धारावी की अपनी ‘ऑनलाइन’ दुकान

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मुंबई में एशिया की सबसे बड़ी कच्ची बस्ती धारावी ग़रीबी और गन्दगी के लिए जानी जाती है लेकिन बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि यहां बनने वाले चमड़े के सामान देश के अलग अलग हिस्सों में ही नहीं बल्कि विदेशों में भेजे जाते हैं.

इसके अलावा यहां कई अन्य सामानों का उत्पादन किया जाता है और धारावी की अपनी एक अलग ऑनलाइन दुकान भी है.

वक्‍़त से क़दमताल करने में यह इलाक़ा पीछे नहीं है. ई-कॉमर्स में भी यह हाथ आज़माने लगा है.

www.dharavimarket.com पर धारावी में बनने वाले उत्‍पादों का ऑर्डर दिया जा सकता है.

दिलचस्प यह है कि यहां पर न सिर्फ़ देशों में बल्‍कि विदेशों से भी ऑर्डर आते हैं.

ऐसे हुई शुरुआत

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Image caption मेघा गुप्ता धारावी मार्केट डॉट कॉम की संस्थापक हैं.

धारावी मार्केट की नींव डालने वाली मेघा गुप्‍ता का कहना है, “इसके बारे में मुझे दो साल पहले ख़्याल आया. इसके बाद मैंने जब रिसर्च किया और फिर इसकी शुरुआत की.”

दरअसल, मेघा टाउन प्‍लानर थीं. वो बताती हैं, “एक प्रोजेक्‍ट के सिलसिले में मेरा यहां आना हुआ था, तब सोचा कि जब यहां इतना कुछ बनता है, इसे बाहर भी जाना चाहिए.”

वो कहती हैं कि, "हमने दो सौ से ज्‍़यादा दुकानों के साथ सम्पर्क बनाया. उनके यहां जो भी बनता है, उसकी तस्‍वीर खींच कर हम अपनी वेबसाइट पर लगा देते हैं और ऑर्डर आने के बाद उसकी डिलीवरी कर देते हैं."

नेटवर्क

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दूर-इराज़ इलाक़ों में सामान भेजने के मामले में मेघा बताती हैं, “कुछ कूरियर कंपनियों से गठजोड़ किया है.”

लेकिन बड़ी बड़ी ई-कॉमर्स की कंपनियों के मुक़ाबले अपनी जगह बनाना कितना आसान है, इसके जवाब में वो कहती हैं, “चुनौतियां कहां नहीं हैं, लेकिन हम लगन के साथ जुटे हुए हैं. हम अनोखे सामान ही ग्राहकों को ऑफर करते हैं और वो भी वाज़िब दामों में.”

वो आगे बताती हैं, “कुछ सामान बेहद नाज़ुक होते हैं. उनकी पैकिंग से लेकर शिपिंग तक के चार्ज होते हैं. दोनों को मिलाकर ही सामान की क़ीमत तय होती है.”

मेघा कहती हैं कि बात सि‍र्फ़ मुनाफ़े की नहीं है, बात है यहां काम करने वालों को एक अंतर्राष्‍ट्रीय मंच देने की.

फ़ायदा

इस ई कॉमर्स से जुड़े धर्मेश मारू काफ़ी उत्‍साहित हैं. मिट्टी के गमले, साज-सज्जा के सामान वो बनाते हैं.

मारू कहते हैं, “पहले भी हम बाहर सामान भेजते थे, लेकिन इस मंच के द्वारा अब हमें विदेशों से भी ऑर्डर मिलने लगा है. अभी कुछ दिनों पहले अमेरिका से एक ऑर्डर आया था.”

वहीं चमड़े के बैग बनाने वाले मोहम्‍मद रफ़ीक दस साल पहले दिल्‍ली से यहां आए थे. बैग बनाने का काम वो शुरू से करते थे.

उनका कहना है कि, "मुनाफ़ा बहुत कम होता था, लेकिन अब ऑर्डर मिलते हैं और आमदनी भी अच्‍छी होती है. तो हम अपने बेटे को भी इस काम में ले आए हैं."

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