राष्ट्रकवि को 'जातिकवि' बनाने के फ़ायदे

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Image caption हिंदी के जानेमाने कवि रामधारी सिंह दिनकर की क़िताब 'संस्कृति के चार अध्याय' और 'परशुराम की प्रतीक्षा' की गोल्डन जुबली समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जिन दो पंक्तियों को उद्धृत करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार के लोगों से जातपात से ऊपर उठने का आह्वान किया वो पचास साल पहले कांग्रेस को सलाह के तौर पर लिखी गई थीं.

उनसे भी चालीस साल पहले गांधीजी ने 1934 में उत्तर बिहार के भूकंप को जातिवाद और छुआछूत ख़त्म न किए जाने का प्रकोप कहा था और इनसे ऊपर उठने की अपील की थी.

जाति और जातिवाद इतनी हल्की बीमारी होती तो इन महापुरुषों की निस्वार्थ सलाह और झिड़की पर ग़ायब हो गई होती.

इस बार की सलाह तो चुनावी राजनीति और दिनकर की बिरादरी को आकर्षित करने की बहुत साफ रणनीति के चलते आई है.

इसलिए इससे पहले जैसे नतीजों या बिहारी समाज द्वारा अपने व्यवहार पर ग़ौर करने जैसे नतीजे की उम्मीद भी नहीं की जा सकती.

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Image caption मोदी ने रामधारी सिंह दिनकर के परिजनों से भी मुलाक़ात की.

भूमिहार बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक अगड़ी और संपन्न जाति है जो संख्या में ज़्यादा न होकर भी वोट की राजनीति के लिहाज से काफ़ी महत्वपूर्ण जाति है.

अपनी संख्या से ज़्यादा प्रभाव रखने और एकजुट होकर वोट डालने के चलते भी इस जाति का राजनीतिक महत्व ज़्यादा है.

इसलिए प्रधानमंत्री के आह्वान पर जाति टूटेगी या भाजपा एक-दो जातियोँ पर निर्भरता से ऊपर उठेगी, इसकी उम्मीद कम है.

हाँ, कुछ लोगों के लिए यह ज़रूर दिलचस्पी का विषय हो सकता है कि कोई पढ़ी-लिखी और खुद को अगड़ा मानने वाली बिरादरी ऐसे आयोजनों और संकेतों के आधार पर अब भी वोट करेगी क्या?

राष्ट्रकवि या जाति का कवि?

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यह अवसर दिनकर की दो किताबों के पचास साल बाद नए संस्करण के विमोचन का था. उनके नाम और सम्मान के लिए बड़े स्तर पर और आयोजन करने का निश्चय भी यहाँ व्यक्त किया गया.

आयोजन के साथ उन्हें 'भारत रत्न' देने जैसी मांग को जोड़कर उनका यश बढ़ाने का दावा भी किया गया. पर असल में यह राष्ट्रकवि को एक बिरादरी का कवि बनाने जैसा हो सकता है.

दिनकर हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय और पढ़े जाने वाले कवि रहे हैं. गम्भीर विषय, अच्छी कविता और लोकप्रियता जैसे तीनों क्षेत्रों को सम्भालना ही उनकी महानता थी.

उनके और बच्चन के बाद हिंदी साहित्य से यह चीज़ ग़ायब हो गई है. वे भूमिहार समाज और बिहारी समाज की बुराइयों को लेकर भी चौकस रहे थे और जिस पत्र की पंक्तियाँ प्रधानमंत्री पढ़ रहे थे वह भी उनकी समझ का ही प्रमाण है.

भूमिहार बिरादरी

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असल में दिनकर की भूमिहार बिरादरी को अपनी ओर मोड़ने के लिए प्रधानमंत्री और भाजपा को यह सब करने की ज़रूरत नहीं थी.

लालू-राबड़ी राज और सामाजिक न्याय की राजनीति का खुला विरोध इसी बिरादरी ने किया था और इस चलते राजनीतिक क़ीमत भी चुकाई थी.

