'मोदी जी कामयाब नहीं होंगे'

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इस हफ़्ते ख़बर आई कि संसद में एक नया विधेयक पेश होने जा रहा है जिसमें गंदगी फैलाने पर ‘मौके पर ही जुर्माना’ कर दिया जाएगा.

ये इंडियन एक्सप्रेस की प्रमुख ख़बर थी. जिसका मतलब ये हुआ कि सरकार के भीतर से जिसने ये ख़बर लीक की और जिसने छापी उसके हिसाब से ये क़ानून अहम होगा.

रिपोर्ट के मुताबिक़ पर्यावरण मंत्रालय गंदगी फेंकने, इलेक्ट्रॉनिक कचरे की डंपिग, सार्वजनिक स्थलों पर कुछ लिखने, चिपकाने और प्लास्टिक की थैलियों के इस्तेमाल को मामूली जुर्म क़रार देगा और इन पर मौके पर ही जुर्माना लगाने का प्रावधान होगा.

ज़ाहिर है इससे 'स्वच्छ भारत अभियान को क़ानूनी ताक़त' हासिल हो जाएगी.

स्वच्छ भारत अभियान इस सरकार की एक बहुत अहम परियोजना है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि “प्रधानमंत्री की अहम योजना पिछले साल अक्तूबर में शुरू की गई थी, और ये सिंगापुर के पहले प्रधानमंत्री ली क्वान यू के सफ़ाई अभियान की तर्ज़ पर है.”

“यू ने इस अभियान को सिंगापुर के आधुनिकीकरण की योजना का हिस्सा बनाया था जिसमें गंदगी फैलाने वालों को जुर्माना देना पड़ता था.“

लेकिन क्या सिंगापुर एक बढ़िया मॉडल है और क्या ली क्वान यू के जैसी योजना को यहां लागू किया जा सकता है?

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पहली बात जो क़ाबिले ग़ौर है कि चीनी, सिंगापुर में सबसे अधिक आबादी चीनियों की है; अपने पास पड़ोस के इलाक़ों में उस तरह से गंदगी नहीं फैलाते हैं जैसी हमें भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में नज़र आती है.

श्रीलंका इस मामले में अलग है लेकिन ये वक़्त फ़िलहाल उस पर ध्यान देने का नहीं है.

चीनी दुनिया में कहीं भी हों वो पास पड़ोस से नाता और साफ़ सफ़ाई का ख़्याल रखते हैं. उनकी ये बेहतर बात साफ़ नज़र आ जाती है चाहे वो मुल्क में हो या विश्व के किसी दूसरे हिस्से में जिन्हें अक्सर चाइना टाउन बुलाया जाता है.

अगर कोई भी इस पर ध्यान देगा तो देखेगा कि ये गुण हमारे इलाके में ग़ायब है. इसलिए मैं कहना चाहूंगा कि क़ानून सिर्फ़ एक हद तक मददगार हो सकता है.

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अगर ये ली का कमाल था तो हम हांगकांग की सफ़ाई और दुरुस्त निज़ाम का सेहरा किसके सर बांधेंगे. वहां भी चीनी बड़ी तादाद में रहते हैं और वहां का प्रशासन भी सिंगापुर की तरह ज़ोर जबरदस्ती के साथ चलता है.

दूसरी बात ये है कि संसद में लाया जाने वाला ये नया क़ानून क्या नया वाक़ई नया है.

पिछले कुछ महीनों की सुर्ख़ियां ही देखें तो हमें वो ख़बर मिल जाएगी, ‘अब गली-कूचों में कूड़ा बिखेरने के लिए दंड भरिए’.

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अमृतसर से आई इस ख़बर में कहा गया है कि नगर निगम को लग रहा है कि महज़ स्पॉट फ़ाइन कर देना काफ़ी नहीं है.

