ग्रीनपीस से क्या परेशानी है मोदी सरकार को

  • 18 मई 2015
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इसी साल अप्रैल महीने में, भारत ने नौ हज़ार ग़ैर सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) का पंजीकरण रद्द कर दिया था. सरकार का कहना था कि विदेशी चंदे के मामले में ये एनजीओ कानून का उल्लंघन कर रहे हैं.

सरकार के निशाने पर ख़ासतौर पर रही पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्था- ग्रीनपीस.

इसकी वजह की पड़ताल करने पर प्रधानमंत्री मोदी की भारत को लेकर महत्वाकांक्षा और विरोध से निपटने के उनके रवैये के बारे में काफ़ी कुछ पता चलता है.

'मेक इन इंडिया को आघात'

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पिछले हफ़्ते ही ग्रीनपीस को एक छोटी विजय हासिल हुई थी. बुधवार को सरकार ने ग्रीनपीस कार्यकर्ता प्रिया पिल्लई के विदेश जाने पर लगी रोक हटा दी थी.

प्रिया को जनवरी में ब्रिटेन जाने से रोक दिया गया था, जहां वह ब्रितानी सांसदों को भारत में कोयला खदानों के असर पर जानकारी देने वाली थीं.

लेकिन इस मामूली सी जीत से दरअसल जंग ख़त्म नहीं होती.

अब ग्रीनपीस का कहना है कि अगर भारत सरकार उसके खातों के परिचालन पर लगी रोक को नहीं हटाती तो वह कुछ ही हफ़्तों में बंद हो जाएगी.

पिछले साल भारत की गुप्तचर संस्था आईबी की एक रिपोर्ट लीक हो गई थी जिससे पता चलता है कि भारत सरकार इस पर्यावरण संस्था से इतनी नाराज़ क्यों है?

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इसमें कहा गया था कि ग्रीनपीस और अन्य एनजीओ के नेतृत्व में चलाए गए अभियानों की वजह से देश की वार्षिक वृद्धि दर में तीन फ़ीसदी की गिरावट आई है.

ग्रीनपीस इस कदर प्रभावशाली होने का दावा तो नहीं कर सकती लेकिन कोयला उद्योग के ख़िलाफ़ चलाए गए इसके अभियान 'मेक इन इंडिया' नीति को बड़ा आघात पहुंचा रहे हैं.

कोयले पर निर्भरता

भारत में कोयला ऊर्जा का मुख्य स्रोत है और बीजेपी सरकार के औद्योगिक निर्माण को गति देने का मुख्य औजार भी.

लेकिन यह तमाम जीवाश्म ईंधनों में सबसे ज़्यादा प्रदूषणकारी है और जलवायु परिवर्तन का महत्वपूर्ण कारक भी.

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और जब कोयले की बात आती है तो भारत चीन से भी ख़राब स्थिति में होता है.

चीन मेें कोयले का इस्तेमाल तेज़ी से घट रहा है और इसके साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन भी. जबकि भारत के कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के तेजी से बढ़ने का अनुमान है.

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा संस्था के अनुसार भारत में 2035 तक कोयले का इस्तेमाल दोगुना हो जाएगा और यह 2020 तक कोयले का सबसे बड़ा निर्यातक बन जाएगा.

वर्ल्ड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट के अनुसार दुनिया भर में प्रस्तावित 1,200 कोयला आधारित बिजली सयंत्रों में से आधे भारत में हैं.

'मूल्यों से समझौता'

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इसीलिए भारत में कोयला उद्योग के ख़िलाफ़ अभियान ग्रीनपीस की प्राथमिकता में रहा है. इस संस्था के अभियानों से भारत के कुछ वन क्षेत्रों में कोयला खनन पर रोक भी लगी है.

इस एनजीओ ने भारत के दो बड़े औद्योगिक समूहों अडानी ग्रुप और कोल इंडिया पर लगातार हमले करके भी सरकार की नाराज़गी मोल ली है.

भारत की पांचवीं सबसे बड़ी कंपनी कोल इंडिया दुनिया की सबसे बड़ी कोयला कंपनी है.

अडानी समूह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी कोयला कंपनी है और इसके प्रमुख, गौतम अडानी को प्रधानमंत्री मोदी के करीबियों के रूप में जाना जाता है.

लेकिन भारत सरकार की ग्रीनपीस और अन्य एनजीओ पर लगाम लगाने की कोशिश की बड़े पैमाने पर आलोचना भी हो रही है.

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भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है लेकिन अमरीकी राजदूत ने कहा कि एनजीओ के ख़िलाफ़ सरकार की कार्रवाई ने देश के लोकतंत्र पर 'दहलाने वाला असर' छोड़ा है.

प्रधानमंत्री मोदी अपने वादों को पूरा करने को प्रतिबद्ध लगते हैं. दरअसल कुछ भारतीयों को तो डर है कि वह इनके रास्तों में आने वाले देश के आधारभूत मूल्यों से भी समझौता कर सकते हैं.

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