उच्च जाति आयोगः क्या नफ़ा, क्या नुक़सान?

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बिहार की जनता दल यूनाइटेड–भाजपा गठबंधन सरकार ने जनवरी 2011 में तथाकथित ऊंची जातियों के गरीबों की स्थिति जानने के लिए एक आयोग का गठन किया था.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज डीके त्रिवेदी की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया गया था.

दिसंबर 2014 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने 11 करोड़ रुपए खर्च होने और तीन साल (आयोग के लिए निर्धारित समय) पूरे होने के बावजूद रिपोर्ट तैयार नहीं होने पर सख़्त ऐतराज़ जताया था.

पिछले दिनों आयोग ने अपनी रिपोर्ट बिहार सरकार को सौंप दी.

शोध और रिपोर्ट

आयोग के लिए रिसर्च और रिपोर्ट बनाने का काम किया है आद्री नामक एक ग़ैरसरकारी संस्थान ने.

राज्य के 38 में से 20 ज़िलों के गांवों और शहरों में 10 हजार लोगों के बीच किए गए अध्ययन में हिंदुओं और मुसलमानों की ऊंची जातियों को शामिल किया गया.

इस रिपोर्ट के चार प्रमुख निष्कर्षों, सिफारिशों, आपत्तियों और विवादों पर एक नज़र.

रिपोर्ट के निष्कर्ष

1. ऊंची जाति वाले हिंदुओं में से मात्र 8.6 प्रतिशत के पास 5 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन है, जबकि ऊंची जाति के मुसलमानों में से 1.1 प्रतिशत लोगों के पास 5 एकड़ या इससे अधिक ज़मीन है.

2. ग्रामीण इलाकों में ऊंची जाति के 35.3 प्रतिशत हिंदू और 26.5 प्रतिशत मुसलमान परिवारों पर कर्ज़ है. वहीं शहरी इलाकों में ऐसे हिंदू परिवारों का प्रतिशत 24.9 और मुसलमान परिवारों का प्रतिशत 20.3 है.

3. ग्रामीण इलाकों में मात्र 9.9 प्रतिशत ऊंची जाति के हिन्दू और 8.4 प्रतिशत ऊंची जाति के मुसलमान ग्रेजुएट या उच्च शिक्षित हैं, जबकि शहरी इलाकों में उच्च जाति के ग्रेजुएट हिन्दू और मुसलमान क्रमशः 31.7 प्रतिशत और 25.4 प्रतिशत हैं.

4. ग्रामीण इलाकों में ऊंची जाति के हिन्दू लड़कों का स्कूल छोड़ने का प्रतिशत 6.8 है जबकि 8.1 प्रतिशत लडकियां स्कूल छोड़ देती हैं. शहरी इलाकों में लड़कों और लड़कियों के पढाई छोड़ने का प्रतिशत 2.7 और 4.7 है.

पढ़ाई छोड़ने वाले ऊंची जाति के ग्रामीण मुसलमान लड़के-लड़कियों का प्रतिशत क्रमशः 14.2 और 14.00 है.

तीन प्रमुख सिफ़ारिशें

1. लोक कल्याणकारी (वेलफेयर) योजनाओं में उच्च जाति के गरीबों का भी ख्याल रखा जाए.

2. डेढ़ लाख रुपए से कम सालाना आय वाले उच्च जाति गरीबों को उन सभी योजनाओं से जोड़ा जाए, जो राज्य गरीबों और पीछे छूट गए लोगों के कल्याण के लिए बनाता है.

3. छात्रवृत्ति योजनाओं सहित गरीबों के लिए घर, शौचालय सुविधा और कृषि संबंधी योजनाओं को पुनर्भाषित करते हुए उच्च जाति के गरीबों को भी शामिल किया जाए.

आपत्तियां

1. आयोग ने तीन साल तक निष्क्रिय रहकर एक गैर सरकारी संगठन को रिपोर्ट बनाने की जिम्मेदारी दे दी.

2. रिपोर्ट बनाने से लेकर सिफारिशों तक का काम गैरसरकारी संगठन ने ही किया है, जबकि सिफारिशें आयोग को करनी थी .

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3. उच्च जाति के गरीबों की हालत जानने के लिए 20 ज़िलों में मात्र 10 हजार का सैंपल साइज बहुत छोटा है.

विवाद

साल 2011 में ही आयोग के गठन की घोषणा के साथ विरोध के स्वर सुनाई देने लगे थे.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेहद करीबी माने जाने वाले विधान पार्षद और लेखक प्रेमकुमार मणि ने इसे ग़ैर ज़रूरी बताते हुए कहा था कि पहले से गठित आयोगों की अनुशंसाओं को लागू न करके उच्च जाति आयोग का गठन जातिवाद को बढ़ावा दे रहा है.

खुलेआम विरोध के कारण मणि को विधान परिषद की सदस्यता गंवानी पड़ी थी.

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Image caption प्रेम कुमार मणि ने उच्च जाति आयोग गठित करने का विरोध किया था.

मणि ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि कॉमन सिलेबस सिस्टम और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले सभी बच्चों के लिए योजनाओं की जगह उच्च जाति और पिछड़ी जातियों का बंटवारा जाति विभाजित समाज को और नुकसान पहुंचाएगा.

सफाई

उच्च जाति आयोग के उपाध्यक्ष मोहम्मान अब्बास गैरसरकारी संगठन को रिपोर्ट बनाने और अनुशंसाएं देने की जिम्मेदारी देने के आयोग के फैसले का बचाव करते हैं.

उनका कहना है कि आयोग की उस संगठन (आद्री) पर नज़र थी और आद्री के रिपोर्ट देने के बाद आयोग ने अपने सुझाव देकर कुछ बदलाव भी करवाए थे.

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