पंचनामा: टीवी न्यूज़ रिपोर्टिंग की मौत का

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कोई भी न्यूज़ चैनल देखिए, कोई भी अख़बार उठाइए सब एक जैसे लगते हैं. उसी तरह की सुर्ख़ियाँ, भाषा भी एक जैसी और कमोबेश एक सा नज़रिया.

अपवाद हैं, लेकिन बहुत कम. इतने कम कि परिदृश्य पर इकहरी तस्वीर ही दिखलाई देती है. दूसरे पक्ष दिखलाई क्यों नहीं देते?

मीडिया के इस अभूतपूर्व विस्तार में हमें समाचारों और विचारों की विविधता वाली दुनिया क्यों नहीं दिखलाई देती?

इस सवाल के यूं तो बहुत से जवाब हैं. मसलन, एक मीडिया अपने लाभ-हानि को ध्यान में रखकर पूरे समाज को नहीं बल्कि उसके एक छोटे से हिस्से को कवर कर रहा है या मीडिया को चलाने वाले बाज़ार का एजेंडा उसे एक ख़ास साँचे में ढाल चुका है.

ये बड़ी सचाईयाँ हैं, मगर एक बड़ी वजह और भी है - मीडिया संस्थानों का ख़बरों और विचारों के लिए सीमित स्रोतों पर निर्भर हो जाना.

हर तरफ़ एक एजेंसी

चैनल कुछ चुनिंदा एजेंसियों से ख़बरें लेकर अपना कारोबार चला रहे हैं. मसलन, भारत में न्यूज़ चैनल एकमात्र न्यूज़ एजेंसी एएनआई पर पूरी तरह से निर्भर हैं.

लाइव कवरेज के मामले में तो इसका वर्चस्व कायम हो चुका है. साढ़े तीन सौ न्यूज़ चैनलों में से क़रीब दो सौ चैनलों पर एक साथ इसकी एक समान न्यूज़ फ़ीड प्रसारित होती है.

ये शुरू कैसे हुआ?

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टीवी न्यूज़ इंडस्ट्री में इस परिवर्तन की शुरूआत करीब साढ़े तीन साल पहले हुई थी.

उस समय एएनआई औसत दर्ज़े की एजेंसी मानी जाती थी और चैनल उसे विकल्प न होने की वजह से ही लेते थे. यानी मजबूरी का नाम एएनआई था.

इसी दौरान कई नई न्यूज़ एजेंसियों ने दस्तक दी और उनमें से एकाध ने अच्छा कंटेंट देना भी शुरू किया, जिससे एक होड़ शुरू हुई.

एएनआई को भी अपनी ख़बरों में सुधार करने के लिए बाध्य होना पड़ा.

लेकिन दुर्भाग्य से नई एजेंसियाँ चल नहीं पाईं और न्यूज़ चैनलों में हो रही बढ़ोतरी के बीच एएनआई की लॉटरी लग गई.

असली गेमचेंजर साबित हुईं एएनआई की लाइव कवरेज सेवाएं. घटनाओं के सीधे प्रसारण पर चैनलों को काफ़ी ख़र्च करना होता था.

ऐसे में जब उसे कौड़ियों के मोल लाइव फ़ीड मिलने लगी तो उसने उसे फौरन लपक लिया.

चैनलों की मजबूरी

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यहां दो चीज़ों का ज़िक्र करना बहुत ज़रूरी है. पहली तो ये कि ठीक यही समय था, जब ऊपर के दो-तीन चैनलों को छोड़कर बाक़ी की माली हालत पस्त थी.

वे घाटे में चल रहे थे और सुधार की कोई उम्मीद ही नज़र नहीं आ रही थी. ऐसे में एएनआई उन्हें मुँहमाँगी मुराद जैसी लगी.

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दूसरी उल्लेखनीय चीज़ ये रही कि एएनआई ने लाइव कवरेज के लिए सस्ती टेक्नालॉजी का इस्तेमाल किया.

इंटरनेट के लिए इस्तेमाल होने वाले उपकरणों (बैक पैक सॉल्यूशन) के मार्फ़त लाइव कवरेज का खर्च अपेक्षाकृत कम होता था, क्योंकि ओबी वैन के मुक़ाबले ये बेहद सस्ता था और इसमें कम कर्मचारियों से भी काम चल जाता था.

