मिलिए मैसूर के नए 'राजा' से

  • 28 मई 2015
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मैसूर के वॉडेयार राजघराने को अपना 27वां 'राजा' मिल गया है.

23 साल के यदुवीर कृष्णदत्त वॉडेयार मैसूर की एक भव्य समारोह में ताजपोशी हुई.

यदुवीर अर्थशास्त्र में अंडर ग्रेजुएट हैं. उन्होंने अमरीका के मैसाचुसेट्स से पढ़ाई की है.

यदुवीर ने अपने चचेरे दादा श्रीकांतदत्त नरसिंहराज वॉडेयार की जगह ली जिनका निधन दिसंबर 2013 में हो गया था.

श्रीकांतदत्त की कोई संतान नहीं थी और उनकी पत्नी प्रमोददेवी वॉडेयार ने हाल ही में यदुवीर को गोद लिया था.

भव्य समारोह

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यदुवीर की ताजपोशी का कार्यक्रम क़रीब 118 मिनट चला और इस दौरान मैसूर महल में स्थित 15 मंदिरों में कुल 40 पुजारियों ने पूजा-अर्चना कराई.

मैसूर राजघराने के क्यूरेटर माइकल लुडग्रोव ने बीबीसी को बताया, "ये बेहद भव्य समारोह था. यहां मैसूर के हर समुदाय के लौग मौजूद थे."

इस समारोह में देश-विदेश से आए क़रीब एक हज़ार मेहमान मौजूद थे. इसमें पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा और कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया भी मौजूद रहे.

लुडग्रोव के मुताबिक़ नए राजा यदुवीर बेहद उत्साही और ऊर्जा से भरे हैं.

दूसरी ओर इतिहासकार पीवी नंजराज उर्स के मुताबिक़ ये एक पारिवारिक मामला था और इस समारोह को मीडिया ने बेवजह का तूल दिया.

उन्होंने आगे कहा, "हालांकि वॉडेयार परिवार के कुछ सदस्यों ने वाकई समाज के लिए काफ़ी काम किया है. ख़ुद महात्मा गांधी ने एक दफ़ा इस परिवार की तारीफ़ की थी. उनके परिवार के आम लोगों से बड़े आत्मीय संबंध रहे हैं."

विरासत

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यदुवीर को विरासत में मैसूर, बैंगलूरु और हासन में मौजूद राजपरिवार की 1500 एकड़ ज़मीन मिली है.

लेकिन साथ ही उन्हें कर्नाटक सरकार से क़ानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ेगी क्योंकि राज्य सरकार मैसूर महल की संपत्तियों पर सरकारी कब्ज़ा चाहती है और पहले से ही ये मामला अदालत में है.

इसके साथ ही यदुवीर के एक चाचा कंठराज उर्स भी उनसे बेहद नाराज़ हैं क्योंकि उन्हें लगता था कि नया राजा बनने का हक़ उनका था.

किवदंती

मैसूर घराने में स्वामित्व की लड़ाई इसलिए होती है क्योंकि मैसूर के राजा की कभी अपनी कोई संतान नहीं होती.

किवदंती है कि 17वीं सदी में पड़ोसी राज्य श्रीरंगपट्टना में मैसूर के राजा ने हमला कर दिया. वहां की रानी हमले के बाद भाग गईं.

जब मैसूर की सेना ने उन्हें खोज निकाला तो उन्होंने कावेरी नदी में कूद कर जान दे दी.

लेकिन उससे पहले उन्होंने मैसूर के राजा को श्राप दे दिया कि उन्हें कभी संतान नहीं होगी.

उसके बाद से मैसूर के राजाओं को कोई संतान नहीं होती और इस घराने में हमेशा बच्चे गोद में लेकर उनकी ताजपोशी होती आई है.

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