नेताजी को कौन मारना चाहता था?

कर्नल निजामुद्दीन

आजाद हिंद फौज के संस्थापक सुभाष चंद्र बोस का ड्राइवर होने का दावा करने वाले 'कर्नल' निज़ामुद्दीन बताते हैं कि बर्मा में एक बार नेताजी पर हमले की कोशिश की गई थी.

उनका दावा है कि किसी ने नेताजी को लक्ष्य करके गोलियां चलाई थीं, तीन गोलियां 'कर्नल' निजामुद्दीन की पीठ में लगीं. इन गोलियों को आज़ाद हिंद फौज की कैप्टन डॉक्टर लक्ष्मी सहगल ने निकाला था.

पढ़िए पूरी कहानी विस्तार से

पूर्वी उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले के मुबारकपुर का अल-जमीयतुल अशरफिया मदरसा दुनिया भर में मशहूर है.

इस मदरसे के आगे से एक संकरी सड़क ढकुआ गाँव जाती है. इस गांव में ईंटों से बने एक घर के ऊपर तिरंगा झंडा लहरा रहा है. यह घर है निजामुद्दीन का.

घर में दाखिल होते ही वो चारपाई पर बैठे हुए नज़र आते हैं. उनके दोनों हाथ कांप रहे हैं. निजामुद्दीन के बेटे शेख अकरम बताते हैं, "अब्बा अब 104 साल के हो गए हैं,"

निज़ामुद्दीन अपने नाम के आगे 'कर्नल' लगाते हैं. इस पर उन्हें गर्व है.

(पढ़े : सुभाष चंद्र बोस की हत्या हुई या मृत्यु)

वो बताते हैं कि यह नाम उन्हें आज़ाद हिंद फ़ौज के संस्थापक और भारतीय कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस ने दिया था.

हमले की कोशिश

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'कर्नल' निजामुद्दीन ने बताया कि बर्मा के जंगलों में जब सुभाष चंद्र बोस आज़ाद हिन्द फ़ौज की कमान थामे हुए थे तब उन पर एक जानलेवा हमले की कोशिश हुई थी.

उन्होंने बताया, "शाम चार बजे जंगल के बीचोबीच एक मीटिंग हो रही थी तभी मुझे लगा कि नेताजी पर कोई निशाना साध रहा है. मैं उनके सामने पहुँचा ही था कि मेरी पीठ में तीन गोलियां लगीं. गोली लगने के तीन दिन बाद मुझे होश आया."

पीठ पर गोलियों के निशान दिखाते हुए निजामुद्दीन ने दावा किया कि ये गोलियां आज़ाद हिंद फ़ौज की वरिष्ठ अधिकारी कैप्टन डॉक्टर लक्ष्मी सहगल ने निकालीं थी. इसके बाद से ही सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें 'कर्नल' कह कर बुलाना शुरू कर दिया.

मुलाक़ात

निजामुद्दीन बताते हैं कि नेताजी से उनकी पहली मुलाक़ात सिंगापुर में हुई थी. वहां आज़ाद हिन्द फ़ौज की भर्ती चल रही थी.

वो बताते हैं, "मैं ब्रिटिश आर्मी में पैराट्रूपर था लेकिन अपने मद्रासी और कश्मीरी सैनिकों के साथ सेना छोड़ सुभाष के साथ हो लिया. मैं ड्राइवर भी था इसलिए सुभाष बोस ने मुझे अपने साथ रख लिया.''

निजामुद्दीन बताते हैं, "जोहरबारु के राजा ने 12 सिलेंडर वाली एक गाड़ी नेताजी को तोहफ़े में दी थी. मैं उसे ही चलाने लगा. लेकिन उन्होंने मुझे कभी भी ड्राइवर नहीं कहा, हमेशा बाबू कह कर बुलाते थे".

निजामुद्दीन का असली नाम सर्फुद्दीन था. लेकिन आज़ाद हिन्द फ़ौज में भर्ती के समय उन्होने अपना नाम बदलकर निजामुद्दीन लिखवा दिया था.

भारतीय पासपोर्ट

निज़ामुद्दीन के पास भारत से 1940 के दशक में जारी वो पासपोर्ट भी है जिससे पता चलता है कि वे बर्मा में रहते थे, जहाँ उनकी शादी भी हुई थी.

अकरम ने बताया कि वो लोग छह भाई-बहन हैं. सबकी पैदाइश बर्मा में हुई है.

उन्होंने कहा, "अब्बा हम लोगों को ये कहकर 1969 में भारत ले आए कि यहाँ सब कुछ बर्मा से बेहतर है. तब से हम यहीं अपने गाँव में ही हैं".

प्रमाण की वास्तविकता

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पिछले साल वाराणसी में अपना चुनाव अभियान शुरू करने से पहले नरेंद्र मोदी ने 'कर्नल' निजामुद्दीन के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया था.

हालांकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनकी मृत्यु से जुड़ी जानकारी पर सालों से शोध कर रहे अनुज धर 'कर्नल' निज़ामुद्दीन के दावों से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते हैं.

अनुज धर कहते हैं, "निजामुद्दीन बुज़ुर्ग हैं इसलिए इनकी इज़्ज़त होनी चाहिए. मैं मान रहा हूँ कि वे आज़ाद हिंद फ़ौज में रहे होंगे. लेकिन नेताजी की मृत्यु पर बने खोसला और जस्टिस मुख़र्जी कमीशन के सामने वे कभी क्यों नहीं पहुँचे. वे शाहनवाज़ कमेटी तक के सामने नहीं आए. जबकि मेरे पास प्रमाण है कि नेताजी के ऑर्डरली सुनील राज थे और उनके बॉडीगार्ड उस्मान पटेल थे".

धर का दावा है कि 1945 से लेकर 1947 तक नेताजी रूस में थे न कि बर्मा में जैसा कि निजामुद्दीन दावा कर रहे हैं.

(अगले भाग में पढ़िए निज़ामुद्दीन के उन दावों के बारे में जिनके मुताबिक़ नेताजी हवाई हमलों से बचने के लिए कितने स्थान बदलते थे.)

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