संबंधों के धागे उलझेंगे या सुलझेंगे?

इमेज कॉपीरइट AFP

राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत और अमरीका के संबंधों को '21वीं सदी की निर्णायक साझेदारियों में से एक' होने का दावा किया. ये उनकी मंशा है पर हकीकत नहीं.

अगर भारत की किसी के साथ '21वीं सदी की निर्णायक साझेदारी’ हो सकती है तो वो केवल चीन है.

अभी दोनों देश एक दूसरे के गहरे दोस्त नहीं हैं. लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद के बीच चीन और भारत के बीच केवल असहज शांति है.

आपसी व्यापार ज़रूर फल-फूल रहा है पर यहाँ भी चीन बेच ज़्यादा रहा है, खरीद कम रहा है.

एकतरफा समस्या

इमेज कॉपीरइट Reuters

भारत और चीन के बीच रिश्तों में गहराई न आने का एक कारण आपसी शक और भरोसे की कमी को बताया जाता है.

लेकिन चीनी मामलों के विशेषज्ञ अतुल भारद्वाज के अनुसार ये समस्या एकतरफ़ा यानी भारत की ओर से है.

भारत के चीन पर अविश्वास का कारण 1962 युद्ध है, जिसने हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे को खामोश कर दिया.

भारद्वाज कहते हैं इस जंग को चीनी याद भी नहीं करते लेकिन भारत अब भी इसमें अटका है.

भारत की हैसियत

इमेज कॉपीरइट AP

चीन भारत को महत्त्व तो देता है पर एक बड़े ग्राहक की हैसियत से.

भारत में सालों बाद एक ऐसा आदमी प्रधानमंत्री बना है जो चीन का बड़ा प्रशंसक है.

मोदी बड़ी उम्मीदों के साथ तीन दिनों की यात्रा पर चीन जा रहे हैं.

प्रधानमंत्री की हैसियत से ये चीन का उनका पहला दौरा है. लेकिन इससे पहले वे गुजरात के मुख्यमंत्री की हैसियत से चार बार चीन जा चुके हैं.

उनकी पिछली यात्रा 2011 में हुई थी जिसके दौरान उनका स्वागत 'हेड ऑफ़ स्टेट' की तरह से हुआ था. शायद चीनियों को पता था कि वो भारत के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं.

इमेज कॉपीरइट AP

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा जोश चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग में भी नज़र आता है.

विवादों के धागे

पिछले साल शी जिनपिंग ने भारत दौरे में नरेंद्र मोदी के उस बयान का हवाला दिया जिसमेें मोदी ने कहा था कि चीन और भारत 'दो जिस्म एक जान की तरह हैं'.

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन से दोस्ती बढ़ाने में ही भारत को फ़ायदा है.

मोदी भी इस बात को जानते हैं. चीन दुनिया की फ़ैक्ट्री है जिसके कारण इसका निर्यात 4 अरब डॉलर है. मोदी भारत को भी दुनिया की फ़ैक्ट्री बनाना चाहते हैं.

इमेज कॉपीरइट AFP

नरेंद्र मोदी चीन की अपनी तीन दिनों की यात्रा में सीमा विवाद पर भी बात करेंगे. हालांकि ये विवाद जल्दी हल होता नहीं दिखता.

लेकिन प्रधानमंत्री की प्राथमिकता होगी भारत के खिलाफ व्यापार असंतुलन को कम करना. इस समय ये असुंतलन 37 अरब डॉलर का है.

चीन को कच्चे धागे निर्यात करने वाली एक कंपनी के चेयरमैन रिखब जैन कहते हैं, "कच्चे धागे, कच्चा लोहा और दवाओं के अलावा चीन भारत से अधिक कुछ नहीं लेता."

निवेश पर जोर

विशेषज्ञ अतुल भारद्वाज का कहना है, " मोदी को चीन को मनाना होगा कि वो और चीज़ें खरीदे."

इमेज कॉपीरइट Reuters

रिखब जैन के अनुसार समुद्री मछलियों और झींगो की चीन में काफ़ी मांग है जिसे भारत पूरी कर सकता है.

पिछले साल भारत के अपने दौरे में चीनी राष्ट्रपति ने पांच साल के अरसे में 20 अरब डॉलर निवेश करने का एेलान किया था.

प्रधानमंत्री की दूसरी प्राथमिकता होगी चीन को इस बात के लिए तैयार करना कि वो इसमें से 10 अरब डॉलर अभी निवेश करने का एलान करें.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं. )

संबंधित समाचार