द ट्रिब्यून अख़बार ने लिखा है कि हालांकि इस बात का प्रावधान था कि जुर्माना मौके पर ही वसूल किया जाए लेकिन ये सोचा गया कि कम से कम क़ानून तोड़ने वाले को अदालत में पेश होने की दिक्क़त झेलनी चाहिए.

पिछले साल इस बात का ऐलान किया गया था कि जो भी शख़्स रेलवे स्टेशनों या ट्रेनों में गंदगी फैलाएगा उस पर 5000 रूपये का जुर्माना लगाया जाएगा.

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भारतीय ट्रेनें दुनिया की सबसे गंदी ट्रेनों में से हैं.

दिल्ली नगर निगम ने बीते साल अगस्त में 500 रुपये के जुर्माने का ऐलान किया था.

साल 2010 में हिंदुस्तान टाइम्स ने एक नये क़ानून के बारे में लिखा जिसमें थूकने, गंदगी फैलाने और लोगों को सार्वजनिक स्थलों पर पेशाब करने से रोकने के लिए 500 रूपये का प्रावधान होगा.

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तो एक नया क़ानून तैयार करना गंदगी ख़त्म करने का ग़लत रास्ता है.

सरकार को क्या करना चाहिए?

दिक्क़त है कि सरकार एक क़ानून की सहायता से सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव लाना चाहती है.

क्या उसे ऐसा करना चाहिए?

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तो इसका जवाब हां है. क्योंकि हम कह सकते हैं कि कन्या भ्रूण हत्या और दहेज़ के लिए हत्या भी सामाजिक बुराई है और उसे समाप्त करने के लिए कड़े क़ानून की ज़रूरत है.

लेकिन वो हत्या के भी मामले हैं और उससे उस आधार पर भी निपटा जा सकता है.

लेकिन स्वच्छ भारत अभियान क्या है और इससे कौन सा लक्ष्य हासिल करने का इरादा है इसे लेकर जो भ्रम है वो जो संकेत दिए गए उनमें झलकता है.

प्रधानमंत्री ने ख़ुद झाड़ू उठाकर और कई जगहों की सफ़ाई में शामिल होकर एक उदाहरण पेश करने की कोशिश की है. हालांकि ख़बरों के मुताबिक वो सारी जगहें कुछ ही दिनों में फिर से गंदगी से भर गईं.

इस बारे में उन्होंने जो ट्वीट किए वो उन प्रमुख व्यक्तियों को मुबारकबाद देने पर है जिन्होंने एक दिन झाड़ू उठाकर इस अभियान में हिस्सा लिया था.

लेकिन दूसरी ओर सरकारी इश्तिहारों में कहा गया है कि स्वच्छ भारत अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय बनाने के बारे में है और उसका लक्ष्य संख्या में दिया गया है.

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मुझे लगता है कि मोदी स्वच्छ भारत अभियान गांधीवादी तरीके से चलाना चाहते हैं. हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं से जूझना नेक और महत्वाकांक्षी काम है. गांधी ने ये काम निरंतर निजी उदाहरण पेश कर किया, जैसे कि अपना शौचालय साफ़ करना और सूत कातना. मोदी ये काम सरकार के ज़रिए करना चाहते हैं. सही है कि गांधी नाकाम हुए. कोई भारतीय अपना शौचालय साफ़ नहीं करेगा अगर कोई और उसके लिए ये काम कर सकता है और खादी की मौत हो चुकी है.

क्या मोदी कामयाब होंगे? नहीं, क्योंकि सांस्कृतिक बदलाव क़ानून से नहीं आते और रातोंरात तो कभी नहीं. ये अंदर से आते हैं और गांधी इसे समझते थे. मोदी की छवि भारतीयों में बड़ी सकारात्मक है और उनके निजी उदाहरण से फ़र्क ज़रूर पड़ेगा. अगर वो गंभीर हैं तो उन्हें इसी पर ध्यान देना चाहिए. उनके जीवनकाल में तो बदलाव नहीं आने वाला, लेकिन ये एक नए क़ानून से ज़्यादा असरदार होगा.

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