ताज महल पर उज़्बेक भी कर सकते हैं दावा

  • 14 मई 2015
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ताजमहल है किसका? हिन्दुओं का? मुसलमानों का? या फिर उन मज़दूरों का जिन्होंने इसे बनाया? या फिर दुनिया भर के उन लोगों का, जो इस सफ़ेद इमारत पर फिदा हैं?

आगरा की एक अदालत हिंदु समुदाय से जुड़े कुछ लोगों के इस दावे पर सुनवाई कर रही है कि ताजमहल पहले एक मंदिर था.

दूसरी ओर, एक आम भारतीय मुसलमान अपने दिमाग़ में गर्व से सोचता है कि ताजमहल तो मुसलमानों का है.

ताजमहल काम्प्लेक्स के बाहर एक बड़ी, घनी बस्ती आबाद है.

वहां उन मज़दूरों के वंशज आबाद हैं जिन्होंने ताजमहल को अपने हाथों से बनाया था.

'ताजमहल एक तीर्थ की तरह'

शाहजहाँ ने इन मज़दूरों को ईरान से बुलाया था जो ताजमहल बनने के बाद वापस ईरान नहीं गए.

उन्हें इस बात पर गर्व है कि ताजमहल उनकी पूर्वजों का कमाल है जिस पर पहला हक़ उनका है.

ताज महल एक अंतरराष्ट्रीय धरोहर है इसलिए उस पर किसी ख़ास धर्म या समुदाय का दावा नहीं हो सकता, लेकिन भारत से बाहर एक देश है, जहाँ के लोग ताजमहल पर हक़ से दावा जताते हैं.

वह देश है उज़्बेकिस्तान.

चार बार ताजमहल देख चुकीं एक उज़्बेक महिला ने मुझसे कहा, “उज़्बेकिस्तान के लोगों के लिए ताजमहल एक तीर्थ की तरह है, ये एक रूहानी दौरा है”.

उन्होंने बताया, उज़्बेकिस्तान के लोग इस बात पर फख्र महसूस करते हैं कि ताजमहल बनाने वाले मुग़ल थे जो उज़्बेकिस्तान की फ़रग़ना वादी से भारत पहुँचे थे.

ताजमहल पर उज़्बेकिस्तान वालों को गर्व होगा, इसका पता मुझे नहीं था.

मरने से पहले ताज देखने की ख्वाहिश

Image caption उज्बेक लोगों में उत्सुकता होती है ताजमहल देखने की

मुझे ये भी पता चला कि उज़्बेकिस्तान के बूढ़े लोगों की आखिरी ख्वाहिश होती है कि मरने से पहले ताजमहल देख लें.

उनका ये भी कहना था कि जब भी उज़्बेकिस्तान से कोई भारत आता है उससे कहा जाता है कि ताजमहल ज़रूर देखना या कोई भारत की यात्रा करके उज़्बेकिस्तान वापस जाता है उससे पूछा जाता है 'ताज महल देखा? लाला क़िला देखा?'.

मैं पिछले साल उज़्बेकिस्तान गया था तो लोगों ने मुझ से बार-बार दो सवाल किए, क्या मैंने ताज महल देखा है? क्या मैंने बाबरनामा पढ़ा है?

क़ुतुब मीनार के बारे में कोई नहीं पूछता, अगर आप एक उज़्बेक के घर जाएँ तो बाबरनामा और टेबल पर छोटा ताजमहल तकरीबन हर जगह दिखता है.

सबको अपना लगता है ताजमहल

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Image caption सभी को अपना लगता ताजमहल

ताजमहल की शोहरत उसके बनने के तुरंत बाद फैलने लगी, इसके किस्से दूर दूर तक पहुँचने लगे थे.

शायद इसे देखने के बाद सभी को ये महसूस होता है कि ताजमहल उनका है.

इसके बनने के लगभग 20 साल बाद फ्रांस के एक यात्री फ्रांसुआ बर्नियर भारत आए थे.

उन्होंने ही पहली बार कहा था कि मिस्र के पिरामिड से अधिक ताज महल की गिनती दुनिया के अजूबों में होनी चाहिए.

ताज महल से प्रभावित होकर उन्होंने कहा था कि उन्हें इस इमारत से मुहब्बत है.

भावनात्मक स्तर पर हो या धार्मिक दृष्टिकोण या फिर रोमांटिक अपील- ये स्मारक किसी-न-किसी स्तर पर सभी को अपना लगता है, और यही खूबी है ताज महल की.

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