जिस्म अफ़ग़ान का, हाथ हिंदुस्तान का..

  • 19 मई 2015
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अफ़ग़ानिस्तान के कंधार में 2012 में बम को निष्क्रिय करते वक्त अपने दोनों हाथ गंवा चुके कैप्टन अब्दुल रहीम अपने नए हाथ पाकर काफी खुश हैं.

रहीम को केरल के कोची में अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में हुए हैंड ट्रांसप्लांट ऑपरेशन के जरिए नए हाथ मिले हैं.

उन्हें केरल के जॉर्ज के हाथ लगाए गए जो मोटरसाइल हादसे में ब्रेन-डेड हो गए थे.

केरल के व्यक्ति के हाथ

उन्होंने दो साल तक इंटरनेट पर ख़ूब खोज की और अपने दोस्तों से मदद की गुहार लगाई. तब जाकर उन्हें केरल में उम्मीद की नई किरण दिखाई दी.

रहीम का कहना है वे जॉर्ज को जीवनभर नहीं भूल सकते हैं. उनका कहना था, ''मैं चाहता हूँ कि मेरी मौत के बाद मेरा सारा शरीर भारत में (रिसर्च के लिए) दान में दिया जाए.''

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प्लास्टिक सर्जन डॉक्टर सुब्रामान्या अय्यर का कहना था, ''हमने रहीम को समझाया कि ऐसे ब्रेन डेड व्यक्ति का मिलना काफ़ी मुश्किल है जिसके हाथ निकालकर ट्रांसप्लांट किए जा सकें. लेकिन वे अड़े रहे और काफी सकारात्मक दिखे. आखिरकार सब्र का फल उन्हें मिल गया.''

डॉक्टर अय्यर के अनुसार, ''कनस्ट्रक्शन का काम करने वाले जॉर्ज (54 साल) को अप्रैल में मोटरसाइकिल हादसे के बाद ब्रेन डेड हालत में लाया गया. अस्पताल ने जॉर्ज के परिवारवालों से बात की और दोनों के खून के नमूने मिलाने और पूरी जांच के बाद आगे की प्रक्रिया पूरी की.''

15 घंटे का ऑपरेशन

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Image caption अब्दुल रहीम अफ़ग़ान सेना में बम को निष्क्रिय करने का काम करते हैं.

डॉक्टर अय्यर का कहना था, ''शरीर ट्रांसप्लांट को लेकर सारी क़ानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद 20 डॉक्टरों, 8 एनेस्थेसिस्ट और नर्सों की मदद से 15 घंटे तक चार ऑपरेशन टेबल्स पर ऑपरेशन चला. चुनौती थी दो हड्डियों, दो धमनियों और कई नसों का जोड़ना.''

डॉक्टर का कहना है कि रहीम की फिज़ियोथैरेपी चल रही है और उन्हें अपनी नसों को बढ़ने देने तक के लिए दस महीने तक यहां रहना पड़ेगा.

क्या उन्हें अपने हाथों का रंग देखकर अजीब नहीं लगता, जो उनकी त्वचा से गहरे रंग के हैं? दस साल के बच्चे कि पिता, रहीम का कहना था - ''क्या फर्क पड़ता है.''

ये कोची में इस इंस्टीट्यूट का दूसरा सफल हैंड ट्रांसप्लांट है.

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