इससे लाइव पर होने वाले खर्च में भारी कटौती हो गई और बहुत सस्ती दरों पर सेवाएं मिलने लगीं.

सुविधा क्यों बनी अभिशाप?

लेकिन ये सुविधा पत्रकारिता के लिए अभिशाप बन गई. इसने चैनलों पर रिपोर्टिंग का काम लगभग ख़त्म कर दिया.

चैनल रिपोर्टिंग के बजाय डेस्क से संचालित होने लगे. यही वजह है कि अब हमें मौलिक रिपोर्ट बहुत कम या नहीं के बराबर देखने को मिलती हैं.

सारे चैनल एएनआई से मिली ख़बरों को ही पैकेज, रीपैकेज करके दिखलाते रहते हैं.

भूकंप, बाढ़ या ऐसी ही किसी बड़ी घटना के मौक़े पर कुछ चैनल बेशक़ होड़ में आगे रहने के लिए अपने संसाधन झोंक देते हैं, मगर ज़मीनी रिपोर्टिंग के लिए वे कुछ भी खर्च करने के लिए राज़ी नहीं होते.

ख़बरों का बचा खुचा बंटाधार कैसे हुआ?

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ख़बरों को तेज़ रफ़्तार बनाने के चक्कर में चैनलों ने उनकी अवधि पहले ही कम कर दी थी.

कभी वे तीन-चार मिनट की अच्छी रिपोर्ट भी दिखाते थे, मगर अब वे डेढ़ मिनट की अधिकतम समय सीमा निर्धारित कर चुके हैं.

इस बीच में कुछेक चैनलों ने पंद्रह सेकेंड के फुटेज पर तूफ़ान खड़ा करके टीआरपी बटोरने का फंडा ईजाद कर लिया, जिससे रिपोर्टिंग का महत्व कम होता चला गया.

यही वह दौर भी था जब यूट्यूब पत्रकारिता ने मुफ़्त के माल पर खेल करने की प्रवृत्ति पैदा की और चैनल रिपोर्टिंग से दूर हटते चले गए.

ये मीडिया के मनोरंजनीकरण का भी दौर था, जो आज भी जारी है.

पर रिपोर्टरों के क्या हाल हैं?

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रिपोर्टिंग के प्रति चैनलों के रवैये की परख इससे भी की जा सकती है कि उन्होंने बहुत से ब्यूरो बंद कर दिए हैं या फिर वहाँ काम करने वाले लोगों की संख्या बहुत घटा दी है.

जो रिपोर्टर हैं, वे या तो रिपोर्टिंग भूल चुके हैं या उन्हें रिपोर्टिंग का मौक़ा ही नहीं दिया जाता.

तो न्यूज़ देखने वालों का क्या हुआ?

वास्तव में देखा जाए तो भारत में न्यूज़ रिपोर्टिंग की मौत हो चुकी है. आर्थिक रूप से दुर्बलता के शिकार न्यूज़ चैनल मानसिक रूप से भी दीवालिए हो गए हैं.

उन्होंने रिपोर्टिंग की कुर्बानी देकर अपनी साख तो गँवाई ही है, अपना आकर्षण भी कम कर लिया है.

इसी का नतीजा है कि लोग अब नवीनता और विविधता को खोजने के लिए इंटरनेट का रुख़ कर रहे हैं.

बाकी दुनिया में क्या हुआ?

ये केवल भारत मे हो रहा हो ऐसा नहीं है. पश्चिमी देशों में भी यही प्रवृत्ति हावी है.

वहाँ भी खर्चा कम करने के लिए बड़े अख़बारों और टीवी चैनलों ने अपने रिपोर्टरों की तादाद कम की है, ब्यूरो बंद या छोटे किए हैं और अंशकालिक संवाददाताओं या सिंडिकेट सर्विस पर निर्भरता बढ़ा दी है.

इसका सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को हो रहा है. घटनाओं के भिन्न पहलुओं से अनजान रहने की वजह से लोग स्वतंत्र एवं निष्पक्ष राय नहीं बना पाते.

इससे लोकतंत्र को चलाने में उनकी भूमिका भी अधूरी रहती है. नतीजतन, वह चंद लोगों और बाज़ार की निरंकुशता का शिकार हो रहा है.

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