महिला सुरक्षा : क्या वादे नारे बनकर रह गए ?

इमेज कॉपीरइट BJP

भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 का लोकसभा चुनाव जिन मुद्दों पर लड़ा, उनमें महिला-सुरक्षा एक अहम मुद्दा था.

पार्टी ने अपने मैनिफ़ेस्टो में और प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में कई वायदे किए. एक साल के बाद उनका क्या हुआ, इसका आकलन किया महिला मुद्दों पर लिखने वाली वरिष्ठ पत्रकार कल्पना शर्मा ने.

जो वादे अधूरे तौर पर पूरे हुए:

इमेज कॉपीरइट ap

महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा से जुड़े सभी क़ानूनों को सख़्ती से लागू करना: नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक बलात्कार के ज़्यादा मामले दर्ज किए जा रहे हैं. इससे ये समझा जा सकता है कि कड़े क़ानून ने महिलाओं को सामने आने और पुलिस में शिकायत करने का बल दिया है.

साथ ही क़ानून का दायरा बढ़ा है और पुलिस के लिए बलात्कार की हर शिकायत में एफ़आईआर दर्ज करना अनिवार्य हो गया है. लेकिन ये भी मुमकिन है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध की दर भी बढ़ी हो.

दिल्ली पुलिस में ज़्यादा महिलाएं: कैबिनेट के एक फ़ैसले के मुताबिक दिल्ली और छह केंद्र-शासित क्षेत्रों में पुलिस बल में एक-तिहाई पोस्ट महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी लेकिन ये निर्देश राज्यों के लिए नहीं है क्योंकि पुलिस प्रशासन राज्य सरकार के कार्यक्षेत्र में आता है. महिलाओं की ज़्यादा भर्ती के साथ ही ज़रूरी है कि पुरुषों को महिला पीड़ितों के साथ संवेदनशीलता से पेश आने की ट्रेनिंग दी जाए.

इमेज कॉपीरइट AFP

महिलाओं की सुरक्षा के लिए आईटी का इस्तेमाल: महिलाओं की मौजूदा फोन हेल्पलाइन के साथ ‘हिम्मत’ नाम का ऐप शुरू किया गया है. मक़सद ये कि इस ऐप पर तस्वीरें और जानकारी भेजकर महिलाएं फौरन मदद मांग सकती है. सिर्फ़ दिल्ली में दो महीने पहले लाया गया ये ऐप कितना कारगर है, इसपर साफ़ जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है. दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में इन दोनों पर टिप्पणी करते हुए उन्हें ‘निराशाजनक’ बताया.

जो वादे पूरे नहीं हुए:

  1. 660 से घटकर सिर्फ़ 36 ‘रेप क्राइसिस इंटरवेन्शन सेंटर’: महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने बलात्कार पीड़ितों के लिए 660 ऐसे सेंटर बनाने का ऐलान किया था. पर पैसे की कमी के चलते अब सिर्फ़ 36 ऐसे सेंटर खोले जाएंगे. ये सेंटर पीड़ित महिला को मेडिकल मदद, क़ानूनी जानकारी, शेल्टर इत्यादि देने के लिए बनाए जाने थे.
  2. निर्भया फंड के पैसों के इस्तेमाल की योजना नहीं: यूपीए सरकार ने दिसंबर 2012 के सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद 1,000 करोड़ रुपए की राशि का ये फंड बनाया था. भाजपा सरकार ने इस बजट में इस फंड में इतने ही और पैसे डाले हैं पर इस्तेमाल की योजना अब भी तय नहीं की है.
  3. देश में असुरक्षा का माहौल: सरकार की ओर से आने वाले भड़काऊ बयानों से माहौल बिगड़ा है और इसका असर हमेशा महिलाओं पर ही पड़ता है. ख़ास तौर पर अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाएं इसका निशाना बनती हैं. साथ ही अगर बहुसंख्यक समुदाय की महिलाओं को ज़्यादा बच्चे पैदा करने के लिए कहा जाए तो ये भी एक प्रकार की हिंसा ही है और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के सिद्धांत से उलट है.

(बीबीसी हिंदी के एंड्राएप ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं)

संबंधित समाचार