स्मृति ईरानी को क्या करना चाहिए था?

गणित इमेज कॉपीरइट Thinkstock

गणित के इतिहास में सबसे मशहूर द्वंद्व युद्ध 30 मई 1832 को हुआ था. और इसका अंत एवारिस्ते गैलोवा को पेट में गोली लगने के साथ हुआ. इसके अगले दिन ही 20 वर्ष की उम्र में उनकी मौत हो गई.

लेकिन गणित के क्षेत्र में कई अहम योगदान देने के अलावा, तब तक उन्होंने गणित की पूरी तस्वीर बदलने वाला काम पूरा कर लिया था. इसे गैलोवा थ्योरी के नाम से जाना जाता है.

उनका काम तो बहुत आसानी से नहीं समझाया जा सकता, लेकिन उनमें से एक के बारे में वो लोग ज़रूर समझ सकते हैं, जो स्कूली दिनों के बीजगणित में द्विघातीय समीकरणों को हल करने के सूत्र से परिचित हैं. (समीकरण ax^2 + bx + c= 0, जहां a शून्य नहीं है.)

इसी तरह 3 और 4 घातों वाले बहुपदीय समीकरणों (x की घात 3 और 4) के लिए भी ऐसे ही सूत्र 16वीं शताब्दी में खोजे गए और 1825 में एक अन्य मेधावी गणितज्ञ नील्स हेनरिख़ एबेल ने दिखाया कि घात 5 वाले बहुपदीय समीकरणों के लिए कोई सूत्र नहीं हो सकता.

एबेल के नतीजों के समर्थन में सबूत देने के अलावा, गैलोवा के इस सिद्धांत का इस्तेमाल ऐसे बहुपदीय समीकरणों के लिए सूत्र का पता लगाने के लिए भी किया जा सकता है, जिनके घात पांच या उससे अधिक हैं.

पढ़ें विस्तार से

इमेज कॉपीरइट THINKSTOCK

गैलोवा की ज़िंदगी और मौत की कहानी, सालों से इकट्ठा होती किवंदतियों के बिना भी पर्याप्त रोमांटिक है.

एक किवंदति है कि द्वंद्व युद्ध के पहले की पूरी रात वो एक सिद्धांत को लिखते रहे, जिसका नाम उनके नाम पर रखा गया होता.

ऐसा लगता है कि तथ्य इससे मेल नहीं खाते, बल्कि घटनाओं के तार जोड़ कर इस किवंदति को दुरुस्त करने के प्रयास, इसमें अपना नज़रिया जोड़ते हैं. इसके बावजूद वो मृत्यु कम दुखांत नहीं रह जाती और यह कहानी कम रोमांटिक नहीं हो जाती.

उनके सारे कामों को इकट्ठा करने के लिए गठित एवारिस्ते गैलोवा आर्काइव उनकी ज़िंदगी के बारे में तथ्यों को क्रमबद्ध करती है और उस पर प्रकाश डालती है.

इसमें उस द्वंद्व युद्ध के बारे में कुछ इस तरह लिखा गया है:

इमेज कॉपीरइट BBC World Service

द्वंद्व युद्ध और यहां तक ले जाने वाली घटनाएं, समय, उपन्यासकारों की फंतासियों और जीवनी लेखकों के कारण धुंधली हो गई हैं...यह बिल्कुल असंभव है कि यह द्वंद्व युद्ध, उनकी हत्या के लिए राजा के वफ़ादारों की साजिश का परिणाम था...अधिक संभव है कि गैलोवा ने खुद ऐसी कथाओं को उकसाया हो. वो विद्रोह के लिए जनता को भड़काने के लिए, खुद को सरकारी उत्पीड़न के शिकार के रूप में दिखाना चाहते थे. उन्होंने अपनी अंतिम चिट्ठियों में इस ओर ऐसे संकेत छोड़े. सबसे सही कारण यह लगता है: अपने तनाव भरे प्रेम संबंध के कारण वो अपनी ज़िंदगी, अपने गणित के कामों की बदौलत पहचान बनाने की असफल कोशिशों और राजनीति में एक अंधी गली तक पहुंच जाने के एहसास से उकता गए थे. इसलिए उनका यह द्वंद्व युद्ध एक पूर्व प्रायोजित आत्महत्या थी. लेकिन एक बात साफ है.....द्वंद्व युद्ध के पहले की रात उन्होंने अपने गणितीय सिद्धांत को पूरा सम्मान बख्शा.

गैलोवा की राजनीति, असल में उतनी ही क्रांतिकारी थी जितना उनका गणित. साल 1830 में विपक्ष की उदारवादी पार्टी के बहुमत में आ जाने के बाद फ्रांस के राजा चार्ल्स दशम् को अपनी गद्दी छोड़नी पड़ी थी.

लेकिन उन्होंने तख़्तापलट के मार्फ़त प्रेस की आज़ादी और मध्यवर्ग की अधिकांश आबादी को भविष्य में चुनाव में हिस्सा लेने से प्रतिबंधित करने वाले आदेश जारी कर दिए.