सारा प्रयास करके भी लालू, वैद्यनाथ पांडेय और अखिलेश सिंह जैसे छुटभैया भूमिहार नेताओं को ही अपनी तरफ़ ला पाए थे.

रामाश्रय प्रसाद, एलपी शाही, राजू सिंह और रामजतन सिन्हा जैसे दमदार नेता कांग्रेस में ही बने रहे.

जब नीतीश कुमार लालू विरोधी राजनीति का ध्रुव बने तो उनको इस बिरादरी का लगभग पूरा समर्थन मिला.

अभी भी उनके साथ कई बड़े भूमिहार नेता हैं. पर लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के एक साथ आ जाने के बाद इस समाज का गुस्सा नीतीश के ख़िलाफ़ भी जाता लग रहा है- लोकसभा चुनाव के नतीजे यही बताते हैं.

वोट की राजनीति

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Image caption इस समारोह में बिहार भाजपा के भूमिहार नेता सीपी ठाकुर (बाएं) भी मौजूद थे.

सो, जो जमात भाजपा की तरफ वैसे ही आती लग रही है, उसके वोट के लिए राष्ट्रकवि को उनकी मौत के लगभग चालीस साल बाद जातिवाद के दलदल में घसीटना कहाँ तक उचित है.

समस्या ढंग के भूमिहार नेता को भाजपा और सरकार के अन्दर सम्मानजनक कुर्सी देने की है. कैलाशपति मिश्र के बाद भाजपा के पास कोई ढंग का भूमिहार नेता नहीँ है.

अभी बिहार भाजपा के सबसे बड़े और सम्मानित भूमिहार नेता डॉ. सीपी ठाकुर को अधिक उम्र के नाम पर सरकार और संगठन में लगभग दरकिनार कर दिया गया है जबकि वे अभी चुस्त-चौकस हैं.

छवि का इस्तेमाल?

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दूसरी ओर गिरिराज सिंह जैसे बड़बोले और बहुत छोटे समर्थन वाले नेता को आगे कर दिया गया है.

जिन मंगल पांडेय को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया उन्हें उससे पहले प्रदेश के बाहर का कोई नहीं जानता था, प्रदेश के अंदर भी बहुत कम लोग जानते थे.

भूमिहारों का गढ़ माने जाने वाले मुजफ़्फ़रपुर, बेगूसराय और गया के किसी भूमिहार को लोकसभा का टिकट भी नहीं दिया गया था.

सो अब भूमिहारों के समर्थन को पक्का करने के लिए राष्ट्रकवि की छवि का यह इस्तेमाल कुछ हैरान करता है.

उस पर जातिवाद से ऊपर उठने का आह्वान, तो जले पर नमक जैसा लगता है.

लेकिन हमने देखा है कि खुद को जातपात से ऊपर बताने वाली भाजपा ने पिछले चुनाव में किस तरह प्रियंका गांधी के मुंह से निकले ‘नीचे स्तर की राजनीति’ को नीच राजनीति और नरेन्द्र मोदी के नीच जाति के होने से जोड़कर बिहार और उत्तर प्रदेश के अति पिछड़ों को ध्रुवीकृत करने की सफल कोशिश की.

मोदी का आह्वान

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अब भाजपा या संघ परिवार को यह श्रेय ज़रूर जाता है कि सारे मंडलवादी बैठे रहे और देश को पहला पिछड़ा प्रधानमंत्री उसी ने दिया.

पर मोदी किसी पिछड़ा उभार के या जाति तोड़ने की मुहिम के लिए नहीं जाने जाते.

इतने लम्बे सार्वजनिक जीवन में उन्होंने अपनी जाति और बचपन के काम (चाय बेचना) का ज़िक्र तभी किया जब उन्हें इससे राजनीतिक लाभ मिलता लगा.

अगर वे पिछड़ों की या जाति तोड़ने की लड़ाई लड़े होते तो उनकी अभी की अपील भी असर करती और उसका कोई सीधा मतलब समझ आता.

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