारायण ने यह चेतावनी दे दी थी कि इंदिरा गाँधी को लखनऊ विश्वविद्यालय में घुसने नहीं दिया जाएगा.

उन दिनों समाजवादी युवजन सभा काफी ताकतवर संगठन माना जाता था.

विरोधियों के 'दबंग'

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रावत कहते हैं, 'हमने इस कार्यक्रम से एक रात पहले उन लोगों की पहचान की जो राजनारायण के कहने पर इंदिरा जी को रोक सकते थे. हमने उन लोगों को उसी रात बाथरूम में बंद कर दिया.'

उस वक़्त उत्तर प्रदेश में टीएन सिंह की सरकार थी और पुलिस हमारे साथ नहीं थी.

इंदिरा जी मंच पर आईं तो कुछ लोगों ने उन्हें काला झंडा दिखाने की कोशिश की.

रावत कहते हैं, 'उन विरोधियों पर हमलोगों ने चादर डालकर और उसे पालकी की तरह बनाकर वहां से ले गए और उन्हें हॉस्टल के कमरे में बंद कर दिया. कई बड़े नेताओं को आजतक समझ नहीं आया कि कैसे उनको पालकी में बिठाकर फील्ड से बाहर कर दिया गया.'

वे बताते हैं कि समाजवादी युवजन सभा के क़रीब 300 स्वयंसेवियों को हॉस्टल में बंद कर दिया गया था.

वे कहते हैं, 'उन दिनों हमारे पास इतने पहलवान थे कि वो राजनारायण को भी उठाकर ले जाते.'

हालांकि वे इस बात से इनकार करते हैं कि उन्होंने कॉलेज के दिनों में किसी से हाथापाई की.

समय ने मुझे भी ठीक किया

हरीश रावत ने बताया, 'मैंने कभी किसी को चांटा नहीं मारा और न ही किसी को तेज़ आवाज़ में डांटा होगा. मेरे पास फ़ौज इतनी बड़ी थी कि लोग उससे ही घबराते थे.'

उनका कहना है कि वे दोस्तों के अच्छे दोस्त थे और आज भी हैं. नौजवानों के लिए वे कहते हैं कि वे पढ़ाई में ज़रूर ध्यान दें और उसे बोझ के रूप में न लें.

हालांकि उन्हें युवाओं के अल्हड़पन पर कोई ऐतराज़ नहीं. वे कहते हैं, 'अगर युवाओं में अल्हड़पन नहीं होगा तो क्या 60 साल के बुढ़े में होगा?'

उन दिनों की यादें ताज़ा करते हुए रावत बेसाख़्ता मुस्करा पड़ते हैं और कहते हैं, "समय सबको ठीक कर देता है और समय ने मुझे भी ठीक कर दिया."

(बीबीसी गूगल हैंगआउट में बातचीत पर आधारित)

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