हालांकि एक लोकप्रिय जनउभार के बाद उन्हें जल्द ही गद्दी से फिर उतार दिया गया और संवैधानिक राजतंत्र लागू हुआ.

राजनीति और गणित

इमेज कॉपीरइट Getty

1830 से गैलोवा विपक्ष के साथ काफ़ी सक्रिय थे, लेकिन 1830 के सफल जनउभार के दौरान प्रदर्शनों में शामिल होने से रोकने के लिए उन्हें और उनके साथी छात्रों को एकोल पोलिटेक्निक के डायरेक्टर ने एकोल नोर्मेल में बंद कर दिया था जबकि इस उभार में संस्था के छात्रों ने अहम भूमिका निभाई थी.

इसके विरोध में गैलोवा ने एक खुला तीखा पत्र लिखा, जिसके बाद उन्हें निकाल दिया गया. इसके बाद उग्र राजनीतिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी बढ़ती गई और 1831 में वो गिरफ़्तार हो गए. वो अपनी मौत से महज एक महीने पहले 29 अप्रैल 1832 को रिहा हुए.

ऐसा डायरेक्टर जो समझदार होता और इस तथ्य के प्रति अधिक खुली सोच रखने वाला होता कि गणित या विज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाले उग्र विचार वाले लोग जब राजनीति में उतरते हैं तो उन्हें परम्परागत सोच तक सीमित नहीं रखा जा सकता, गैलोवा को उस हताशा से बचा सकता था, जो महज 20 वर्ष की उम्र में तब उनकी मौत का कारण बना, जब उन्होंने गणितज्ञ के रूप में अभी अपनी यात्रा शुरू ही की थी.

हाल ही में आईआईटी मद्रास में हुए घटनाक्रम को इस चरम उदाहरण के बरक्स रख कर देखना चाहिए.

अभिव्यक्ति की आज़ादी

इमेज कॉपीरइट DEEKSHABHOOMI

अंबेडकर पेरियार स्टूडेंट सर्कल नामक संगठन बनाने वाले चंद छात्रों ने नरेंद्र मोदी की राजनीति की बयार पर सवाल खड़ा करने वाले पर्चे बांटे थे.

एक अज्ञात शिकायत के बिना पर मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने संस्थान से इन छात्रों की गतिविधियों पर कार्रवाई के लिए कहा और स्वाभिमान से खाली डायरेक्टर मजबूर हो गए.

इस बात में संदेह का बहुत थोड़ा कारण है कि स्टूडेंट्स में कोई गैलोवा है, जिसे निशाना बनाया जा रहा हो, लेकिन हमें इस बात को याद रखने की ज़रूरत है कि रचनात्मकता के लिए विचारों की आज़ादी एक बुनियादी चीज़ होती है.

हमारे गणतंत्र ने इस बात को सुनिश्चित किया है कि आईआईटी संस्थान लगातार तकनीशियन, इंजीनियर और मैनेजर बनाते रहें, लेकिन इनमें बहुत कम ही ऐसे होते हैं जो सच्चे मायने में रचनात्मक दिमाग के होते हैं.

हमें यह समझना होगा कि तकनीकी गतिविधियां रचनात्मक काम हैं और ये उनसे नहीं पैदा होतीं, जो तकनीशियन के काम के लिए ही बने हुए हैं.

यह समस्या हमारे नज़रिए में ही समाई हुई है, हम तकनीशियनों को रचनात्मक लोगों पर तरजीह देते हैं और विचारों के स्वतंत्र आदान प्रदान से मुंह चुराते हैं.

स्मृति को क्या करना चाहिए?

इमेज कॉपीरइट Getty

एकदम विपरीत परिस्थितियों में विशुद्ध गणित, राजनीति से बहिष्कृत लोगों के लिए पनाहगाह हो सकती है, जैसा कि सोवियत संघ के मामले में था, जिनमें से अधिकांश उस समाज से निकल भागने के मौके के इंतज़ार में थे, जिसके लिए उनके दिल में ज़रा भी सहानुभूति नहीं थी.

यहां तक कि तकनीक को पनाहगाह के रूप में इस्तेमाल करने की संभावना मौजूद नहीं होती है; यानी वो लोग, जिनकी नज़र में उस समाज की कोई क़ीमत नहीं है, जिसके लिए वो काम करते हैं, उनमें इसके भविष्य के लिए कोई बहुत दूरगामी योगदान देने की संभावना भी कम होती है.

अगर स्मृति ईरानी की शिक्षा और इसकी रचनात्मकता में वाक़ई कोई रुचि थी तो उन्हें छात्रों को ये बताने के लिए सीधे आईआईटी कैंपस जाना चाहिए था कि, 'हालांकि वो उनके विचार से सहमत नहीं हैं, लेकिन वो उनकी बोलने की आज़ादी की समर्थक हैं.'

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार