'नहीं जानता इस भारत को मैं'

लू से अपने आप को बचाती युवती, भारत इमेज कॉपीरइट EPA

मुंबई में सालों पहले एक बड़े मीडिया हाउस के दिल्ली से आए एक डायरेक्टर ने मुझे डांटते हुए कहा था कि वो नहीं मानते कि भारत में ग़रीबी है.

उनका तर्क था कि भारत एक विकसित देश है.

मैं उनकी बात सुनकर हैरान रह गया. मैंने काफ़ी सोचा क्या उन्होंने कभी धारावी देखा है? क्या उनकी नज़र लाखों बेघर लोगों पर नहीं पड़ी जो मुंबई में हर जगह नज़र आते हैं? क्या उन्होंने कभी दिल्ली की कच्ची बस्ती यमुना पुश्ता का दौरा किया है? शायद नहीं.

मैंने बहुत सोचा इसके बारे में और फिर इस नतीजे पर पहुंचा कि उनकी दुनिया अलग है.

वे वातानुकूलित कार में घूमते हैं, उनके दफ़्तर और घर वातानुकूलित हैं और जिन दुकानों और मॉल में शॉपिंग करते हैं वे भी वातानुकूलित हैं.

ज़ाहिर है जिस भारत में वे सांस ले रहे हैं वो यक़ीनन विकसित है.

लेकिन आजकल तेज़ गर्मी और लू से अधिकतर कौन मर रहा है? कड़ाके की सर्दियों में किसकी मौत अधिक होती है? और बाढ़ में किसकी जानें और ज़्यादा जाती हैं?

जवाब है ग़रीब, बेघर और मुफ़लिस बुज़ुर्ग. हर मौसम में प्राकृतिक आपदा आती है और हर आपदा में अधिकतर मज़दूर, किसान, ग़रीब और बूढ़े इसकी चपेट में आते हैं.

भीषण गर्मी

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पिछले दस दिनों में सख्त गर्मी और लू से देश भर में 1700 लोगों की जानें जा चुकी हैं जिन में अधिकतर मौतें तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में हुई हैं.

पिछले कुछ दिनों से तेज़ गर्मी से मरने वाले और उनके परिवारों के हाल पर रिपोर्टिंग करने के बाद मुझे ऐसा लगा कि मैं भी भारत को उस मीडिया हाउस के डायरेक्टर की तरह ठीक से नहीं जानता.

मैं दो-तीन घंटे धूप में काम करता और वातानुकूलित वाहन में घुसने के लिए परेशान हो जाता. पसीना आता तो फ़ौरन चेहरा पोछने की कोशिश करता.

लेकिन दिल्ली की सड़कों पर हज़ारों ऐसे लोग दिहाड़ी कमाने में लगे हुए थे उसी सख्त गर्मी में.

उनका कहना था पैसे न कमाएं तो पेट कैसे भरें. वो 45 डिग्री तापमान में काम करते नज़र आए. फ्लाईओवर और पुलों के नीचे धूप की तपिश से बचते नज़र आए, बस अड्डों के अंदर और पेड़ों के नीचे साये में सांस लेते दिखे. दिल्ली से बाहर खेतों में किसान काम करते नज़र आए.

हक़ीक़त से अलग तस्वीर

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पहले दो दिनों तक मीडिया ने इस ख़बर को नज़रअंदाज़ किया लेकिन जब मृतकों की संख्या बढ़ने लगी तो ये ख़बर सुर्ख़ियों में आने लगीं.

इसी तरह जब तक मीडिया ने इसे सुर्ख़ियों में नहीं लाया तब तक राज्य सरकारों ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया.

अब जो क़दम उठाए जा रहे हैं वे देरी से और अपर्याप्त हैं.

मुझसे बीबीसी के एक अमरीकी पार्टनर रेडियो स्टेशन ने पूछा कि इतनी जानें क्यों जा रही हैं? क्या प्रशासन जनता को समय से पहले आगाह नहीं करता? दूसरा सवाल था नरेंद्र मोदी विदेशों में भारत की जो तस्वीर पेश कर रहे हैं वो हक़ीक़त से अलग नज़र आती है.

दोनों सवाल वाजिब थे. लेकिन अगर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की राज्य सरकारें लोगों को एक दो दिन पहले आगाह भी कर देतीं तो मृतकों की संख्या में अधिक फ़र्क़ नहीं पड़ता.

राज्य सरकारों ने नागरिकों से बार-बार अपने घरों में रहने की सलाह दी. लेकिन मैंने जिस मज़दूर या किसान को ये बात बताई उसने कहा अगर वो अपने घरों में रहेंगे तो अपना और अपने परिवार का पेट कैसे भरेंगे?

ग़रीबी

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भारत की आबादी 120 करोड़ है, इसका पांचवां हिस्सा ग़रीबी रेखा से नीचे रहता है. हाशिए पर रहने वाले लोग हर आपदा में मरते हैं. लेकिन आज़ादी के 68 साल बाद भी इस पर सरकार का ध्यान नहीं गया है.

हक़ीक़त ये है कि 1991 के आर्थिक सुधार के आने के बाद से हाशिए पर रहने वाले लोग और भी बदतर हालत में जा चुके हैं.

अब मोदी सरकार के लिए चुनौतियां गंभीर हैं. विदेश में रहने वाले प्रवासी भारतीयों के लिए ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि यहां लोग किस हाल में रह रहे हैं.

प्रधानमंत्री ने हमेशा 120 करोड़ नागरिकों के विकास की बात की है. उम्मीद है वो अपने वादे पर अमल करेंगे.

साथ ही मैं उस मीडिया हाउस के डायरेक्टर की तलाश में हूँ जिसने मुझसे मुंबई में कहा था भारत में ग़रीबी नहीं है.

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