जजों की नियुक्ति पर टकराव की स्थिति

  • 16 मई 2015
law इमेज कॉपीरइट THINKSTOCK

न्यायपालिका नियुक्ति विधेयक को लेकर न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव की नौबत आ गई है.

इससे पहले जजों की नियुक्ति जजों द्वारा ही की जाती रही है. मगर सरकार ने अब जजों की नियुक्ति के लिए नया क़ानून बनाया है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में फिलहाल बहस चल रही है.

नए विधेयक में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए छह सदस्यीय आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के अलावा दो अन्य वरिष्ठ जज, दो जानी-मानी हस्तियां और केंद्रीय क़ानून मंत्री शामिल होंगे.

जानी-मानी हस्तियों का चयन न्यायपालिका, प्रधानमंत्री और लोकसभा में सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेता की सलाह से होगा.

मगर इस नए आयोग के गठन में पेंच फंसता नज़र आ रहा है, क्योंकि जिस क़ानून के तहत पुरानी कॉलेजियम व्यवस्था को ख़त्म किया गया है उसकी वैधानिकता को ही चुनौती दी जा रही है.

मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली खंडपीठ ने फिलहाल इस मामले को नौ जजों की संवैधानिक पीठ को भेजने से इनकार कर दिया है.

सरकार की दलील

सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है चूँकि कॉलेजियम व्यवस्था की स्थापना नौ सदस्यों वाली संवैधानिक पीठ द्वारा की गई थी, इसलिए मामले को 11 न्यायाधीशों वाली खंडपीठ में स्थानांतरित कर दिया जाए.

सरकार का कहना है कि नियुक्ति की नई व्यवस्था के लिए संविधान संशोधन लाया गया है जिसे बहुमत से संसद में पारित किया गया है. राज्यों की तरफ से भी नई प्रणाली का समर्थन किया गया है.

सरकार ने नई व्यवस्था लागू होने तक जजों की नियुक्ति पर रोक लगाने की वक़ालत भी की है.

सुप्रीम कोर्ट का रुख़

इमेज कॉपीरइट AFP

हालाँकि इस मामले में सुनवाई जारी है, जहाँ सरकार के वकील अपना पक्ष रख रहे हैं, ग्रीष्मकालीन छुट्टियों की वजह से अब इस मामले में 8 जून से बहस दोबारा शुरू होगी.

वैसे सुनवाई कर रही खंडपीठ का कहना है कि नई व्यवस्था लागू होने तक 'देश की न्यायप्रणाली को फ्रीज़र में नहीं रखा जा सकता है.' सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ का कहना था कि 11 सदस्यों वाली बेंच में मामला स्थानांतरित करने की बजाय वो इसके 'मेरिट' यानी तथ्यों के आधार पर फैसला करना बेहतर समझती है.

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रहे न्यायमूर्ति वीएन खरे का कहना है कि जब कॉलेजियम की स्थापना नौ सदस्य खंडपीठ द्वारा की गयी है तो फिर खंडपीठ की संख्या को लेकर कोई विवाद नहीं होना चाहिए.

सुनिए वीएन खरे से पूरी बातचीत

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहना है कि यह अपनेआप में अनोखा मामले इस लिए भी है क्योंकि इस मामले में न्यायाधीश भी एक पक्ष हैं

इमेज कॉपीरइट Reuters

वहीँ सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति पीबी सावंत को लगता है कि नियुक्ति के लिए कॉलेजियम की स्थापना कर न्यायपालिका ने विधायिका के अधिकारों का अतिक्रमण किया है.

सुनें जस्टिस सावंत से बातचीत

न्यायपालिका नियुक्ति विधेयक

विधेयक में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए छह सदस्यीय आयोग के गठन का प्रावधान है जिसमे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के अलावा दो अन्य वरिष्ठ जज, दो जानी- मानी हस्तियां और केंद्रीय क़ानून मंत्री शामिल होंगे.

आयोग का नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश करेंगे. जबकि जानी-मानी हस्तियों का चयन न्यायपालिका, प्रधानमंत्री और लोकसभा में सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेता की सलाह से होगा. इसमें पहले की तरह नियुक्तियों में कार्यपालिका पर न्यायपालिका की श्रेष्ठता नहीं रहेगी.

क्या है कॉलेजियम?

इमेज कॉपीरइट THINKSTOCK

सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में मुख्य न्यायाधीश समेत सुप्रीम कोर्ट के पांच जज होते हैं.

वहीं, उच्च न्यायालय का कॉलेजियम तीन सदस्यीय होता है. कॉलेजियम को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और न्यायाधीशों की नियुक्तियां और तबादलों का अधिकार होता है.

मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा के नेतृत्व वाली सुप्रीम कोर्ट की 9-सदस्य संवैधानिक खंडपीठ ने 6 अक्तूबर 1993 को तय किया था कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश का रुतबा कार्यपालिका से ऊपर है, इसलिए जजों के स्थानांतरण और नियुक्तियां कॉलेजियम द्वारा की जाएंगी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार