जिन्होंने 42 साल की अरुणा की देखभाल

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Image caption आज अरुणा शानबाग की मौत हो गई है.

छप्पन वर्षीया अर्चना भूषण जाधव ने 1973 में मुंबई के किंग एडवर्ड मेडिकल अस्पताल के नर्स ट्रेनिंग कॉलेज में दाख़िला लिया था.

उसी साल वहाँ की एक नर्स अरुणा शानबाग के साथ वहीं के एक कर्मचारी सोहनलाल वाल्मीकि ने बलात्कार किया, गला घोंटा, और बाद में मरा हुआ समझकर छोड़कर चला गया.

(18 मई 2015 को अरुणा शानबाग की मौत हो गई. बीबीसी के विनीत खरे ने अरुणा के सहकर्मियों से 2011 में बात कर, ये ख़बर लिखी)

अर्चना ने अरुणा के साथ कभी काम नहीं किया लेकिन वो बताती हैं कि अरुणा बेहद ख़ूबसूरत थीं और काम में बहुत सक्षम.

अर्चना को उस वक़्त की बहुत बातें याद नहीं, लेकिन बस इतना याद है कि वहाँ काम करने वालों ने हड़ताल की थी और इस घटना का विरोध किया था.

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Image caption अर्चना भूषण जाधव अरुणा की देखभाल करती हैं.

37 साल बाद अरुणा शानबाग आज भी उसी अस्पताल के वार्ड नंबर चार के एक कमरे में जैसे अर्ध-चेतन अवस्था में हैं. वो बात नहीं कर सकतीं, चल नहीं सकतीं, देख नहीं सकतीं, बस आँखों से अपनी बातें कहने की कोशिश करती हैं और कई बातों पर प्रतिक्रिया देती हैं.

स्टाफ़ की तारीफ़

अस्पताल की नर्से और बाक़ी लोग उनकी पूरी सेवा करते हैं. उनका कहना है कि अरुणा उनकी अपनी हैं.

अरुणा शानबाग पर किताब लिख चुकीं पिंकी वीरानी ने याचिका दाख़िल की थी कि अरुणा को इच्छा मृत्यु दे दी जाए. इस पर अपना फ़ैसला रिज़र्व रखते हुए उच्चतम न्यायालय ने अस्पताल के नर्सों और स्टॉफ़ की प्रशंसा की जिन्होंने पिछले 37 सालों से अरुणा की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी है, उनका इतना ध्यान रखा है कि अरुणा को इतने सालों तक बिस्तर पर लेटे रहने के बावजूद एक भी घाव नहीं हुआ.

अस्पताल की मेट्रन अर्चना जाधव कहती हैं कि अस्पताल के सभी लोग अरुणा की सेवा अपने घर का सदस्य समझकर करते हैं और किसी को भी ये मंज़ूर नहीं हैं कि उन्हें इच्छा मृत्यु दे दी जाए.

वो कहती हैं, "जब तक उनका अंत नहीं आ जाता, तब तक हम उनकी सेवा करेंगे. हमने उनकी पूरी ज़िम्मेदारी ली है. और सिर्फ़ नर्सें ही नहीं, हमारे साथ काम करने वाले सभी वर्ग के लोग उनके लिए काम करते हैं. हमारी अरुणा यहीं रहेंगी. हर आधे घंटे में हम जाकर उन्हें देखते हैं कि कहीँ उन्हें कुछ चाहिए कि नहीं, वो रो रही हैं क्या".

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Image caption नीला सावंत जैसे अस्पताल के कर्मचारियों की अदालत ने भी तारीफ़ की है.

पिछले तीस सालो से अस्पताल में काम कर रहीं, पास ही खड़ीं नीला सावंत को उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय अरुणा को इच्छा मृत्यु दिए जाने की बात को नकार देगी.

सुख-दुख में शामिल

इस अस्पताल की नर्सों और स्टाफ़ ने अपने सुख-दुख में जैसे अरुणा को अपने साथ रखा है. अर्चना बताती हैं कि कभी-कभी अरुणी रोती भी हैं और उनके आंसू भी निकल आते हैं.

"जब वो रोती हैं तो हमें बहुत बुरा लगता है. उस वक़्त हम सभी लोग इकट्ठा हो जाते हैं, हम उनसे कहते हैं, अरुणा तुम मत रोना, हम हैं न इधर, हम तुम्हारा ख्याल रख रहे हैं. वो समझे न समझे, हम उनके साथ बात करने की कोशिश करते हैं. उनकी नज़र तो ऊपर की ओर रहती है, लेकिन हमें लगता है कि वो थोड़ा-थोड़ा समझती तो होंगी. वो बस आंखों से देखती हैं, वो कुछ कह तो नहीं सकतीं, हम उनकी आँखों की भाषा समझकर उनकी मदद करने की कोशिश करते हैं".

Image caption अस्पताल के डीन संजय ओक कहते हैं कि नर्सिगं के छात्रों के हर नए जत्थे को अरुणा से मिलवाया जाता है.

अरुणा को सुबह स्पंज दिया जता है. उनके खाने-पीने, बाल धोने, कपड़े बदलने के लिए जो भी नर्स ड्यूटी पर रहतीं है, उसी पर अरुणा की देखभाल की ज़िम्मेदारी होती है.

किंग एडवर्ड मेडिकल अस्पताल के डीन डॉक्टर संजय ओक 1986 से 88 तक इसी कॉलेज के छात्र थे. अक्टूबर 2008 में पदभार संभालने के बाद उन्होंने उसी दिन अरुणा को देखा.

वो बताते हैं, "आपको विश्वास नहीं होगा, लेकिन मुझे ऐसा लगा कि मुझे उनका आशीर्वाद मिला है ताकि यहाँ पर चल रहा अच्छा काम जारी रखा जा सके. पीढ़ियाँ बदल गई हैं. 38 साल गुज़र चुके हैं. अरुणा के साथ काम करने वाले रिटायर हो चुके हैं. लेकिन आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि ये लोग रिटायर होने के बाद भी अस्पताल वापस आते हैं, उनसे मिलने, उनका हाल चाल जानने. वो घर से अरुणा के लिए खाना लाते हैं. हमारे यहाँ जैसे एक परंपरा सी हो गई है, हर साल जब नर्सिंग के छात्रों का नया जत्था आता है तो हम उन्हें अरुणा के कमरे में ले जाते हैं. उन्हें अरुणा से मिलवाया जाता है. अरुणा को इन छात्रों का आना शायद समझ में नहीं आता हो लेकिन छात्रों को ये समझ में आता है कि अरुणा उनमें से ही एक है".

संजय ओक कहते हैं कि इच्छा मृत्यु पर देश में और बहस की ज़रूरत है. वो बताते हैं कि जब भी वो अरुणा को देखते हैं तो उन्हें संतुष्टि होती है, लेकिन साथ में गुस्सा भी आता है.

वो कहते हैं, "मैं हताश और गुस्सा हो जाता हूँ एक व्यक्ति की वजह से मेरी अस्पताल की एक बेहतरीन नर्स इस हालत में है और उस व्यक्ति को ज़्यादा कुछ नहीं हुआ. मुझे दुख होता है कि वो इस हालत में पड़ी हुई है. मुझसे पहले इस कुर्सी पर बैठने वाले सभी लोगों ने अरुणा का ध्यान रखा है जैसे वो हममे से ही एक है. लेकिन साथ में ये भावना भी है कि वो हममें से एक है और हम उसका ख्याल रखते रहेंगे".

घटना के इतने सालों बाद भी अरुणा किसी भी मर्द की आवाज़ सुनकर घबरा जाती हैं और आवाज़ करती हैं. जब उन्हें नर्स थपकी देती हैं तब वो शांत होती हैं.

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